16 जुलाई 2026
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झारखंड में 6 साल में सिर्फ 3 खनिज ब्लॉकों की नीलामी: बाबूलाल मरांडी ने हेमंत सरकार को घेरा

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झारखंड में 6 साल में सिर्फ 3 खनिज ब्लॉकों की नीलामी: बाबूलाल मरांडी ने हेमंत सरकार को घेरा

सारांश

देश के 40% खनिज संसाधन रखने वाले झारखंड में छह साल में सिर्फ तीन ब्लॉकों की नीलामी — यह आंकड़ा ही हेमंत सरकार पर बाबूलाल मरांडी के हमले की धार है। ओडिशा से दोगुना राजस्व और तीन गुना उत्पादन वृद्धि का फर्क नीति और इच्छाशक्ति का है, संसाधनों का नहीं।

मुख्य बातें

बाबूलाल मरांडी ने 16 जुलाई को रांची में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर हेमंत सरकार पर खनिज प्रबंधन में विफलता का आरोप लगाया।
2019-20 से अब तक देश में 434 खनिज ब्लॉकों की नीलामी हुई, झारखंड में केवल 3 ब्लॉक नीलाम हुए।
झारखंड का खनन राजस्व ₹22,000 करोड़ , जबकि ओडिशा ने ₹46,000 करोड़ अर्जित किए ( 2025-26 )।
ओडिशा का लौह अयस्क उत्पादन 180 मिलियन टन पहुँचा, झारखंड 23 मिलियन टन पर स्थिर।
पश्चिमी सिंहभूम में ₹3,700 करोड़ DMFT फंड जमा, लेकिन 2018 के बाद कोई सार्वजनिक अपडेट नहीं।
झींकपानी एसीसी संयंत्र बंद होने से लगभग 1,600 परिवार प्रभावित होने की आशंका।

झारखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने गुरुवार, 16 जुलाई को रांची स्थित भारतीय जनता पार्टी (BJP) के प्रदेश कार्यालय में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार पर खनिज प्रबंधन में गंभीर विफलता का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि वर्ष 2019-20 से अब तक देशभर में 434 खनिज ब्लॉकों की नीलामी हुई, जबकि खनिज संपदा से भरपूर झारखंड में केवल तीन ब्लॉकों की नीलामी की गई।

मुख्य आरोप और आंकड़े

मरांडी के अनुसार, झारखंड में देश के लगभग 40 प्रतिशत खनिज संसाधन मौजूद हैं, फिर भी राज्य खनन उत्पादन, राजस्व और रोज़गार के मामले में अपनी क्षमता के अनुरूप प्रदर्शन करने में नाकाम रहा है। उन्होंने तुलनात्मक आंकड़े पेश करते हुए कहा कि वर्ष 2025-26 में झारखंड को खनन क्षेत्र से लगभग ₹22,000 करोड़ का राजस्व प्राप्त हुआ, जबकि अपेक्षाकृत कम खनिज संसाधन वाले ओडिशा ने करीब ₹46,000 करोड़ का राजस्व अर्जित किया।

उत्पादन के मोर्चे पर भी यही तस्वीर सामने आई। मरांडी के दावे के अनुसार, 2018-19 से 2024-25 के बीच ओडिशा का लौह अयस्क उत्पादन 120 मिलियन टन से बढ़कर 180 मिलियन टन हो गया, जबकि झारखंड का उत्पादन लगभग 23 मिलियन टन पर ही स्थिर रहा।

सारंडा और जामदा का जमीनी संकट

मरांडी ने बताया कि हाल ही में पश्चिमी सिंहभूम के सारंडा क्षेत्र के दौरे के दौरान उन्होंने पाया कि कई लौह अयस्क खदानों की लीज समाप्त होने के बाद न तो उनका नवीनीकरण किया गया और न ही पुनः नीलामी हुई। इसके चलते वर्षों से खदानें बंद पड़ी हैं और स्थानीय रोज़गार के अवसर लगातार सिकुड़ते जा रहे हैं।

उन्होंने जामदा बाज़ार का उदाहरण दिया, जो कभी आर्थिक गतिविधियों का केंद्र हुआ करता था, लेकिन आज मंदी की चपेट में है। इसके विपरीत, मात्र 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ओडिशा का बड़बिल क्षेत्र समय पर खदानों की नीलामी और उत्पादन वृद्धि के कारण तेज़ी से विकसित हुआ है। मरांडी के अनुसार, दोनों क्षेत्रों के बीच का अंतर संसाधनों का नहीं, बल्कि नीतियों और प्रशासनिक कार्यप्रणाली का है।

डीएमएफटी फंड पर पारदर्शिता के सवाल

नेता प्रतिपक्ष ने पश्चिमी सिंहभूम में जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट (DMFT) के फंड के उपयोग को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए। उनके दावे के अनुसार, वर्ष 2016 से 2026 के बीच जिले में करीब ₹3,700 करोड़ DMFT मद में जमा हुए, लेकिन वार्षिक रिपोर्ट, बजट और परियोजनाओं का विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि संबंधित वेबसाइट पर अंतिम अपडेट वर्ष 2018 का है, जो पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

इसके अलावा, नोआमुंडी क्षेत्र की अधिकांश पत्थर खदानें बंद हैं और झींकपानी स्थित एसीसी संयंत्र के बंद होने से लगभग 1,600 परिवार प्रभावित होने की आशंका है।

मरांडी की माँगें

मरांडी ने सरकार के समक्ष कई माँगें रखीं — बंद खदानों की शीघ्र नीलामी, खनन गतिविधियों को दोबारा शुरू करने की समयबद्ध कार्ययोजना, स्थानीय युवाओं के लिए रोज़गार सृजन और DMFT फंड के उपयोग का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक करना। उन्होंने कहा कि खनिज संपदा पर पहला अधिकार राज्य की जनता का है और सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध क्षेत्रों के लोग आज भी बुनियादी सुविधाओं और विकास से वंचित क्यों हैं।

यह ऐसे समय में आया है जब झारखंड सरकार निवेश और औद्योगिक विकास के दावे कर रही है, और राज्य में अगले कुछ वर्षों में बड़े खनन निवेश की उम्मीदें जताई जा रही हैं। जमीनी हकीकत और सरकारी दावों के बीच की यह खाई आने वाले समय में राजनीतिक बहस का केंद्र बनी रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो झारखंड 40% खनिज भंडार रखते हुए भी स्थिर क्यों रहा? DMFT फंड में 2018 के बाद कोई सार्वजनिक अपडेट न होना पारदर्शिता की गंभीर कमी दर्शाता है, जो खनन प्रभावित समुदायों के साथ सीधा अन्याय है। हेमंत सरकार को इन आंकड़ों का खंडन करना होगा या फिर सुधारात्मक कदमों की घोषणा — मौन या सामान्य प्रतिवाद पर्याप्त नहीं होगा।
RashtraPress
16 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

झारखंड में खनिज ब्लॉकों की नीलामी इतनी कम क्यों हुई?
बाबूलाल मरांडी के अनुसार, 2019-20 से अब तक देश में 434 खनिज ब्लॉक नीलाम हुए जबकि झारखंड में केवल तीन। उनका आरोप है कि सरकार की नीतिगत निष्क्रियता और प्रशासनिक ढिलाई इसके लिए जिम्मेदार है, हालांकि सरकार की ओर से अभी आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
झारखंड और ओडिशा के खनन राजस्व में इतना फर्क क्यों है?
मरांडी के दावे के अनुसार, 2025-26 में झारखंड को ₹22,000 करोड़ और ओडिशा को ₹46,000 करोड़ खनन राजस्व मिला। उनके अनुसार यह अंतर संसाधनों का नहीं, बल्कि समय पर नीलामी और उत्पादन नीतियों का है।
पश्चिमी सिंहभूम का DMFT फंड क्या है और इस पर सवाल क्यों उठे?
जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट (DMFT) खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए बनाया गया फंड है। मरांडी के अनुसार, 2016 से 2026 के बीच पश्चिमी सिंहभूम में ₹3,700 करोड़ जमा हुए, लेकिन वार्षिक रिपोर्ट और परियोजनाओं का विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया और वेबसाइट 2018 से अपडेट नहीं हुई।
सारंडा क्षेत्र की खदानें बंद होने से किन लोगों पर असर पड़ा है?
मरांडी के अनुसार, खदानें बंद होने से सिर्फ खनन मजदूर नहीं, बल्कि परिवहन, होटल, दुकानें और छोटे कारोबार भी प्रभावित हुए हैं। जामदा बाज़ार जैसे इलाके आर्थिक मंदी से गुजर रहे हैं और झींकपानी एसीसी संयंत्र बंद होने से करीब 1,600 परिवार प्रभावित होने की आशंका है।
बाबूलाल मरांडी ने हेमंत सरकार से क्या माँगें रखी हैं?
मरांडी ने बंद खदानों की शीघ्र नीलामी, खनन गतिविधियों की बहाली की समयबद्ध योजना, स्थानीय युवाओं के लिए रोज़गार सृजन और DMFT फंड के उपयोग का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक करने की माँग की है।
राष्ट्र प्रेस
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