कल्याण बनर्जी निलंबन: टीएमसी ने नियम 374(2) पर उठाए सवाल, लोकसभा अध्यक्ष अगले दिन सुनाएंगे फैसला
सारांश
मुख्य बातें
संसद के मानसून सत्र में 22 जुलाई को तृणमूल कांग्रेस (TMC) सांसद कल्याण बनर्जी के निलंबन को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव तेज हो गया। टीएमसी ने निलंबन की प्रक्रिया को संसदीय नियमों के विरुद्ध बताते हुए इसे तत्काल वापस लेने की मांग की है, जबकि भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने विपक्ष पर सदन की कार्यवाही बाधित करने का आरोप लगाया है।
निलंबन का घटनाक्रम
टीएमसी सांसद सौगत रॉय ने बताया कि दोपहर करीब दो बजे सदन में हंगामे के बीच कार्यवाहक सभापति ने एक नोटिस पढ़कर कल्याण बनर्जी को पूरे शेष मानसून सत्र के लिए निलंबित करने की घोषणा की। उनके अनुसार, सदन में शोर-शराबे के कारण अधिकांश सांसद यह समझ ही नहीं पाए कि सभापति क्या कह रहे थे।
रॉय ने स्पष्ट किया कि निलंबन का कथित आधार कल्याण बनर्जी और सांसद मिताली बाग के बीच हुई बहस है, जो उस समय हुई जब सदन की कार्यवाही स्थगित थी, माइक बंद थे और पीठासीन अधिकारी भी मौजूद नहीं थे। उन्होंने तर्क दिया कि ऐसी परिस्थितियों में हुई घटना को सदन की कार्यवाही का हिस्सा नहीं माना जा सकता।
नियम 374(2) पर विवाद
सौगत रॉय ने आरोप लगाया कि कल्याण बनर्जी को न तो कोई पूर्व नोटिस दिया गया और न ही अपना पक्ष रखने का अवसर मिला। उनके अनुसार, नियम 374(2) उस स्थिति में लागू नहीं होता जब सदन की कार्यवाही स्थगित हो। यह ऐसे समय में आया है जब विपक्ष पहले से ही मानसून सत्र में सरकार के रवैये को लेकर नाराज है।
इस संबंध में रॉय ने लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात की। अध्यक्ष ने कहा कि निलंबन का प्रस्ताव सत्ता पक्ष की ओर से आया है, इसलिए वे इस विषय पर उनसे चर्चा करेंगे और अगले दिन अपना निर्णय सुनाएंगे।
भाजपा का पक्ष
भाजपा सांसद सुष्मिता देव ने कहा कि राजनीति में उतार-चढ़ाव और मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन राजनीतिक विरोध को व्यक्तिगत शत्रुता में नहीं बदलना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सभी दलों को सदन की गरिमा और मर्यादा बनाए रखनी चाहिए।
देव ने यह भी कहा कि यदि बार-बार मुद्दे और शर्तें बदली जाएंगी तो सदन की कार्यवाही आगे नहीं बढ़ पाएगी। उनके अनुसार, पहले विपक्ष ने चर्चा की मांग की, जिस पर सरकार और पीठासीन अधिकारी दोनों सहमत हो गए, लेकिन बाद में विपक्ष ने पहले इस्तीफे की शर्त जोड़ दी।
छात्रों की आवाज़ और संसदीय दायित्व
सुष्मिता देव ने जोर देते हुए कहा कि यदि विपक्ष वास्तव में छात्रों के हितों की चिंता करता है, तो उसे सदन में चर्चा में भाग लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि छात्र सीधे संसद में अपनी बात नहीं रख सकते, इसलिए उनकी आवाज़ सांसदों के माध्यम से ही सदन तक पहुँचती है।
गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब मानसून सत्र में निलंबन को लेकर विवाद उठा हो — पिछले कई सत्रों में भी इसी तरह के टकराव सामने आए हैं। लोकसभा अध्यक्ष के अगले दिन के फैसले पर अब सभी की नज़रें टिकी हैं।