कर्नाटक सूखा राहत: डिप्टी सीएम परमेश्वर ने पीएम मोदी से माँगे ₹22,400 करोड़, 226 तालुक प्रभावित
सारांश
मुख्य बातें
कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री एवं राजस्व मंत्री जी. परमेश्वर ने राज्य में गहराते सूखे संकट के मद्देनज़र केंद्र सरकार से ₹22,400.58 करोड़ की आपातकालीन सूखा राहत निधि तत्काल स्वीकृत कर जारी करने की माँग की है। उन्होंने 3 नवंबर 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को अलग-अलग पत्र लिखकर व्यक्तिगत मुलाकात के लिए तत्काल समय माँगा है। राज्य के 226 तालुकों में सूखे की मार से 57.93 लाख हेक्टेयर फसल क्षेत्र को नुकसान पहुँचा है और अनुमानित ₹62,481.88 करोड़ का आर्थिक नुकसान हुआ है।
सूखे की स्थिति और नुकसान का दायरा
परमेश्वर ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर जानकारी साझा करते हुए बताया कि कर्नाटक के किसान अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहे हैं। 226 तालुकों में सूखे की घोषणा हो चुकी है और 57.93 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि पर खड़ी फसलें बर्बाद हो गई हैं। इससे राज्य में कुल अनुमानित आर्थिक क्षति ₹62,481.88 करोड़ आँकी गई है। यह संकट ऐसे समय में आया है जब देशभर में मानसून की अनियमितता और जलवायु परिवर्तन के कारण कृषि क्षेत्र पर दबाव पहले से बढ़ा हुआ है।
गौरतलब है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 26 अक्टूबर 2026 को एक अधिसूचना जारी कर वर्ष 2026-27 से 2030-31 की अवधि के लिए राज्य आपदा मोचन निधि (SDRF) और राष्ट्रीय आपदा मोचन निधि (NDRF) के तहत मुआवजे के मानदंडों में संशोधन किया था। इन संशोधित मानदंडों के लागू होने के बाद कर्नाटक की कुल सूखा राहत माँग ₹20,585.73 करोड़ से बढ़कर ₹22,400.58 करोड़ हो गई है।
संशोधित मुआवजा मानदंड और उनकी सीमाएँ
संशोधित मानदंडों के अनुसार फसल नुकसान के लिए इनपुट सब्सिडी के तहत कर्नाटक की ज़रूरत ₹6,128.70 करोड़ से बढ़कर ₹7,943.55 करोड़ हो गई है — यानी ₹1,814.85 करोड़ की अतिरिक्त ज़रूरत है। वर्षा आधारित फसलों के लिए ₹11,000 प्रति हेक्टेयर, सिंचित फसलों के लिए ₹22,000 प्रति हेक्टेयर और बारहमासी फसलों के लिए ₹30,000 प्रति हेक्टेयर मुआवजा निर्धारित किया गया है।
परमेश्वर ने केंद्र के इस संशोधन का स्वागत करते हुए भी स्पष्ट किया कि बीज, उर्वरक, कृषि मज़दूरी, सिंचाई और अन्य आवश्यक आगत लागतों की तुलना में यह राशि अपर्याप्त है। उनके अनुसार मुआवजे के मानदंड वर्ष 2026 की कृषि लागत और आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप होने चाहिए, न कि पुराने आधार वर्ष पर टिके रहने चाहिए।
डेटाबेस विवाद: पुरानी जनगणना बनाम फ्रूट्स डेटाबेस
उपमुख्यमंत्री ने सूखा राहत के पात्र किसानों की पहचान के लिए 2015-16 की कृषि जनगणना के आँकड़ों के इस्तेमाल पर कड़ी आपत्ति जताई। उनका तर्क है कि करीब एक दशक पुराने ये आँकड़े किसानों की मौजूदा भूमि जोत और कृषि परिस्थितियों की सही तस्वीर पेश नहीं करते, जिससे छोटे और सीमांत किसान सहायता से वंचित रह सकते हैं।
इसके विकल्प के रूप में परमेश्वर ने केंद्र से कर्नाटक सरकार के फ्रूट्स (FRUITS) डेटाबेस को स्वीकार करने का आग्रह किया, जिसमें किसानों से जुड़ी अद्यतन और सत्यापित जानकारी उपलब्ध है। उनका मानना है कि इससे पात्र लाभार्थियों की पहचान अधिक सटीक और पारदर्शी ढंग से हो सकती है।
सहकारी संघवाद की अपील
परमेश्वर ने अपने पत्रों में विकसित भारत 2047 के लक्ष्य का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि एक मानसून की विफलता किसानों की वर्षों की मेहनत बर्बाद कर सकती है और पूरी पीढ़ी के भविष्य को अनिश्चितता में डाल सकती है, तो यह लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता। उन्होंने केंद्र से मौजूदा आपदा राहत व्यवस्था की व्यापक समीक्षा करने और खेती की वास्तविक लागत, भूमि जोत के अद्यतन रिकॉर्ड तथा चरम मौसमी घटनाओं से होने वाले बढ़ते नुकसान को ध्यान में रखते हुए मुआवजे के मानदंड तैयार करने की माँग की।
उन्होंने जोर देकर कहा कि किसानों के हितों की रक्षा के रास्ते में राजनीतिक और प्रशासनिक मतभेद नहीं आने चाहिए तथा केंद्र व राज्य सरकार को सहकारी संघवाद की भावना के साथ मिलकर काम करना चाहिए।
आगे की राह
अब सबकी नज़रें केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय, गृह मंत्रालय और कृषि मंत्रालय की ओर से अभी तक आधिकारिक टिप्पणी नहीं आई है। यदि केंद्र राज्य की संशोधित माँग को स्वीकार करता है, तो यह कर्नाटक के सूखा प्रभावित किसानों के लिए बड़ी राहत होगी — और यह मिसाल अन्य सूखाग्रस्त राज्यों के लिए भी नज़ीर बन सकती है।