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कर्नाटक हाई कोर्ट ने बिदादी टाउनशिप भूमि अधिग्रहण PIL खारिज की, DK शिवकुमार को राहत

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कर्नाटक हाई कोर्ट ने बिदादी टाउनशिप भूमि अधिग्रहण PIL खारिज की, DK शिवकुमार को राहत

सारांश

कर्नाटक हाई कोर्ट ने बिदादी में 516 एकड़ कृषि भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाली PIL खारिज कर दी। चीफ जस्टिस विभु बखरू की बेंच ने कहा — कानूनी खामी साबित करो, राजनीतिक बहस नहीं। मुख्यमंत्री शिवकुमार की विशेषज्ञ समिति की घोषणा के बाद यह फैसला परियोजना की राह आसान करता है, लेकिन 500 दिनों से जारी किसान आंदोलन अभी थमा नहीं है।

मुख्य बातें

कर्नाटक हाई कोर्ट ने 20 जुलाई को बिदादी इंटीग्रेटेड टाउनशिप प्रोजेक्ट के लिए 516 एकड़ कृषि भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाली PIL खारिज की।
चीफ जस्टिस विभु बखरू और जस्टिस केएस हेमलेखा की डिवीजन बेंच ने कहा कि परियोजना के गुण-दोष की जाँच उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं।
याचिकाकर्ता केबी राजेश ने तर्क दिया था कि किसान लगभग 500 दिनों से विरोध कर रहे हैं और 80% भूमि मालिकों की सहमति अनिवार्य होनी चाहिए।
शिवकुमार ने 15 जुलाई को कहा था कि किसानों की जमीन जबरन नहीं ली जाएगी और 2-3 महीनों में विशेषज्ञ समिति गठित होगी।
मुआवजा भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013 के प्रावधानों के तहत दिए जाने का राज्य सरकार का दावा है।

कर्नाटक हाई कोर्ट ने 20 जुलाई को बिदादी में प्रस्तावित 'ग्रेटर बेंगलुरु इंटीग्रेटेड टाउनशिप प्रोजेक्ट' के लिए 516 एकड़ कृषि भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) खारिज कर दी। इस फैसले से राज्य की कांग्रेस सरकार और मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार को बड़ी राहत मिली है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता केबी राजेश ने यह PIL दायर की थी, जिसमें बिदादी टाउनशिप परियोजना के लिए जारी भूमि अधिग्रहण अधिसूचना को कानूनी चुनौती दी गई थी। मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस विभु बखरू और जस्टिस केएस हेमलेखा की डिवीजन बेंच ने की।

राजेश ने स्वयं पेश होकर तर्क दिया कि सरकार रियल एस्टेट विकास के लिए 9,400 एकड़ से अधिक कृषि भूमि का उपयोग कर रही है, जबकि किसान उस पर खेती करना चाहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि किसान लगभग 500 दिनों से इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं और परियोजना के लिए कम से कम 80 प्रतिशत भूमि मालिकों की सहमति अनिवार्य होनी चाहिए।

अदालत का रुख

डिवीजन बेंच ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि वह परियोजना के गुण-दोष की जाँच करने की स्थिति में नहीं है। बेंच ने कहा कि अधिग्रहण की प्रक्रिया अलग हो सकती है और बेहतर मुआवजा देने के लिए किसी विशेष कानून का सहारा लिया गया हो सकता है।

अदालत ने गौर किया कि राज्य सरकार का दावा था कि मुआवजा भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013 के प्रावधानों के अनुरूप दिया जा रहा है। बेंच ने याचिकाकर्ता से कहा कि वे अधिग्रहण प्रक्रिया में किसी ठोस कानूनी खामी की पहचान करें, केवल सामान्य आपत्तियाँ पर्याप्त नहीं हैं।

जब याचिकाकर्ता ने 2028 के बाद संभावित सरकार बदलाव का उल्लेख करना शुरू किया, तो अदालत ने उन्हें रोकते हुए कहा कि यह राजनीतिक चर्चा का मंच नहीं है। इसके बाद बेंच ने PIL खारिज कर दी।

मुख्यमंत्री शिवकुमार का पक्ष

15 जुलाई को मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने बिदादी टाउनशिप परियोजना पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा था कि किसानों की जमीन किसी भी स्थिति में जबरन नहीं ली जाएगी। उन्होंने घोषणा की थी कि सरकार अगले दो से तीन महीनों में परियोजना के कानूनी और अन्य पहलुओं की समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करेगी।

शिवकुमार ने यह भी कहा था कि बिदादी टाउनशिप उनका 'ड्रीम प्रोजेक्ट' नहीं है और न ही इसकी शुरुआत उन्होंने की थी। उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक विरोधी किसानों को गुमराह कर रहे हैं। उनके शब्दों में, 'मैं किसी जल्दबाजी में नहीं हूँ। यह फैसला किसानों पर छोड़ता हूँ। समिति किसानों की आपत्तियाँ सुनेगी, कानूनी पहलुओं की जाँच करेगी और उसकी रिपोर्ट आने के बाद ही सरकार आगे का फैसला करेगी।'

किसानों पर असर

याचिका खारिज होने के बावजूद किसानों का विरोध जारी रहने की संभावना है। लगभग 500 दिनों से चल रहे इस आंदोलन में शामिल किसानों का कहना है कि वे अपनी कृषि भूमि छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट आने तक परियोजना का भविष्य अधर में लटका रहेगा।

आगे की राह

हाई कोर्ट के इस फैसले से अधिग्रहण प्रक्रिया पर फिलहाल न्यायिक रोक नहीं है, लेकिन मुख्यमंत्री शिवकुमार के बयान के अनुसार विशेषज्ञ समिति की समीक्षा के बाद ही सरकार अंतिम निर्णय लेगी। यह ऐसे समय में आया है जब कर्नाटक में भूमि अधिग्रहण से जुड़े विवाद राज्य सरकार के लिए राजनीतिक रूप से संवेदनशील बने हुए हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली लड़ाई अदालत से बाहर मैदान में है — जहाँ 500 दिनों से किसान डटे हैं। मुख्यमंत्री शिवकुमार का 'जल्दबाजी नहीं' वाला बयान और विशेषज्ञ समिति की घोषणा राजनीतिक दबाव प्रबंधन की रणनीति जैसी दिखती है, न कि नीतिगत स्पष्टता। 9,400 एकड़ से अधिक भूमि का सवाल अभी अनुत्तरित है — अदालत ने इसे खारिज नहीं किया, बस याचिकाकर्ता से ठोस कानूनी आधार माँगा। जब तक समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं होती और 80% सहमति की शर्त पर सरकार की स्थिति स्पष्ट नहीं होती, यह परियोजना राजनीतिक और सामाजिक तनाव का केंद्र बनी रहेगी।
RashtraPress
21 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बिदादी टाउनशिप PIL क्या थी और इसे क्यों खारिज किया गया?
यह PIL केबी राजेश ने बिदादी में 'ग्रेटर बेंगलुरु इंटीग्रेटेड टाउनशिप प्रोजेक्ट' के लिए 516 एकड़ कृषि भूमि अधिग्रहण की अधिसूचना को चुनौती देते हुए दायर की थी। कर्नाटक हाई कोर्ट ने इसे इसलिए खारिज किया क्योंकि याचिकाकर्ता अधिग्रहण प्रक्रिया में कोई ठोस कानूनी खामी साबित नहीं कर सके।
बिदादी टाउनशिप परियोजना क्या है?
बिदादी टाउनशिप परियोजना (BTP) कर्नाटक सरकार की एक बड़ी शहरी विकास योजना है, जिसके तहत बेंगलुरु के निकट बिदादी में एकीकृत टाउनशिप विकसित की जानी है। इसके लिए 9,400 एकड़ से अधिक भूमि का अधिग्रहण प्रस्तावित है, जिसमें से 516 एकड़ कृषि भूमि को लेकर विवाद है।
मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने किसानों को क्या आश्वासन दिया है?
मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने 15 जुलाई को कहा था कि किसानों की जमीन जबरन नहीं ली जाएगी। उन्होंने दो से तीन महीनों में एक विशेषज्ञ समिति गठित करने की घोषणा की, जो किसानों की आपत्तियाँ सुनेगी और कानूनी पहलुओं की जाँच कर रिपोर्ट देगी।
किसानों की मुख्य आपत्तियाँ क्या हैं?
किसान लगभग 500 दिनों से इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि वे अपनी कृषि भूमि पर खेती करना चाहते हैं और रियल एस्टेट विकास के लिए इसे नहीं देंगे। याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि परियोजना के लिए कम से कम 80 प्रतिशत भूमि मालिकों की सहमति अनिवार्य होनी चाहिए।
हाई कोर्ट के फैसले के बाद परियोजना का क्या होगा?
PIL खारिज होने से अधिग्रहण प्रक्रिया पर न्यायिक रोक नहीं है, लेकिन मुख्यमंत्री शिवकुमार के अनुसार विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट आने के बाद ही सरकार आगे का फैसला करेगी। परियोजना का अंतिम स्वरूप समिति की सिफारिशों और किसानों की सहमति पर निर्भर करेगा।
राष्ट्र प्रेस
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