3 नवंबर 2026
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बेंगलुरु में नकली दवा रैकेट पर ED की बड़ी कार्रवाई, पाँच ठिकानों पर छापे; ₹9 लाख का बैंक खाता फ्रीज

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बेंगलुरु में नकली दवा रैकेट पर ED की बड़ी कार्रवाई, पाँच ठिकानों पर छापे; ₹9 लाख का बैंक खाता फ्रीज

सारांश

बेंगलुरु में ED ने नकली दवा रैकेट का भंडाफोड़ किया — जेनेरिक दवाओं को फाइजर के ब्रांड नाम पर अस्पतालों तक पहुँचाया जा रहा था। पाँच ठिकानों पर एक साथ छापे, ₹9 लाख फ्रीज, और कई कंपनियों की संलिप्तता सामने आई है।

मुख्य बातें

ED ने 3 नवंबर 2026 को बेंगलुरु में नकली दवा रैकेट से जुड़े पाँच ठिकानों पर PMLA, 2002 की धारा 17 के तहत छापे मारे।
प्रशांत ने कथित तौर पर बिदादी के पास फार्महाउस में बिना लाइसेंस दवाओं की री-पैकेजिंग और री-लेबलिंग करवाई।
जेनेरिक दवाओं पर फाइजर के ब्रांड ( जेविसेफ्टा, एम्ब्लेवो ) के लेबल चिपकाकर अस्पतालों को आपूर्ति की गई।
मेसर्स डीएम फार्मास्यूटिकल्स और मेसर्स कृपा हेल्थकेयर के ज़रिए वितरण नेटवर्क संचालित होने का आरोप।
आरोपी वीरेश कुमार के खाते में जमा लगभग ₹9 लाख फ्रीज; डिजिटल उपकरण और दस्तावेज़ जब्त।
यह मामला 18 अगस्त को तवरेकेरे पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR से जुड़ा है।

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 3 नवंबर 2026 को बेंगलुरु में नकली दवाओं के एक बड़े रैकेट के खिलाफ व्यापक तलाशी-और-जब्ती अभियान चलाया। प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA), 2002 की धारा 17 के तहत की गई इस कार्रवाई में पाँच ठिकानों पर एक साथ छापे मारे गए, जो आरोपी व्यक्तियों और उनसे जुड़ी कंपनियों से संबंधित बताए जाते हैं। जांच एजेंसी ने खुलासा किया है कि इस कथित रैकेट में जेनेरिक दवाओं को फाइजर जैसे प्रतिष्ठित ब्रांड के नाम पर धोखे से बेचा जा रहा था।

मामले की पृष्ठभूमि और जांच का आधार

यह मामला मूलतः 18 अगस्त को तवरेकेरे पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई एक प्राथमिकी (FIR) से जुड़ा है। उस दिन ड्रग कंट्रोलिंग अथॉरिटी और पुलिस ने संयुक्त रूप से सीके तांड्या गाँव में एक आवासीय संपत्ति पर छापा मारा था, जहाँ आरोपी बिना वैध लाइसेंस, परमिट या अनुमति के दवाएँ और फार्मास्यूटिकल ड्रग्स जमा करते और उन पर लेबल बदलते हुए पाए गए थे। इसी FIR के आधार पर ED ने PMLA के तहत मनी-लॉन्ड्रिंग जांच शुरू की।

कैसे चलाया जाता था यह कथित रैकेट

जांच के अनुसार, आरोपी आर. प्रशांत ने कथित तौर पर बिदादी के पास एक फार्महाउस की व्यवस्था की थी, जहाँ बिना किसी ड्रग लाइसेंस या परमिट के दवाओं की निर्माण, री-पैकेजिंग और री-लेबलिंग की जाती थी। अलग-अलग राज्यों के मैन्युफैक्चरिंग केंद्रों से मँगाए गए सस्ते बल्क फॉर्मूलेशन को कथित तौर पर नई शीशियों में भरा जाता था। इन शीशियों पर धोखे से फाइजर के एंटीबायोटिक ब्रांड — जैसे जेविसेफ्टा और एम्ब्लेवो — के लेबल चिपकाए जाते थे।

इन नकली ब्रांडेड दवाओं को कथित तौर पर मेसर्स डीएम फार्मास्यूटिकल्स के ज़रिए वितरित किया गया और मेसर्स कृपा हेल्थकेयर को आपूर्ति की गई। गौरतलब है कि मेसर्स कृपा हेल्थकेयर ने कथित तौर पर पहचान से बचने के लिए इन्हें असली दवाओं के साथ मिलाकर अन्य फार्मास्यूटिकल कंपनियों और अस्पतालों को भी आपूर्ति की। यह ऐसे समय में आया है जब नकली दवाओं की आपूर्ति श्रृंखला में घुसपैठ को लेकर देशभर में गंभीर चिंताएँ जताई जा रही हैं।

छापेमारी में क्या मिला

तलाशी अभियान के दौरान, आरोपी वीरेश कुमार के बैंक खाते में जमा लगभग ₹9 लाख की राशि को फ्रीज कर दिया गया है। इसके अतिरिक्त, विभिन्न आरोपियों के डिजिटल उपकरण, रिकॉर्ड और भ्रामक दस्तावेज़ जब्त किए गए हैं। अधिकारियों के अनुसार ये दस्तावेज़ जांच के लिए महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकते हैं।

आम जनता और स्वास्थ्य प्रणाली पर असर

यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि नकली एंटीबायोटिक्स सीधे अस्पतालों और मरीजों तक पहुँचती रहीं। एंटीबायोटिक प्रतिरोध (AMR) पहले से ही भारत में एक उभरती सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है, और नकली या घटिया दवाओं की आपूर्ति इस संकट को और गहरा कर सकती है। आलोचकों का कहना है कि इस तरह के रैकेट दवा नियामक तंत्र में गंभीर खामियों का संकेत देते हैं।

आगे क्या होगा

ED के अनुसार इस मामले में जांच जारी है और आगे और कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। जब्त किए गए डिजिटल साक्ष्यों और दस्तावेज़ों की जाँच से रैकेट के नेटवर्क का और विस्तार सामने आ सकता है। इस मामले में कर्नाटक सरकार और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की प्रतिक्रिया अभी आनी बाकी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो असली कीमत मरीज़ की जान है। ड्रग कंट्रोलर और ED की संयुक्त कार्रवाई का स्वागत है, लेकिन सवाल यह है कि रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी और बिना लाइसेंस फार्महाउस में इतने बड़े पैमाने पर री-लेबलिंग कितने समय से चल रही थी और आपूर्ति श्रृंखला की नियमित निगरानी कहाँ विफल हुई। जब्त साक्ष्यों से यदि वितरण नेटवर्क का पूरा नक्शा सामने आता है, तो यह कर्नाटक से बाहर भी जाँच का दायरा बढ़ा सकता है।
RashtraPress
3 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बेंगलुरु में ED ने नकली दवाओं के मामले में क्या कार्रवाई की?
ED ने 3 नवंबर 2026 को PMLA, 2002 की धारा 17 के तहत नकली दवाओं के रैकेट से जुड़े पाँच ठिकानों पर तलाशी और जब्ती अभियान चलाया। इस दौरान ₹9 लाख का बैंक खाता फ्रीज किया गया और डिजिटल डिवाइस व दस्तावेज़ जब्त किए गए।
इस नकली दवा रैकेट में फाइजर ब्रांड का इस्तेमाल कैसे हो रहा था?
जांच के अनुसार, अलग-अलग राज्यों से मँगाए गए सस्ते जेनेरिक फॉर्मूलेशन को नई शीशियों में भरकर कथित तौर पर फाइजर के एंटीबायोटिक ब्रांड जेविसेफ्टा और एम्ब्लेवो के लेबल चिपकाए जाते थे। इन्हें बाद में अस्पतालों और फार्मास्यूटिकल कंपनियों को आपूर्ति की गई।
इस मामले में कौन-कौन सी कंपनियाँ संदेह के घेरे में हैं?
जांच में मेसर्स डीएम फार्मास्यूटिकल्स और मेसर्स कृपा हेल्थकेयर का नाम सामने आया है। आरोप है कि डीएम फार्मास्यूटिकल्स ने नकली दवाएँ वितरित कीं और कृपा हेल्थकेयर ने उन्हें असली दवाओं के साथ मिलाकर अस्पतालों तक पहुँचाया।
यह मनी-लॉन्ड्रिंग मामला कब और कहाँ दर्ज हुआ?
यह मामला मूलतः 18 अगस्त को तवरेकेरे पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR पर आधारित है, जब ड्रग कंट्रोलिंग अथॉरिटी और पुलिस ने सीके तांड्या गाँव में संयुक्त छापा मारा था। इसी FIR के आधार पर ED ने PMLA के तहत जांच शुरू की।
इस मामले में आगे क्या हो सकता है?
ED के अनुसार जांच जारी है और जब्त डिजिटल साक्ष्यों की जाँच से और गिरफ्तारियाँ या संपत्ति कुर्की की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। रैकेट का नेटवर्क कर्नाटक से बाहर तक फैला हो सकता है, जिसकी पड़ताल की जा रही है।
राष्ट्र प्रेस
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