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परिसीमन पर कार्ति चिदंबरम की चेतावनी: लोकसभा सीटें बढ़ाने से उत्तर-दक्षिण की खाई होगी और गहरी

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परिसीमन पर कार्ति चिदंबरम की चेतावनी: लोकसभा सीटें बढ़ाने से उत्तर-दक्षिण की खाई होगी और गहरी

सारांश

कार्ति चिदंबरम ने परिसीमन की बहस में एक नई दलील रखी — अनुपात नहीं, पूर्ण संख्याएँ मायने रखती हैं। 50% सीट-वृद्धि से उत्तर प्रदेश को 40 अतिरिक्त सीटें मिलेंगी, तमिलनाडु को सिर्फ 20। यह दक्षिणी राज्यों की उस बड़ी लड़ाई का हिस्सा है जिसमें जनसंख्या नियंत्रण की सफलता को दंड नहीं, पुरस्कार मिलना चाहिए।

मुख्य बातें

चिदंबरम ने 9 अगस्त 2026 को शिवगंगा में परिसीमन के तहत लोकसभा सीटें बढ़ाने के खिलाफ चेतावनी दी।
वर्तमान में तमिलनाडु-पुडुचेरी में 40 और उत्तर प्रदेश में 80 लोकसभा सीटें हैं; 50% वृद्धि से यह क्रमशः 60 और 120 हो जाएँगी।
संख्यात्मक अंतर 40 सीटों से बढ़कर 60 सीटें हो जाएगा — जो संसद में मतदान के समय निर्णायक होगा।
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी.
जोसेफ विजय ने 8 अगस्त को चेन्नई में सांसदों की बैठक बुलाकर सर्वदलीय सहमति बनाने का प्रयास किया।
दक्षिणी राज्यों की माँग है कि जनसंख्या नियंत्रण में सफलता को सीट-आवंटन में उचित महत्व दिया जाए।

कांग्रेस सांसद कार्ति पी. चिदंबरम ने 9 अगस्त 2026 को शिवगंगा में कहा कि प्रस्तावित परिसीमन के तहत लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने से तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश जैसे अधिक जनसंख्या वाले राज्यों के बीच संसदीय प्रतिनिधित्व की संख्यात्मक खाई और चौड़ी हो जाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि आनुपातिक अनुपात बनाए रखने मात्र से दक्षिणी राज्यों के हितों की रक्षा नहीं होगी, क्योंकि संसद में पूर्ण संख्याएँ भी निर्णायक भूमिका निभाती हैं।

मुख्य तर्क: अनुपात नहीं, संख्या है असली मुद्दा

शिवगंगा के सांसद चिदंबरम ने एक ठोस उदाहरण से अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि तमिलनाडु और पुडुचेरी में मिलाकर अभी 40 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में 80 हैं। यदि सभी सीटों में समान रूप से 50 प्रतिशत की वृद्धि की जाती है, तो तमिलनाडु-पुडुचेरी की सीटें लगभग 60 हो जाएँगी और उत्तर प्रदेश की 120

उन्होंने कहा कि दोनों के बीच सीटों का अनुपात भले ही वही रहे, परंतु संख्यात्मक अंतर वर्तमान 40 सीटों से बढ़कर 60 सीटें हो जाएगा। उनके अनुसार, जब संसद में मतदान होता है, तो पूर्ण संख्याएँ ही निर्णय करती हैं — अनुपात नहीं।

पृष्ठभूमि: चेन्नई बैठक और राजनीतिक एकजुटता

चिदंबरम की यह टिप्पणी तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय द्वारा 8 अगस्त को चेन्नई में बुलाई गई सांसदों की बैठक के ठीक एक दिन बाद आई। उस बैठक में प्रस्तावित परिसीमन के संभावित प्रभावों पर विचार-विमर्श हुआ और राज्य के संसदीय प्रतिनिधित्व की रक्षा के लिए सर्वदलीय सहमति बनाने का प्रयास किया गया।

बैठक में यह चिंता उभरी कि यदि लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण मुख्यतः जनसंख्या के आधार पर हुआ, तो तमिलनाडु संसद में अपना सापेक्षिक प्रभाव खो सकता है। उपस्थित प्रतिनिधियों ने तर्क दिया कि जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे राज्यों को उनकी इस उपलब्धि के लिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए।

दक्षिणी राज्यों की व्यापक चिंता

यह ऐसे समय में आया है जब दक्षिण भारत के कई राज्य परिसीमन को लेकर एकजुट हो रहे हैं। दक्षिणी राज्यों का बार-बार यह तर्क रहा है कि जनसांख्यिकीय प्रदर्शन — विशेषकर जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने में मिली सफलता — को संसदीय सीटों के भावी आवंटन में उचित महत्व मिलना चाहिए।

गौरतलब है कि परिसीमन का मुद्दा तमिलनाडु में एक प्रमुख राजनीतिक चिंता बन चुका है। विभिन्न दलों ने आगाह किया है कि जनसंख्या-आधारित पुनर्वितरण से उत्तरी राज्यों की संसदीय शक्ति में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है, जो संघीय संतुलन को प्रभावित करेगी।

543 सदस्यीय सदन पर भी उठाए सवाल

चिदंबरम ने यह भी कहा कि मौजूदा 543 सदस्यीय लोकसभा में ही सांसदों को बहसों में भाग लेने के सीमित अवसर मिलते हैं। उनके अनुसार, सदन की संख्या बढ़ाने से संसदीय कार्यप्रणाली की गुणवत्ता में सुधार होना आवश्यक नहीं है।

उनके इस हस्तक्षेप ने बहस में एक नया आयाम जोड़ा है — सवाल यह है कि क्या लोकसभा का कुल आकार बढ़ाने मात्र से तमिलनाडु और अन्य दक्षिणी राज्यों के हितों की पर्याप्त रूप से रक्षा हो सकती है। आने वाले हफ्तों में परिसीमन आयोग की कार्यवाही और राज्यों की आपत्तियाँ इस बहस की दिशा तय करेंगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

या यह केवल राजनीतिक दबाव की कवायद बनकर रह जाएगी। संविधान के अनुच्छेद 81 के तहत जनसंख्या-आधारित प्रतिनिधित्व का सिद्धांत स्पष्ट है, और उसे बदलने के लिए संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता होगी। जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को 'दंड' मिलने की यह विडंबना नई नहीं है — 2002 के परिसीमन में भी यही बहस हुई थी — परंतु इस बार राजनीतिक तापमान अधिक है।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कार्ति चिदंबरम ने परिसीमन को लेकर क्या चेतावनी दी है?
उन्होंने कहा कि लोकसभा सीटों में आनुपातिक वृद्धि से तमिलनाडु-पुडुचेरी और उत्तर प्रदेश के बीच संख्यात्मक अंतर मौजूदा 40 सीटों से बढ़कर 60 सीटें हो जाएगा। उनके अनुसार, संसद में पूर्ण संख्याएँ निर्णायक होती हैं, इसलिए यह अंतर दक्षिणी राज्यों के लिए गंभीर नुकसानदेह होगा।
50% सीट-वृद्धि से तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश की सीटें कितनी हो जाएँगी?
50% वृद्धि होने पर तमिलनाडु और पुडुचेरी की संयुक्त सीटें 40 से बढ़कर लगभग 60 हो जाएँगी, जबकि उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 120 हो जाएँगी। अनुपात वही रहेगा, लेकिन संख्यात्मक खाई 40 से बढ़कर 60 हो जाएगी।
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने परिसीमन पर क्या कदम उठाया?
मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने 8 अगस्त को चेन्नई में सांसदों की एक बैठक बुलाई, जिसमें परिसीमन के प्रभावों पर चर्चा हुई और राज्य के संसदीय प्रतिनिधित्व की रक्षा के लिए सर्वदलीय सहमति बनाने का प्रयास किया गया।
दक्षिणी राज्य परिसीमन का विरोध क्यों कर रहे हैं?
दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि उन्होंने जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने में सफलता पाई है, और यदि सीटों का आवंटन केवल जनसंख्या के आधार पर हुआ तो उन्हें इस उपलब्धि के लिए दंड मिलेगा। उनकी माँग है कि जनसांख्यिकीय प्रदर्शन को भी सीट-आवंटन में उचित महत्व दिया जाए।
क्या लोकसभा सीटें बढ़ाने से संसदीय कार्यप्रणाली बेहतर होगी?
कार्ति चिदंबरम के अनुसार नहीं — उन्होंने कहा कि मौजूदा 543 सदस्यीय लोकसभा में भी सांसदों को बहसों में भाग लेने के सीमित अवसर मिलते हैं। सदन की संख्या बढ़ाने से संसदीय कार्यप्रणाली की गुणवत्ता में सुधार होना आवश्यक नहीं है।
राष्ट्र प्रेस
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