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पोस्टल बैलेट विवाद: केरल हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग से मांगा मंगलवार तक जवाब

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पोस्टल बैलेट विवाद: केरल हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग से मांगा मंगलवार तक जवाब

सारांश

केरल हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को मंगलवार तक जवाब देने का निर्देश दिया है कि बैलेट पेपर न मिलने से वंचित हुए कर्मचारियों को मतदान का मौका दिया जाए। 4 मई की मतगणना से पहले यह मामला चुनावी निष्पक्षता पर बड़ा सवाल बन गया है।

मुख्य बातें

केरल हाईकोर्ट ने 24 अप्रैल को चुनाव आयोग (ECI) को मंगलवार, 29 अप्रैल तक जवाब देने का निर्देश दिया।
जवाब मांगा गया है कि 9 अप्रैल के मतदान में पोस्टल बैलेट से वंचित कर्मचारियों को अतिरिक्त मतदान सुविधा दी जा सकती है या नहीं।
कई कर्मचारियों को 6 अप्रैल तक बैलेट पेपर नहीं मिले, जबकि वोटिंग की समय-सीमा 1 से 8 अप्रैल थी।
केरल विधानसभा के 140 सीटों की मतगणना 4 मई को होनी है, जिससे पहले यह मामला निर्णायक हो सकता है।
केरल एनजीओ यूनियन की रिट याचिका और एक सरकारी कर्मचारी की अर्जी इस कानूनी लड़ाई की नींव बनी।
'कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल्स, 1961' के तहत चुनाव ड्यूटी कर्मचारियों को पोस्टल बैलेट से मतदान का कानूनी अधिकार प्राप्त है।

कोच्चि, 24 अप्रैलकेरल हाईकोर्ट ने शुक्रवार को भारतीय चुनाव आयोग (ECI) को निर्देश दिया कि वह मंगलवार, 29 अप्रैल तक यह स्पष्ट करे कि क्या उन मतदाताओं के लिए अतिरिक्त पोस्टल वोटिंग सुविधा दी जा सकती है, जो 9 अप्रैल को हुए मतदान में बैलेट पेपर न मिलने के कारण अपना वोट नहीं डाल पाए। यह मामला 4 मई को होने वाली मतगणना से ठीक पहले चुनावी निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह पूरा विवाद एक राज्य सरकारी कर्मचारी की याचिका से शुरू हुआ, जिसने अदालत में दावा किया कि पोस्टल वोटिंग की सभी अनिवार्य प्रक्रियाओं का पालन करने के बाद भी उसे अपना संवैधानिक मताधिकार नहीं दिया गया। इस याचिका ने उन सैकड़ों चुनाव ड्यूटी कर्मचारियों की पीड़ा को सामने रखा, जो बैलेट पेपर के वितरण में हुई देरी के शिकार बने।

केरल एनजीओ यूनियन ने भी इससे पहले एक रिट याचिका दायर की थी, जिसमें चुनाव ड्यूटी पर तैनात सरकारी कर्मचारियों को हो रही व्यापक परेशानियों का ब्यौरा दिया गया था। यूनियन ने बताया कि 'कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल्स, 1961' के तहत ऐसे कर्मचारियों को पोस्टल बैलेट के जरिए मतदान का कानूनी अधिकार प्राप्त है।

बैलेट वितरण में देरी और समय की तंगी

अधिकारियों के अनुसार, कई कर्मचारियों को 6 अप्रैल तक भी बैलेट पेपर नहीं मिले थे। वोट डालने के लिए 1 अप्रैल से 8 अप्रैल तक का समय दिया गया था, लेकिन 8 अप्रैल का अधिकांश समय ईवीएम और चुनाव सामग्री एकत्र करने में बीत गया। इस कारण कर्मचारियों के पास वोट डालने का व्यावहारिक अवसर ही नहीं बचा।

यह समस्या इसलिए और गंभीर हो जाती है क्योंकि केरल विधानसभा के लिए 140 सदस्य चुने जाने हैं और कई निर्वाचन क्षेत्रों में मुकाबला बेहद कड़ा है। ऐसे में पोस्टल बैलेट की संख्या चुनाव परिणाम को पलट सकती है।

चुनाव आयोग का पूर्व आश्वासन और वर्तमान स्थिति

8 अप्रैल को चुनाव आयोग ने अदालत को भरोसा दिलाया था कि पोलिंग कर्मचारी ड्यूटी पर जाने से पहले पोस्टल बैलेट से वोट दे सकेंगे। लेकिन जमीनी हकीकत इस आश्वासन से बिल्कुल अलग रही। अब हाईकोर्ट की बेंच ने आयोग से पूछा है कि वह रिकॉर्ड पर यह स्पष्ट करे कि क्या वंचित मतदाताओं के लिए डाक मतदान व्यवस्था का विस्तार या सरलीकरण व्यावहारिक रूप से संभव है।

लोकतांत्रिक अधिकार और व्यापक प्रभाव

यह मामला सिर्फ केरल तक सीमित नहीं है। पोस्टल बैलेट व्यवस्था में खामियां पूरे देश में चुनाव ड्यूटी कर्मचारियों के मताधिकार पर सवाल उठाती हैं। 'कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल्स, 1961' में स्पष्ट प्रावधान होने के बावजूद यदि क्रियान्वयन में इतनी बड़ी चूक होती है, तो यह चुनावी तंत्र की संरचनात्मक कमजोरी को उजागर करता है।

गौरतलब है कि यह पहला मामला नहीं है जब पोस्टल बैलेट को लेकर विवाद सामने आया हो। विभिन्न राज्यों में पहले भी ऐसी शिकायतें दर्ज हुई हैं, लेकिन अदालती हस्तक्षेप इस स्तर पर कम ही देखा गया है।

अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई मंगलवार को तय की है। 4 मई को होने वाली मतगणना से पहले यदि न्यायालय कोई निर्देश जारी करता है, तो उसका चुनाव परिणामों पर सीधा असर पड़ सकता है। सभी की निगाहें अब चुनाव आयोग के अगले जवाब पर टिकी हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि चुनावी तंत्र की उस संरचनात्मक विफलता का प्रमाण है जो कागज पर अधिकार देती है और जमीन पर छीन लेती है। विडंबना यह है कि जो कर्मचारी लोकतंत्र की रक्षा के लिए मैदान में उतरे, वही अपना मताधिकार खो बैठे। चुनाव आयोग का 8 अप्रैल का आश्वासन खोखला साबित हुआ और अब न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ा। 4 मई की मतगणना से पहले यदि अदालत कोई राहत देती है, तो यह भारतीय चुनाव प्रबंधन के लिए एक ऐतिहासिक नजीर बनेगा।
RashtraPress
28 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

केरल हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग से क्या जवाब मांगा है?
केरल हाईकोर्ट ने ECI को मंगलवार तक यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि क्या उन मतदाताओं को अतिरिक्त पोस्टल वोटिंग सुविधा दी जा सकती है जो बैलेट पेपर न मिलने के कारण वोट नहीं दे पाए। अदालत ने आयोग से इस व्यावहारिकता पर अपना मत रिकॉर्ड पर रखने को कहा है।
पोस्टल बैलेट से कर्मचारी वोट क्यों नहीं दे पाए?
बैलेट पेपर के वितरण में देरी के कारण कई कर्मचारियों को 6 अप्रैल तक भी बैलेट नहीं मिले, जबकि वोटिंग की अंतिम तारीख 8 अप्रैल थी। उस दिन का अधिकांश समय ईवीएम और चुनाव सामग्री जुटाने में बीत गया, जिससे वोट देने का व्यावहारिक अवसर नहीं बचा।
केरल में मतगणना कब होगी और यह मामला कितना महत्वपूर्ण है?
केरल विधानसभा चुनाव की मतगणना 4 मई को होनी है। कड़े मुकाबले वाले निर्वाचन क्षेत्रों में पोस्टल बैलेट निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं, इसलिए यह मामला अत्यंत महत्वपूर्ण है।
केरल एनजीओ यूनियन ने इस मामले में क्या भूमिका निभाई?
केरल एनजीओ यूनियन ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर चुनाव ड्यूटी कर्मचारियों की समस्याओं को उजागर किया था। यूनियन ने बताया कि 'कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल्स, 1961' के तहत इन कर्मचारियों को पोस्टल बैलेट से वोट देने का कानूनी अधिकार है।
क्या चुनाव आयोग ने पहले इस समस्या पर कोई आश्वासन दिया था?
हां, 8 अप्रैल को चुनाव आयोग ने अदालत को आश्वस्त किया था कि पोलिंग कर्मचारी ड्यूटी से पहले पोस्टल बैलेट से वोट दे सकेंगे। लेकिन जमीनी स्तर पर यह आश्वासन पूरी तरह लागू नहीं हो सका।
राष्ट्र प्रेस
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