ईडी हमला मामला: केरल हाईकोर्ट ने नौवें आरोपी हरीश कुमार को नोटिस जारी किया, 20 जुलाई को अगली सुनवाई
सारांश
मुख्य बातें
केरल उच्च न्यायालय ने 29 जून 2026 को कोच्चि में उस मामले में नौवें आरोपी हरीश कुमार को नोटिस जारी किया, जो विपक्ष के नेता पिनाराई विजयन और उनकी बेटी के किराए के आवास पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की तलाशी के दौरान अधिकारियों पर हुए हमले से संबंधित है। अदालत ने साथ ही पुलिस जांच की गति और जमानत रद्द करने की राज्य सरकार की याचिका पर कड़े सवाल उठाए।
मामले की पृष्ठभूमि
27 मई 2026 को ईडी की तलाशी के दौरान कथित तौर पर लगभग 300 लोग आवास के बाहर एकत्र हुए और ईडी अधिकारियों, सीआरपीएफ कर्मियों तथा पुलिस अधिकारियों पर हमला किया। अभियोजन पक्ष के अनुसार, अब तक इस मामले में 25 आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है।
राज्य सरकार ने तिरुवनंतपुरम की जिला अदालत के उस आदेश को केरल उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी, जिसमें नौवें आरोपी हरीश कुमार को जमानत दी गई थी। जस्टिस सी.एस. डायस इस याचिका पर सुनवाई कर रहे थे।
अदालत की टिप्पणियाँ और निर्देश
जस्टिस डायस ने राज्य के तत्काल जमानत रद्द करने के अनुरोध को अस्वीकार करते हुए स्पष्ट कहा, "मैं उनकी बात सुने बिना एकतरफा जमानत रद्द नहीं कर सकता। वह पहले से ही जमानत पर हैं।" अदालत ने हरीश कुमार को नोटिस जारी कर अपना जवाब दाखिल करने का समय दिया और 20 जुलाई को अगली सुनवाई की तारीख तय की।
अदालत ने अभियोजन पक्ष से यह भी पूछा कि जब आरोपी 27 दिनों तक न्यायिक हिरासत में था, तब पुलिस हिरासत की मांग क्यों नहीं की गई। जज ने सीधे शब्दों में पूछा, "वह 27 दिनों तक हिरासत में था। आप क्या कर रहे थे?"
अभियोजन पक्ष का पक्ष
अभियोजन महानिदेशक टी. आसफ अली ने बताया कि हरीश कुमार सहित आरोपियों के मोबाइल फोन फोरेंसिक जांच के लिए भेजे गए हैं और फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला की रिपोर्ट आने के बाद ही हिरासत में पूछताछ सार्थक होगी। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि हमले के पीछे कथित बड़ी साजिश की जांच अभी प्रारंभिक चरण में है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, वीडियो फुटेज और अन्य डिजिटल साक्ष्य घटना में हरीश कुमार की सक्रिय भागीदारी स्थापित करते हैं।
राज्य ने यह भी तर्क दिया कि जिला न्यायालय का जमानत आदेश इसलिए निष्प्रभावी हो गया क्योंकि लोक अभियोजक ने सुनवाई के दौरान गलत दलीलें प्रस्तुत की थीं।
न्यायालय का रुख
जस्टिस डायस ने राज्य के इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि एक अभियोजक केवल अदालत की सहायता करता है और जमानत देने या अस्वीकार करने का अंतिम निर्णय न्यायाधीश का होता है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि अभियोजक ने निर्देशों के विपरीत काम किया है, तो उसके खिलाफ अलग से कार्यवाही उचित होगी।
जस्टिस डायस ने संगठित अपराध प्रावधानों सहित कुछ आरोपों की प्रयोज्यता पर प्रथम दृष्टया संदेह भी व्यक्त किया और अभियोजन पक्ष से गंभीर चोटों से संबंधित आरोपों को मेडिकल रिकॉर्ड के साथ प्रमाणित करने को कहा।
आगे क्या होगा
अदालत ने स्पष्ट किया कि वह केवल यह जांचेगी कि जमानत आदेश में कोई कानूनी खामियाँ हैं या नहीं, और हरीश कुमार को मामले में दी गई कथित विशिष्ट भूमिका पर स्पष्टीकरण माँगा है। 20 जुलाई 2026 की अगली सुनवाई में राज्य और बचाव पक्ष दोनों के विस्तृत तर्क सामने आने की उम्मीद है, जिससे यह तय होगा कि हरीश कुमार की जमानत बरकरार रहती है या रद्द होती है।