कृष्ण जन्माष्टमी 4 सितंबर को: शुभ मुहूर्त 11:05 से 12:35, इस बार गृहस्थ और साधु एक साथ मनाएंगे पर्व
सारांश
मुख्य बातें
इस वर्ष कृष्ण जन्माष्टमी का महापर्व 4 सितंबर को मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को द्वापर युग में मध्यरात्रि में मथुरा के कारागार में देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। इस बार एक विशेष संयोग यह है कि गृहस्थ जातक और वैष्णव संप्रदाय दोनों एक ही दिन यह पर्व मनाएंगे — जो हर वर्ष नहीं होता।
विशेष संयोग क्यों है इस बार
ज्योतिषाचार्य पंडित शिप्रा सचदेव के अनुसार, इस बार की जन्माष्टमी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि गृहस्थ जातक और साधुगण दोनों 4 सितंबर को एक साथ यह पर्व मनाएंगे। सामान्यतः तिथि-भेद के कारण दोनों संप्रदायों में अलग-अलग दिन उत्सव होता है, किंतु इस वर्ष ऐसा नहीं है। गौरतलब है कि यह संयोग भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है।
अष्टमी तिथि और पूजा का शुभ मुहूर्त
पंडित शिप्रा सचदेव ने बताया कि अष्टमी तिथि 3-4 सितंबर की मध्यरात्रि 2:30 बजे से प्रारंभ होगी और 5 सितंबर की रात 12:30 बजे तक रहेगी। इसी आधार पर 4 सितंबर को जन्माष्टमी मनाना शास्त्रसम्मत माना जा रहा है। पूजा का शुभ मुहूर्त प्रातः 11:05 बजे से 12:35 बजे तक रहेगा, जिसमें भक्त पूर्ण विधि-विधान के साथ भगवान कृष्ण की आराधना कर सकते हैं।
मनोकामना पूर्ति के लिए विशेष उपाय
पंडित शिप्रा सचदेव ने भक्तों के लिए एक विशेष उपाय सुझाया। उनके अनुसार, 'अगर आपकी कोई भी इच्छा है या आप कृष्ण जी को प्रसन्न करना चाहते हैं तो उन्हें एक चांदी की बांसुरी उपहार में जरूर चढ़ाएं।' उन्होंने आगे कहा कि यदि घर में बाल गोपाल विराजमान हैं, तो उन्हें चांदी की बांसुरी अर्पित करें। यदि मंदिर में चढ़ाना हो और चांदी की बांसुरी संभव न हो, तो 'सामान्य बांसुरी खरीदकर उसमें अपनी विश डाल के श्री कृष्ण के चरणों में चढ़ा दीजिए।'
जन्माष्टमी की पूजन परंपरा
धार्मिक मान्यता है कि जन्माष्टमी पर भगवान कृष्ण को बांसुरी अर्पित करने से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस पावन अवसर पर मध्यरात्रि में बाल गोपाल का जन्मोत्सव मनाया जाता है, उन्हें झूला झुलाया जाता है और माखन-मिश्री का भोग लगाया जाता है। प्रयागराज सहित देशभर के मंदिरों में इस दिन विशेष श्रृंगार और भजन-कीर्तन के आयोजन होते हैं।
आगे क्या
4 सितंबर को सायंकाल से मंदिरों में विशेष तैयारियां शुरू हो जाएंगी और मध्यरात्रि 12 बजे जन्मोत्सव का मुख्य क्षण होगा। भक्तों को सलाह दी जाती है कि शुभ मुहूर्त में पूजन संपन्न करें और रात्रि जागरण में सम्मिलित हों।