दल-बदल विरोधी कानून पर लोकसभा में बहस की मांग, मनीष तिवारी ने दिया स्थगन प्रस्ताव नोटिस
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने सोमवार, 27 जुलाई को लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव का नोटिस दाखिल कर एक नए दल-बदल विरोधी कानून की ज़रूरत पर तत्काल चर्चा कराने की माँग की। उनका तर्क है कि मौजूदा व्यवस्था अवसरवाद से प्रेरित सामूहिक दल-बदल को रोकने में नाकाम रही है, जबकि वैचारिक असहमति की रक्षा भी उतनी ही ज़रूरी है।
मुख्य घटनाक्रम
संसद के मानसून सत्र के दौरान लोकसभा महासचिव को सौंपे गए नोटिस में तिवारी ने सदन की नियमित कार्यवाही — प्रश्नकाल, शून्यकाल और अन्य निर्धारित कार्य — स्थगित कर इस विषय पर विमर्श का आग्रह किया।
तिवारी ने अपने नोटिस में स्पष्ट किया: 'मैं प्रस्ताव करता हूँ कि यह सदन प्रश्नकाल, शून्यकाल और दिन की अन्य सभी निर्धारित कार्यवाही स्थगित कर दे, ताकि एक नए दल-बदल विरोधी कानून की आवश्यकता पर चर्चा की जा सके — जो अवसरवाद से प्रेरित और वास्तविक वैचारिक या नीतिगत मतभेदों से रहित सामूहिक राजनीतिक दल-बदल पर रोक लगाए, साथ ही संसद और विधानसभाओं के अंदर और बाहर ईमानदार और आलोचनात्मक असहमति के लिए स्थान प्रदान करे।'
सुप्रीम कोर्ट में समानांतर कानूनी चुनौती
यह माँग ऐसे समय में आई है जब वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने सर्वोच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल कर संविधान की दसवीं अनुसूची की मौजूदा न्यायिक व्याख्या को चुनौती दी है। सिब्बल का कहना है कि राजनीतिक विलय से जुड़े प्रावधानों की व्याख्या ने दल-बदल विरोधी व्यवस्था को खोखला कर दिया है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सिब्बल ने कहा: 'इसमें यह प्रश्न उठाया गया है कि क्या संसद की संरचना को इस तरह बदला जा सकता है, जैसा इस देश में हो रहा है, और इस संदर्भ में दसवीं अनुसूची के पैरा-4 की व्याख्या क्या होगी।'
हालिया दल-बदल की घटनाएँ जिन्होंने बहस को हवा दी
पिछले महीने शिवसेना नेता और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने मुंबई में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर घोषणा की कि शिवसेना (यूबीटी) के छह लोकसभा सांसद — संजय दीना पाटिल, संजय देशमुख, संजय जाधव, भाऊसाहेब वाकचौरे, नागेश पाटिल-अष्टिकर और ओमप्रकाश राजे निंबालकर — शिवसेना में शामिल हो गए हैं।
इससे पहले अप्रैल में आम आदमी पार्टी (AAP) के सात बागी राज्यसभा सांसदों को आधिकारिक तौर पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल किया गया था। राज्यसभा में उप-नेता पद से हटाए जाने के बाद राघव चड्ढा ने छह अन्य सांसदों के साथ AAP छोड़ BJP में शामिल होने का फैसला किया था।
दसवीं अनुसूची की कानूनी पृष्ठभूमि
दल-बदल विरोधी कानून संविधान की दसवीं अनुसूची में शामिल है, जिसे 1985 में राजीव गांधी सरकार के दौरान 52वें संविधान संशोधन के ज़रिये लागू किया गया था। इसका मकसद 'आया राम, गया राम' के उस दौर पर अंकुश लगाना था जो 1960 और 1970 के दशक में चरम पर था।
मौजूदा कानून के तहत किसी सांसद या विधायक को अयोग्य ठहराया जा सकता है यदि वह स्वेच्छा से पार्टी सदस्यता छोड़े, व्हिप के विरुद्ध मतदान करे या बिना अनुमति अनुपस्थित रहे। गौरतलब है कि सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र के राज्यपाल के प्रधान सचिव (2023) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने 'विधायी दल' और राजनीतिक दल के बीच स्पष्ट अंतर किया था और कहा था कि इन्हें एक-दूसरे से नहीं मिलाया जा सकता।
आगे क्या होगा
तिवारी ने सरकार से आग्रह किया है कि इस 'अत्यंत महत्वपूर्ण मामले' पर पूरी चर्चा की अनुमति दी जाए। यह ऐसे समय में आया है जब दसवीं अनुसूची की प्रभावशीलता पर संसदीय और न्यायिक — दोनों मोर्चों पर एक साथ सवाल उठ रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय में सिब्बल की याचिका और लोकसभा में तिवारी का स्थगन नोटिस मिलकर इस बहस को नई धार दे सकते हैं।