27 जुलाई 2026
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दल-बदल विरोधी कानून पर लोकसभा में बहस की मांग, मनीष तिवारी ने दिया स्थगन प्रस्ताव नोटिस

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दल-बदल विरोधी कानून पर लोकसभा में बहस की मांग, मनीष तिवारी ने दिया स्थगन प्रस्ताव नोटिस

सारांश

कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने मानसून सत्र में लोकसभा को रोककर दल-बदल विरोधी कानून पर बहस की माँग की है — ऐसे वक्त में जब शिवसेना और AAP के सांसदों के दल-बदल ने दसवीं अनुसूची की कमज़ोरियाँ उजागर कर दी हैं और सुप्रीम कोर्ट में भी इस पर याचिका दाखिल हो चुकी है।

मुख्य बातें

कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने 27 जुलाई को लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव नोटिस देकर नए दल-बदल विरोधी कानून पर तत्काल बहस की माँग की।
तिवारी चाहते हैं कि नया कानून अवसरवादी दल-बदल पर रोक लगाए और साथ ही वैचारिक असहमति की रक्षा भी करे।
राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने सर्वोच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल कर दसवीं अनुसूची के पैरा-4 की व्याख्या को चुनौती दी है।
पिछले महीने शिवसेना (यूबीटी) के 6 लोकसभा सांसद और अप्रैल में AAP के 7 राज्यसभा सांसद BJP में शामिल हुए।
दल-बदल विरोधी कानून 1985 में 52वें संविधान संशोधन के ज़रिये लागू हुआ था; 2023 के सुप्रीम कोर्ट फैसले ने 'विधायी दल' और राजनीतिक दल को अलग माना।

कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने सोमवार, 27 जुलाई को लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव का नोटिस दाखिल कर एक नए दल-बदल विरोधी कानून की ज़रूरत पर तत्काल चर्चा कराने की माँग की। उनका तर्क है कि मौजूदा व्यवस्था अवसरवाद से प्रेरित सामूहिक दल-बदल को रोकने में नाकाम रही है, जबकि वैचारिक असहमति की रक्षा भी उतनी ही ज़रूरी है।

मुख्य घटनाक्रम

संसद के मानसून सत्र के दौरान लोकसभा महासचिव को सौंपे गए नोटिस में तिवारी ने सदन की नियमित कार्यवाही — प्रश्नकाल, शून्यकाल और अन्य निर्धारित कार्य — स्थगित कर इस विषय पर विमर्श का आग्रह किया।

तिवारी ने अपने नोटिस में स्पष्ट किया: 'मैं प्रस्ताव करता हूँ कि यह सदन प्रश्नकाल, शून्यकाल और दिन की अन्य सभी निर्धारित कार्यवाही स्थगित कर दे, ताकि एक नए दल-बदल विरोधी कानून की आवश्यकता पर चर्चा की जा सके — जो अवसरवाद से प्रेरित और वास्तविक वैचारिक या नीतिगत मतभेदों से रहित सामूहिक राजनीतिक दल-बदल पर रोक लगाए, साथ ही संसद और विधानसभाओं के अंदर और बाहर ईमानदार और आलोचनात्मक असहमति के लिए स्थान प्रदान करे।'

सुप्रीम कोर्ट में समानांतर कानूनी चुनौती

यह माँग ऐसे समय में आई है जब वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने सर्वोच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल कर संविधान की दसवीं अनुसूची की मौजूदा न्यायिक व्याख्या को चुनौती दी है। सिब्बल का कहना है कि राजनीतिक विलय से जुड़े प्रावधानों की व्याख्या ने दल-बदल विरोधी व्यवस्था को खोखला कर दिया है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सिब्बल ने कहा: 'इसमें यह प्रश्न उठाया गया है कि क्या संसद की संरचना को इस तरह बदला जा सकता है, जैसा इस देश में हो रहा है, और इस संदर्भ में दसवीं अनुसूची के पैरा-4 की व्याख्या क्या होगी।'

हालिया दल-बदल की घटनाएँ जिन्होंने बहस को हवा दी

पिछले महीने शिवसेना नेता और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने मुंबई में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर घोषणा की कि शिवसेना (यूबीटी) के छह लोकसभा सांसदसंजय दीना पाटिल, संजय देशमुख, संजय जाधव, भाऊसाहेब वाकचौरे, नागेश पाटिल-अष्टिकर और ओमप्रकाश राजे निंबालकर — शिवसेना में शामिल हो गए हैं।

इससे पहले अप्रैल में आम आदमी पार्टी (AAP) के सात बागी राज्यसभा सांसदों को आधिकारिक तौर पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल किया गया था। राज्यसभा में उप-नेता पद से हटाए जाने के बाद राघव चड्ढा ने छह अन्य सांसदों के साथ AAP छोड़ BJP में शामिल होने का फैसला किया था।

दसवीं अनुसूची की कानूनी पृष्ठभूमि

दल-बदल विरोधी कानून संविधान की दसवीं अनुसूची में शामिल है, जिसे 1985 में राजीव गांधी सरकार के दौरान 52वें संविधान संशोधन के ज़रिये लागू किया गया था। इसका मकसद 'आया राम, गया राम' के उस दौर पर अंकुश लगाना था जो 1960 और 1970 के दशक में चरम पर था।

मौजूदा कानून के तहत किसी सांसद या विधायक को अयोग्य ठहराया जा सकता है यदि वह स्वेच्छा से पार्टी सदस्यता छोड़े, व्हिप के विरुद्ध मतदान करे या बिना अनुमति अनुपस्थित रहे। गौरतलब है कि सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र के राज्यपाल के प्रधान सचिव (2023) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने 'विधायी दल' और राजनीतिक दल के बीच स्पष्ट अंतर किया था और कहा था कि इन्हें एक-दूसरे से नहीं मिलाया जा सकता।

आगे क्या होगा

तिवारी ने सरकार से आग्रह किया है कि इस 'अत्यंत महत्वपूर्ण मामले' पर पूरी चर्चा की अनुमति दी जाए। यह ऐसे समय में आया है जब दसवीं अनुसूची की प्रभावशीलता पर संसदीय और न्यायिक — दोनों मोर्चों पर एक साथ सवाल उठ रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय में सिब्बल की याचिका और लोकसभा में तिवारी का स्थगन नोटिस मिलकर इस बहस को नई धार दे सकते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

गया राम' संस्कृति की उपज है जिसे रोकने के लिए यह कानून बना था। असली सवाल यह है कि क्या कोई भी नया कानून पीठासीन अधिकारियों की विवेकाधीन शक्ति और न्यायिक देरी की दोहरी कमज़ोरी को दूर कर सकता है — जो अब तक हर सुधार प्रयास की अचिल्स हील रही है।
RashtraPress
27 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मनीष तिवारी ने लोकसभा में किस मुद्दे पर बहस की माँग की है?
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने 27 जुलाई को लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव नोटिस देकर एक नए दल-बदल विरोधी कानून की ज़रूरत पर तत्काल चर्चा की माँग की है। उनका कहना है कि नया कानून अवसरवादी दल-बदल पर रोक लगाए और साथ ही वैचारिक असहमति के लिए जगह भी बनाए।
दल-बदल विरोधी कानून क्या है और यह कब बना?
दल-बदल विरोधी कानून संविधान की दसवीं अनुसूची में शामिल है, जिसे 1985 में राजीव गांधी सरकार के दौरान 52वें संविधान संशोधन के ज़रिये लागू किया गया था। इसका उद्देश्य 1960-70 के दशक की 'आया राम, गया राम' राजनीति पर अंकुश लगाना था, जिसमें निर्वाचित प्रतिनिधि मंत्री पद के लालच में पार्टी बदलते थे।
कपिल सिब्बल की सुप्रीम कोर्ट याचिका किस बारे में है?
राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सर्वोच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल कर दसवीं अनुसूची के पैरा-4 की मौजूदा न्यायिक व्याख्या को चुनौती दी है। उनका तर्क है कि राजनीतिक विलय से जुड़े प्रावधानों की व्याख्या ने दल-बदल विरोधी व्यवस्था को कमज़ोर किया है।
हाल ही में किन सांसदों ने दल-बदल किया जिससे यह बहस तेज़ हुई?
पिछले महीने शिवसेना (यूबीटी) के छह लोकसभा सांसद — संजय दीना पाटिल, संजय देशमुख, संजय जाधव, भाऊसाहेब वाकचौरे, नागेश पाटिल-अष्टिकर और ओमप्रकाश राजे निंबालकर — एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल हुए। इससे पहले अप्रैल में AAP के सात बागी राज्यसभा सांसद, जिनमें राघव चड्ढा शामिल थे, BJP में शामिल हो गए थे।
2023 के सुप्रीम कोर्ट फैसले ने दल-बदल कानून को कैसे प्रभावित किया?
सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र के राज्यपाल के प्रधान सचिव (2023) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 'विधायी दल' और राजनीतिक दल के बीच स्पष्ट अंतर किया। अदालत ने कहा कि दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता से बचने के लिए किसी दूसरी पार्टी में शामिल होना तब तक वैध आधार नहीं है, जब तक मूल राजनीतिक दल स्वयं किसी दूसरी पार्टी में विलय न कर ले।
राष्ट्र प्रेस
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