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मौलाना शहाबुद्दीन का मदनी को जवाब: भारत में मुसलमान प्रथम श्रेणी के नागरिक हैं

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मौलाना शहाबुद्दीन का मदनी को जवाब: भारत में मुसलमान प्रथम श्रेणी के नागरिक हैं

सारांश

मौलाना महमूद मदनी के बयान के जवाब में मौलाना शहाबुद्दीन ने बरेली से कहा — भारत में मुसलमान दूसरे दर्जे के नहीं, प्रथम श्रेणी के नागरिक हैं। धार्मिक स्वतंत्रता, शिक्षण संस्थान और परंपराएँ — सब बेरोकटोक जारी हैं। मुस्लिम धर्मगुरुओं के बीच यह खुली असहमति खुद एक बड़ा संकेत है।

मुख्य बातें

मौलाना शहाबुद्दीन ने 31 अक्टूबर को बरेली से मौलाना महमूद मदनी के बयान से खुलकर असहमति जताई।
शहाबुद्दीन के अनुसार, भारत में मुसलमान प्रथम श्रेणी के नागरिक हैं और उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता तथा समान अधिकार प्राप्त हैं।
उन्होंने कहा कि मुस्लिम शिक्षण संस्थान और धार्मिक स्थल स्वतंत्र रूप से संचालित हो रहे हैं।
लगभग 145 करोड़ की आबादी वाले देश में छिटपुट घटनाओं को पूरे समुदाय की स्थिति का पैमाना नहीं बनाया जाना चाहिए — यह उनका तर्क था।
उन्होंने मुसलमानों से अपील की कि वे डर नहीं, आत्मविश्वास के साथ अपने अधिकारों का उपयोग करें।

बरेली से मौलाना शहाबुद्दीन ने 31 अक्टूबर को जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी के उस बयान से खुलकर असहमति जताई, जिसमें मदनी ने भारत में मुसलमानों की स्थिति को लेकर चिंता व्यक्त की थी। शहाबुद्दीन ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत में मुसलमान द्वितीय श्रेणी नहीं, बल्कि प्रथम श्रेणी के नागरिक हैं और उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता तथा समान संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं।

मौलाना शहाबुद्दीन का मदनी को सीधा संदेश

मौलाना शहाबुद्दीन ने कहा कि मौलाना महमूद मदनी को यह स्वीकार करना चाहिए कि भारत में मुसलमान पूरी आज़ादी के साथ जीवन जी रहे हैं। उनके अनुसार, मुसलमान यहाँ अन्य नागरिकों की तरह सम्मानजनक जीवन व्यतीत कर रहे हैं — अपना व्यवसाय चला रहे हैं, धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन कर रहे हैं और अपनी इच्छा के अनुसार दैनिक जीवन गुज़ार रहे हैं। यह बयान ऐसे समय में आया है जब मुस्लिम समुदाय में नागरिक अधिकारों को लेकर सार्वजनिक बहस तेज़ हो रही है।

धार्मिक स्वतंत्रता के ठोस उदाहरण

शहाबुद्दीन ने कहा कि भारत में मुसलमान पाँच वक्त की नमाज़ अदा करते हैं और जुमे की नमाज़ के साथ-साथ ईद, बकरीद और ईद मिलादुन्नबी जैसे त्योहार मनाते हैं। मोहर्रम, जुलूस-ए-गौसिया और अन्य धार्मिक जुलूस भी परंपरागत तरीके से निकाले जाते हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि मुस्लिम शिक्षण संस्थान और धार्मिक स्थल स्वतंत्र रूप से संचालित हो रहे हैं — न तो सरकार का, न ही किसी अन्य समुदाय का उन पर कोई नियंत्रण है।

छिटपुट घटनाओं को समग्र स्थिति का पैमाना न बनाएँ

मौलाना शहाबुद्दीन ने स्वीकार किया कि देश में कुछ स्थानों पर सांप्रदायिक तनाव की घटनाएँ हुई हैं, लेकिन उन्होंने इन्हें लगभग 145 करोड़ की आबादी वाले देश के संदर्भ में रखकर देखने की अपील की। उनका तर्क था कि इतनी विशाल जनसंख्या में छिटपुट घटनाएँ किसी एक समुदाय की समग्र स्थिति की प्रतिनिधि नहीं हो सकतीं।

उन्होंने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य देते हुए कहा कि मुस्लिम शासकों के दौर में भी ऐसी घटनाएँ होती थीं और ब्रिटिश शासनकाल में भी। इसलिए किसी एक घटना के आधार पर पूरे देश या किसी समुदाय के बारे में नकारात्मक धारणा बनाना उचित नहीं है।

हिंदू-मुस्लिम या दलीय चश्मे से न देखें

शहाबुद्दीन ने यह भी कहा कि ऐसी घटनाओं को हिंदू-मुस्लिम या भारतीय जनता पार्टी (BJP)-भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) के राजनीतिक नज़रिए से देखना भी सही नहीं है। उनके अनुसार, इस तरह का ध्रुवीकरण समाज में अनावश्यक भ्रम और वैमनस्य पैदा करता है।

मुसलमानों से अपील: डर नहीं, आत्मविश्वास के साथ जिएँ

मौलाना शहाबुद्दीन ने मुसलमानों से आह्वान किया कि वे भय और आशंका के माहौल में जीने की बजाय आत्मविश्वास के साथ अपने अधिकारों का उपयोग करें। उन्होंने कहा कि यह देश उनके पूर्वजों की धरती है और उन पूर्वजों ने भारत की स्वतंत्रता में भी योगदान दिया है। ऐसे में अपनी नागरिकता और अधिकारों को लेकर भयभीत होने की कोई ज़रूरत नहीं है। आने वाले समय में यह बहस और गहरी हो सकती है, क्योंकि मुस्लिम धर्मगुरुओं के बीच ही इस मुद्दे पर अलग-अलग राय सामने आ रही हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि मुस्लिम धार्मिक नेतृत्व के भीतर से ही आई है — जो अपने आप में एक महत्त्वपूर्ण घटनाक्रम है। हालाँकि उनकी दलीलें सकारात्मक और एकता-केंद्रित हैं, लेकिन आलोचक यह भी पूछ सकते हैं कि क्या यह बयान ज़मीनी वास्तविकताओं की जटिलता को पूरी तरह स्वीकार करता है। गौरतलब है कि मदनी जैसे वरिष्ठ धर्मगुरु के बयान और शहाबुद्दीन की प्रतिक्रिया — दोनों एक साथ सार्वजनिक हैं, जो दर्शाता है कि मुस्लिम समुदाय के भीतर ही इस मुद्दे पर एकमत नहीं है। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर इस आंतरिक विमर्श को नज़रअंदाज़ कर देती है, जबकि यही विमर्श समुदाय की दिशा तय करने में सबसे अधिक प्रासंगिक है।
RashtraPress
1 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मौलाना शहाबुद्दीन ने मौलाना मदनी के किस बयान पर प्रतिक्रिया दी?
मौलाना महमूद मदनी ने भारत में मुसलमानों की स्थिति को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए उन्हें दूसरे दर्जे के नागरिक जैसी स्थिति में बताया था। इसी बयान पर मौलाना शहाबुद्दीन ने असहमति जताते हुए कहा कि भारत में मुसलमान प्रथम श्रेणी के नागरिक हैं।
मौलाना शहाबुद्दीन के अनुसार भारत में मुसलमानों को कौन-कौन सी स्वतंत्रताएँ प्राप्त हैं?
उनके अनुसार, भारत में मुसलमान पाँच वक्त की नमाज़, जुमे की नमाज़, ईद, बकरीद, मोहर्रम और अन्य धार्मिक जुलूस स्वतंत्र रूप से मनाते हैं। मुस्लिम शिक्षण संस्थान और धार्मिक स्थल भी बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के संचालित होते हैं।
मौलाना शहाबुद्दीन ने सांप्रदायिक घटनाओं के बारे में क्या कहा?
उन्होंने स्वीकार किया कि देश में कुछ स्थानों पर ऐसी घटनाएँ हुई हैं, लेकिन कहा कि लगभग 145 करोड़ की आबादी वाले देश में छिटपुट घटनाओं को पूरे समुदाय की स्थिति का पैमाना नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा कि ऐसी घटनाएँ मुस्लिम और ब्रिटिश शासनकाल में भी होती थीं।
क्या मौलाना शहाबुद्दीन ने इन घटनाओं को राजनीतिक नज़रिए से देखने की बात की?
नहीं, उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि ऐसी घटनाओं को हिंदू-मुस्लिम या BJP-कांग्रेस के राजनीतिक चश्मे से देखना उचित नहीं है। उनके अनुसार इस तरह का ध्रुवीकरण समाज में अनावश्यक भ्रम पैदा करता है।
मौलाना शहाबुद्दीन ने मुसलमानों से क्या अपील की?
उन्होंने मुसलमानों से अपील की कि वे डर और आशंका के बजाय आत्मविश्वास के साथ अपने अधिकारों का उपयोग करें। उन्होंने कहा कि यह देश उनके पूर्वजों की धरती है और उन पूर्वजों ने भारत की आज़ादी में भी योगदान दिया है।
राष्ट्र प्रेस
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