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नेपाल से गांजा तस्करी: बिहार बना मुख्य प्रवेश मार्ग, पूर्वोत्तर में सख्ती के बाद नया रूट सक्रिय

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नेपाल से गांजा तस्करी: बिहार बना मुख्य प्रवेश मार्ग, पूर्वोत्तर में सख्ती के बाद नया रूट सक्रिय

सारांश

पूर्वोत्तर में सुरक्षा कड़ी होने के बाद गांजा तस्करी नेटवर्क ने नेपाल को नया अड्डा बना लिया है। बिहार की 1,751 किमी खुली सीमा से होकर माल दक्षिण भारत, श्रीलंका और आगे अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों तक पहुँच रहा है। एनसीबी ने हाल ही में काठमांडू-सोनौली मार्ग से सक्रिय एक अंतरराष्ट्रीय गिरोह का भंडाफोड़ किया है।

मुख्य बातें

केंद्रीय एजेंसियों के अनुसार, पूर्वोत्तर में सख्ती के बाद गांजा तस्करी नेटवर्क नेपाल की ओर स्थानांतरित हो गया है।
नेपाल के सुनसरी जिले को तस्करी का प्रमुख केंद्र चिह्नित किया गया; बिहार के अररिया और सुपौल जिले मुख्य प्रवेश बिंदु हैं।
भारत-नेपाल की 1,751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा तस्करों के लिए बड़ी सुविधा बनी हुई है।
एनसीबी ने हाल ही में काठमांडू-सोनौली मार्ग से सक्रिय अंतरराष्ट्रीय ड्रग गिरोह का भंडाफोड़ किया।
खुफिया ब्यूरो के अनुसार, इसी नेटवर्क का उपयोग अतीत में भारतीय मुजाहिदीन ने भी किया था।
संयुक्त राष्ट्र भारत-नेपाल सीमा को मादक पदार्थ, मानव तस्करी और हथियार तस्करी के लिहाज़ से संवेदनशील बता चुका है।

केंद्रीय जांच एजेंसियों के अनुसार, पूर्वोत्तर राज्यों में सीमा सुरक्षा कड़ी होने और अवैध गांजा खेती पर अंकुश लगने के बाद तस्करों का नेटवर्क अब नेपाल की ओर स्थानांतरित हो गया है। नेपाल के सुनसरी जिले में बड़े पैमाने पर उगाए जा रहे गांजे को बिहार के अररिया और सुपौल जिलों से लगी खुली भारत-नेपाल सीमा के जरिए भारत में लाया जा रहा है, जहाँ से यह दक्षिण भारत, श्रीलंका और आगे अमेरिका तथा यूरोप के अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों तक पहुँचाया जाता है।

पूर्वोत्तर में सख्ती और नए रूट की तलाश

अधिकारियों के अनुसार, 2014 के बाद पूर्वोत्तर राज्यों — असम, त्रिपुरा, मणिपुर, मेघालय और मिजोरम — में सीमा सुरक्षा और विकास कार्यों पर विशेष ज़ोर दिए जाने से इन राज्यों में गांजे की अवैध खेती में भारी कमी आई। इसके परिणामस्वरूप तस्करी नेटवर्क ने नेपाल को वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत के रूप में अपना लिया। विशेषज्ञों का कहना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में उगाया गया गांजा बेहतर गुणवत्ता का होने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में इसकी माँग अधिक है।

गौरतलब है कि नेपाल ने 1976 में गांजे की खेती पर आधिकारिक रूप से प्रतिबंध लगा दिया था, हालाँकि समय-समय पर इस प्रतिबंध को हटाने की माँग उठती रही है। इसके बावजूद कथित तौर पर पहाड़ी इलाकों में अवैध खेती जारी है।

तस्करी का रूट और तरीका

जांच एजेंसियों ने नेपाल के सुनसरी जिले को इस तस्करी नेटवर्क का प्रमुख केंद्र चिह्नित किया है। यहाँ से गांजे की खेप बिहार की 1,751 किलोमीटर लंबी खुली भारत-नेपाल सीमा के ज़रिए भारत में प्रवेश करती है। तस्कर निजी कारों, मोटरसाइकिलों और ट्रकों का उपयोग कर मादक पदार्थों की खेप पहुँचाते हैं।

खुफिया ब्यूरो (आईबी) के अधिकारियों के अनुसार, सीमा पार कराने वाले दलाल इस नेटवर्क में अहम भूमिका निभाते हैं — ये लोग शुल्क लेकर नेपाल से बिहार तक लोगों और तस्करी के सामान को बिना पकड़े पहुँचाने में सहायता करते हैं। अधिकारियों का दावा है कि अतीत में इसी नेटवर्क का उपयोग पाकिस्तान से नेपाल पहुँचे संदिग्धों को भारत में दाखिल कराने के लिए भी किया गया था, और भारतीय मुजाहिदीन ने भी इस मार्ग का इस्तेमाल किया था।

एनसीबी की कार्रवाई और हालिया भंडाफोड़

नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) ने हाल ही में नेपाल, भारत और श्रीलंका में सक्रिय एक अंतरराष्ट्रीय ड्रग तस्करी गिरोह का भंडाफोड़ किया। जांच में सामने आया कि काठमांडू से चरस और हैशिश ऑयल को सोनौली सीमा मार्ग के ज़रिए भारत में तस्करी की जा रही थी। केंद्रीय एजेंसियाँ और एनसीबी इस पूरे नेटवर्क पर कड़ी नज़र बनाए हुए हैं और प्रमुख ट्रांजिट पॉइंट्स पर निगरानी बढ़ाई गई है।

अधिकारियों के मुताबिक नेपाल से आने वाली गांजे की खेप पाकिस्तान या 'गोल्डन ट्राएंगल' क्षेत्र से आने वाले मादक पदार्थों की तुलना में मात्रा में कम होती है, लेकिन इसकी आवृत्ति काफी अधिक रहती है।

व्यापक सुरक्षा चिंताएँ

अधिकारियों ने बताया कि सबसे बड़ी चिंता पाकिस्तान से ड्रोन के ज़रिए भेजे जा रहे मादक पदार्थ हैं। संयुक्त राष्ट्र भी भारत-नेपाल की खुली सीमा को मानव तस्करी, मादक पदार्थों की तस्करी, नकली मुद्रा और हथियारों की तस्करी के लिहाज़ से संवेदनशील बता चुका है। भारतीय एजेंसियों के अनुसार उत्तर प्रदेश से लगी सीमा का भी तस्करी के लिए उपयोग होता है, लेकिन बिहार का मार्ग तस्करों की पहली पसंद बना हुआ है।

आगे की राह

केंद्र सरकार की 'नशामुक्त भारत' रणनीति के तहत मादक पदार्थों के विरुद्ध अभियान तेज़ किया गया है। एनसीबी और केंद्रीय एजेंसियाँ बिहार-नेपाल सीमा पर समन्वित निगरानी बढ़ा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक खुली सीमा पर तकनीकी निगरानी और द्विपक्षीय सहयोग नहीं बढ़ता, तस्करी के नेटवर्क नए रास्ते खोजते रहेंगे।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन 1,751 किलोमीटर की खुली सीमा पर बिना तकनीकी निगरानी और भारत-नेपाल द्विपक्षीय सहयोग के, नेटवर्क हर बार नया रास्ता खोज लेता है। एनसीबी के भंडाफोड़ महत्वपूर्ण हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल प्रवर्तन से उस आपूर्ति श्रृंखला को तोड़ा जा सकता है जिसमें दलाल, वाहक और अंतरराष्ट्रीय खरीदार तीनों सक्रिय हैं। संयुक्त राष्ट्र की चेतावनियों के बावजूद इस सीमा पर संरचनात्मक बदलाव की गति धीमी रही है।
RashtraPress
2 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नेपाल से भारत में गांजा तस्करी का मुख्य मार्ग कौन-सा है?
केंद्रीय एजेंसियों के अनुसार, नेपाल के सुनसरी जिले से गांजा बिहार के अररिया और सुपौल जिलों से लगी खुली सीमा के ज़रिए भारत में लाया जाता है। यहाँ से सड़क मार्ग से दक्षिण भारत और फिर श्रीलंका होते हुए अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों तक पहुँचाया जाता है।
पूर्वोत्तर से तस्करी रूट नेपाल की ओर क्यों शिफ्ट हुआ?
2014 के बाद असम, त्रिपुरा, मणिपुर, मेघालय और मिजोरम में सीमा सुरक्षा कड़ी होने और अवैध गांजा खेती पर अंकुश लगने के बाद तस्करों ने नेपाल को वैकल्पिक स्रोत बना लिया। विशेषज्ञों के अनुसार पहाड़ी क्षेत्र में उगाए गांजे की अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में अधिक माँग भी इसका कारण है।
एनसीबी ने हाल ही में कौन-सा बड़ा भंडाफोड़ किया?
नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) ने नेपाल, भारत और श्रीलंका में सक्रिय एक अंतरराष्ट्रीय ड्रग तस्करी गिरोह का भंडाफोड़ किया। जांच में सामने आया कि काठमांडू से चरस और हैशिश ऑयल को सोनौली सीमा मार्ग के ज़रिए भारत में लाया जा रहा था।
भारत-नेपाल खुली सीमा सुरक्षा के लिहाज़ से कितनी संवेदनशील है?
भारत-नेपाल की 1,751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा को संयुक्त राष्ट्र भी मादक पदार्थ, मानव तस्करी, नकली मुद्रा और हथियारों की तस्करी के लिहाज़ से संवेदनशील बता चुका है। खुफिया ब्यूरो के अनुसार, अतीत में इसी नेटवर्क का उपयोग भारतीय मुजाहिदीन ने भी किया था।
नेपाल में गांजे की खेती की कानूनी स्थिति क्या है?
नेपाल ने 1976 में गांजे की खेती पर आधिकारिक प्रतिबंध लगाया था। हालाँकि समय-समय पर इस प्रतिबंध को हटाने की माँग उठती रही है और कथित तौर पर पहाड़ी इलाकों में अवैध खेती जारी है।
राष्ट्र प्रेस
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