कर्नाटक नीति आयोग सदस्य हेगड़े का प्रस्ताव: 2027–2037 के लिए 'न्यूवे' राष्ट्रीय सुरक्षा ढाँचा, 16 घटक शामिल
सारांश
मुख्य बातें
कर्नाटक राज्य नीति एवं योजना आयोग के सदस्य एस. मोहनदास हेगड़े ने 23 अक्टूबर 2026 को बेंगलुरु में 'न्यूवे नेशनल सिक्योरिटी एंड स्ट्रैटेजिक रेजिलिएंस फ्रेमवर्क' का प्रस्ताव प्रस्तुत किया, जो 2027 से 2037 तक की दस वर्षीय समयसीमा को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि वह देश की दीर्घकालिक सुरक्षा एवं रणनीतिक तैयारियों को सुदृढ़ करने के लिए इस व्यापक अवधारणा की प्रारंभिक जाँच करे।
प्रस्ताव की मुख्य अवधारणा
इस ढाँचे का केंद्रीय विचार यह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा का दायरा पारंपरिक रक्षा से कहीं अधिक व्यापक है। हेगड़े के अनुसार, ऊर्जा आपूर्ति, डिजिटल बुनियादी ढाँचा, अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखलाएँ, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियाँ, जल संसाधन और आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं में आने वाली बाधाएँ — ये सब परस्पर जुड़े जोखिम हैं जिन्हें एकीकृत दृष्टि से देखा जाना चाहिए।
प्रस्ताव में रक्षा तैयारियों, आंतरिक सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता, तकनीकी प्रगति, महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे की सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और संवैधानिक शासन को एक समन्वित 'राष्ट्रीय लचीलापन' (नेशनल रेजिलिएंस) दृष्टिकोण के अंतर्गत लाने की बात कही गई है। यह ऐसे समय में आया है जब साइबर खतरे, जलवायु आपदाएँ और भू-राजनीतिक तनाव एक साथ सुरक्षा नीति पर दबाव बना रहे हैं।
16 घटक और साझा सिद्धांत
ढाँचे में नीतिगत विचार के लिए 16 घटकों की पहचान की गई है। इनमें रक्षा एवं सैन्य सुरक्षा, आंतरिक सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचा, आर्थिक एवं वित्तीय सुरक्षा, ऊर्जा-जल-खाद्य सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, जलवायु एवं आपदा तैयारियाँ, रणनीतिक प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष एवं समुद्री सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखलाएँ, सूचना लचीलापन, संस्थागत शासन, नागरिक तैयारी और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति शामिल हैं।
प्रस्ताव में इन क्षेत्रों की समीक्षा के लिए संस्थानों के बीच समन्वय, जोखिम-आधारित प्राथमिकता निर्धारण, मानवीय निगरानी, संवैधानिक सुरक्षा उपाय, केंद्र-राज्य सहयोग, मापनीय परिणाम और वित्तीय जवाबदेही जैसे साझा सिद्धांत सुझाए गए हैं।
प्रौद्योगिकी और संस्थागत सुझाव
एक उल्लेखनीय सिफारिश यह है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स का उपयोग जोखिम के पूर्वानुमान, बुनियादी ढाँचे की मैपिंग और अर्ली वार्निंग प्रणाली के लिए किया जाए। साथ ही, यह भी स्पष्ट किया गया है कि सुरक्षा, कानूनी और प्रशासनिक मामलों से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय अधिकृत मानवीय अधिकारियों के पास ही रहने चाहिए।
प्रस्ताव में CERT-In, नेशनल क्रिटिकल इंफॉर्मेशन इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोटेक्शन सेंटर (NCIIPC) और आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों जैसी मौजूदा संस्थाओं को मजबूत करने पर बल दिया गया है — नए समानांतर ढाँचे खड़े करने के बजाय।
चार चरणों का रोडमैप
प्रस्तावित रोडमैप को चार चरणों में बाँटा गया है। 2027–2028 में मौजूदा नीतियों की समीक्षा और समन्वय में मौजूद कमियों की पहचान होगी। 2029–2031 के दौरान क्षमता विकास पर ध्यान दिया जाएगा। 2032–2034 में एकीकृत राष्ट्रीय लचीलेपन को बेहतर बनाया जाएगा। अंतिम चरण 2035–2037 में स्वतंत्र मूल्यांकन, व्यय का आकलन और भविष्य की प्राथमिकताओं की पहचान की जाएगी।
गौरतलब है कि हेगड़े ने स्वयं स्पष्ट किया है कि यह केवल एक नीतिगत अवधारणा है जिसे जाँच और परामर्श के लिए पेश किया गया है — यह कोई स्वीकृत सरकारी कार्यक्रम नहीं है। इसे अपनाना या लागू करना सक्षम प्राधिकारियों की मंजूरी के अधीन होगा।
आगे की राह
हेगड़े ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि वह केंद्रीय मंत्रालयों, राज्य सरकारों, सुरक्षा संस्थानों, नियामकों, वैज्ञानिक प्रतिष्ठानों, उद्योग जगत और तकनीकी विशेषज्ञों से सुझाव माँगे तथा संस्थागत उपयुक्तता, तकनीकी आवश्यकताओं, कानूनी प्रभावों और वित्तीय व्यवहार्यता का अध्ययन कराए। इस पहल का अंतिम लक्ष्य राष्ट्रीय तैयारियों को सुदृढ़ करना, नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करना है।