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ओडिशा राज्यपाल कम्भमपति का कॉरपोरेट जगत से आह्वान: सीएसआर को सिर्फ अनुपालन नहीं, विकास की जिम्मेदारी बनाएं

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ओडिशा राज्यपाल कम्भमपति का कॉरपोरेट जगत से आह्वान: सीएसआर को सिर्फ अनुपालन नहीं, विकास की जिम्मेदारी बनाएं

सारांश

ओडिशा के राज्यपाल हरि बाबू कम्भमपति ने भुवनेश्वर में कॉरपोरेट जगत को स्पष्ट संदेश दिया — सीएसआर को 'खर्च करो और रिपोर्ट करो' की लीक से हटाकर रणनीतिक, समावेशी और परिणामोन्मुख बनाएं। खनन-प्रभावित क्षेत्रों से लेकर आदिवासी जिलों तक, उन्होंने कॉरपोरेट भागीदारी को विकास की असली कसौटी बताया।

मुख्य बातें

ओडिशा राज्यपाल हरि बाबू कम्भमपति ने 18 अगस्त 2026 को भुवनेश्वर में 'ब्रिज भारत कॉन्क्लेव 2026' को संबोधित किया।
उन्होंने कॉरपोरेट जगत से सीएसआर को महज अनुपालन नहीं, बल्कि रणनीतिक और परिणामोन्मुख दायित्व बनाने का आग्रह किया।
कंपनीज एक्ट, 2013 के तहत सीएसआर ढाँचे में स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका, महिला सशक्तिकरण और आपदा प्रबंधन शामिल हैं।
आदिवासी और पिछड़े जिलों में शिक्षा, डिजिटल लर्निंग और मेंटरशिप को प्राथमिकता देने पर विशेष जोर।
खनन-प्रभावित क्षेत्रों में वन संरक्षण, जल सुरक्षा और महिला उद्यमिता के लिए कॉरपोरेट सहयोग बढ़ाने की अपील।

ओडिशा के राज्यपाल हरि बाबू कम्भमपति ने मंगलवार, 18 अगस्त 2026 को भुवनेश्वर में कॉरपोरेट जगत से आग्रह किया कि वे कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) को महज कानूनी दायित्व की पूर्ति तक सीमित न रखें, बल्कि इसे राज्य के समग्र विकास में सक्रिय भागीदारी का माध्यम बनाएं। 'ब्रिज भारत कॉन्क्लेव 2026' और 'सीएसआर: उभरते मुद्दे और चुनौतियां' विषयक राष्ट्रीय सेमिनार में बोलते हुए उन्होंने कहा कि सीएसआर अब दान-धर्म की परिधि से निकलकर समुदायों, लोगों और पर्यावरण के प्रति एक व्यापक जवाबदेही का रूप ले चुका है।

सीएसआर की बदलती परिभाषा

राज्यपाल कम्भमपति ने कहा कि कंपनीज एक्ट, 2013 के अंतर्गत भारत के सीएसआर ढाँचे ने सामाजिक विकास में कॉरपोरेट भागीदारी को एक संस्थागत स्वरूप दिया है। इस ढाँचे के तहत स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका, महिला सशक्तिकरण, पर्यावरणीय स्थिरता, ग्रामीण विकास और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में संसाधन लगाए जा रहे हैं।

उन्होंने स्पष्ट किया कि सीएसआर का उद्देश्य केवल नियमों का अनुपालन नहीं होना चाहिए। उन्होंने 'खर्च करो और रिपोर्ट करो' वाली परंपरागत सोच को बदलकर एक ऐसे मॉडल की वकालत की जो रणनीतिक हो, समावेशी हो और परिणामोन्मुख हो।

पारदर्शिता और सामुदायिक भागीदारी पर जोर

राज्यपाल ने सीएसआर पहलों को विश्वसनीय ढंग से लागू करने, समुदाय की अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित करने और उनके प्रभाव को मापने योग्य संकेतकों से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब ओडिशा में स्टील, बिजली, खनन और विनिर्माण क्षेत्रों में तेज़ औद्योगीकरण हो रहा है, जिससे पर्यावरणीय जिम्मेदारी और समुदायों की भलाई का सवाल और भी अहम हो जाता है।

कम्भमपति ने उद्योगों से अपील की कि वे सीएसआर के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, पेयजल, पोषण, आजीविका, कौशल विकास, खेल, ग्रामीण विकास और आपदा तैयारी को प्राथमिकता दें।

शिक्षा और आदिवासी क्षेत्रों पर विशेष ध्यान

शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताते हुए राज्यपाल ने कहा कि बुनियादी साक्षरता, शिक्षक प्रशिक्षण, डिजिटल लर्निंग, छात्रवृत्ति और मेंटरशिप में निवेश पीढ़ियों का भविष्य बदल सकता है — विशेष रूप से आदिवासी और पिछड़े जिलों में प्रथम पीढ़ी के विद्यार्थियों के लिए। गौरतलब है कि ओडिशा में आदिवासी आबादी राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 22% है, जो इन क्षेत्रों में लक्षित हस्तक्षेप की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

खनन-प्रभावित क्षेत्रों में पर्यावरण और आजीविका

राज्यपाल ने खनन और बड़े औद्योगिक परियोजनाओं से प्रभावित इलाकों में वन एवं जैव-विविधता संरक्षण, जल सुरक्षा, आजीविका पुनर्निर्माण, स्थानीय रोजगार और महिला नेतृत्व वाले उद्यमों के लिए कॉरपोरेट सहयोग बढ़ाने का आग्रह किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि औद्योगिक विस्तार और सामाजिक जिम्मेदारी साथ-साथ चलनी चाहिए।

आगे की राह

इस कॉन्क्लेव में उभरे विचार-विमर्श से यह स्पष्ट है कि ओडिशा सरकार और कॉरपोरेट क्षेत्र के बीच सीएसआर को लेकर एक नई साझेदारी की जमीन तैयार हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कंपनियाँ सीएसआर को व्यावसायिक रणनीति का हिस्सा बनाएं, तो इसके दीर्घकालिक परिणाम न केवल समुदायों के लिए, बल्कि स्वयं उद्योगों के लिए भी सकारात्मक होंगे।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन प्रभावित समुदायों तक सीएसआर का लाभ पहुँचने की प्रक्रिया अभी भी असंगत बनी हुई है। 'खर्च करो और रिपोर्ट करो' की आलोचना नई नहीं है — नीति-निर्माता वर्षों से इसे दोहराते आए हैं, लेकिन सत्यापन-योग्य परिणाम मापने का तंत्र अभी भी कमज़ोर है। असली सवाल यह है कि क्या कॉन्क्लेव में उठे विचार किसी ठोस जवाबदेही ढाँचे में तब्दील होंगे, या ये भी केवल मंच की बातें बनकर रह जाएंगी।
RashtraPress
19 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ब्रिज भारत कॉन्क्लेव 2026 क्या है?
यह भुवनेश्वर में आयोजित एक राष्ट्रीय सेमिनार है जिसमें 'सीएसआर: उभरते मुद्दे और चुनौतियां' विषय पर चर्चा हुई। इसमें ओडिशा के राज्यपाल हरि बाबू कम्भमपति सहित कॉरपोरेट और नीति-निर्माता शामिल हुए।
ओडिशा राज्यपाल ने सीएसआर पर कॉरपोरेट से क्या माँग की?
राज्यपाल कम्भमपति ने कॉरपोरेट जगत से आग्रह किया कि वे सीएसआर को केवल कानूनी अनुपालन तक सीमित न रखें, बल्कि इसे रणनीतिक, समावेशी और परिणामोन्मुख बनाएं। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, कौशल विकास और आपदा तैयारी को प्राथमिकता देने की बात कही।
भारत में सीएसआर का कानूनी ढाँचा क्या है?
भारत में कंपनीज एक्ट, 2013 के तहत एक निश्चित आकार की कंपनियों के लिए सीएसआर पर खर्च अनिवार्य है। इसके अंतर्गत स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका, पर्यावरण और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में संसाधन लगाए जाते हैं।
ओडिशा में सीएसआर के लिए कौन-से क्षेत्र प्राथमिकता में हैं?
राज्यपाल ने आदिवासी और पिछड़े जिलों में शिक्षा, डिजिटल लर्निंग, मेंटरशिप, पेयजल, पोषण और कौशल विकास को प्राथमिकता देने की अपील की। खनन-प्रभावित इलाकों में वन संरक्षण, जल सुरक्षा और महिला नेतृत्व वाले उद्यमों पर भी जोर दिया गया।
सीएसआर में 'खर्च करो और रिपोर्ट करो' मॉडल की आलोचना क्यों हो रही है?
इस मॉडल में कंपनियाँ सीएसआर राशि खर्च कर रिपोर्ट दाखिल कर देती हैं, लेकिन वास्तविक सामाजिक प्रभाव का मापन नहीं होता। राज्यपाल कम्भमपति ने इसे बदलकर परिणामोन्मुख और सत्यापन-योग्य मॉडल अपनाने की वकालत की।
राष्ट्र प्रेस
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