5 नवंबर 2026
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पारसनाथ पहाड़ी पर संताल आदिवासियों का दावा तेज, मरांगबुरु अधिकारों की बहाली को अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में प्रस्ताव पारित

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पारसनाथ पहाड़ी पर संताल आदिवासियों का दावा तेज, मरांगबुरु अधिकारों की बहाली को अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में प्रस्ताव पारित

सारांश

पारसनाथ पहाड़ी पर संताल आदिवासियों ने मरांगबुरु को सर्वोच्च तीर्थस्थल घोषित करते हुए पारंपरिक अधिकारों की बहाली का प्रस्ताव पारित किया। मधुबन में हुए अंतरराष्ट्रीय महासम्मेलन में आठ देशों-राज्यों के प्रतिनिधि शामिल हुए। जैन और संताल — दोनों समुदायों की इस पहाड़ी पर अलग-अलग गहरी आस्थाएं इसे देश का एक संवेदनशील धार्मिक विवाद बनाती हैं।

मुख्य बातें

मरांगबुरु बचाओ संघर्ष मोर्चा द्वारा आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय महासम्मेलन 5 नवंबर 2026 को मधुबन, गिरिडीह में संपन्न हुआ।
सम्मेलन में पारसनाथ पहाड़ी को 'मरांगबुरु धोरोमगढ़' का सर्वोच्च तीर्थस्थल घोषित करते हुए पारंपरिक अधिकारों की बहाली का प्रस्ताव पारित किया गया।
झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम, छत्तीसगढ़ के साथ-साथ नेपाल और बांग्लादेश के प्रतिनिधि सम्मिलित हुए।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और गांडेय विधायक कल्पना मुर्मू सोरेन समापन समारोह में उपस्थित रहे।
केंद्र सरकार से राष्ट्रीय जनगणना में अलग सरना धर्म कोड शामिल करने की माँग भी प्रस्ताव में शामिल।
जैन समाज इसी पहाड़ी को सम्मेद शिखरजी के रूप में पूजता है — जहाँ 24 में से 20 तीर्थंकरों का निर्वाण माना जाता है।

झारखंड के गिरिडीह जिले में स्थित पारसनाथ पहाड़ी पर संताल आदिवासी समाज ने अपने पारंपरिक और धार्मिक अधिकारों की मांग को 5 नवंबर 2026 को और तीव्र कर दिया, जब पहाड़ी की तलहटी मधुबन में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय महासम्मेलन में इस पहाड़ी को 'मरांगबुरु धोरोमगढ़' का सर्वोच्च तीर्थस्थल घोषित करते हुए पारंपरिक अधिकारों की बहाली एवं सुरक्षा का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया गया। 'मरांगबुरु बचाओ संघर्ष मोर्चा' द्वारा आयोजित इस महासम्मेलन में छह भारतीय राज्यों — झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम और छत्तीसगढ़ — के अलावा नेपाल और बांग्लादेश से भी प्रतिनिधि सम्मिलित हुए।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का संबोधन

समापन समारोह में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपनी पत्नी एवं गांडेय विधायक कल्पना मुर्मू सोरेन के साथ उपस्थित रहे। सोरेन ने संथाली और हिंदी दोनों भाषाओं में सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि मरांगबुरु केवल एक पहाड़ी या स्थल नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की आस्था, संस्कृति और ऐतिहासिक पहचान का प्रतीक है। उन्होंने जोर दिया कि अपनी धरोहर और अधिकारों की रक्षा के लिए समाज को एकजुट रहना होगा।

सोरेन ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान के तहत आदिवासियों को कई महत्वपूर्ण अधिकार प्राप्त हैं और राज्य सरकार उनकी संस्कृति, परंपराओं तथा अधिकारों की सुरक्षा के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध है। कल्पना मुर्मू सोरेन ने भी मंच से मरांगबुरु की धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को रेखांकित किया।

सम्मेलन में पारित प्रमुख प्रस्ताव

महासम्मेलन में पारित प्रस्ताव में कई महत्वपूर्ण माँगें शामिल की गई हैं। पारसनाथ पहाड़ी को अनादि काल से संताल आदिवासी समाज का पवित्र धार्मिक स्थल और धोरोमगढ़ घोषित करते हुए पहाड़ी पर किसी भी प्रकार के धार्मिक या सांस्कृतिक अतिक्रमण को रोकने की मांग की गई। साथ ही दिशोम मांझीथान सहित पारंपरिक पूजा स्थलों का मूल स्वरूप बनाए रखने पर बल दिया गया।

प्रतिनिधियों ने केंद्र सरकार से आगामी राष्ट्रीय जनगणना में अलग आदिवासी सरना धर्म कोड शामिल करने की माँग भी उठाई। इसके अतिरिक्त संथाली भाषा और ओलचिकी लिपि को शिक्षा तथा रोज़गार से जोड़ने, पारंपरिक मांझी-परगना स्वशासन व्यवस्था को सुदृढ़ करने और आदिवासी संस्कृति के दस्तावेज़ीकरण का प्रस्ताव भी पारित किया गया।

दो समुदायों की प्रतिस्पर्धी आस्थाएं

गौरतलब है कि पारसनाथ पहाड़ी को लेकर दो अलग-अलग समुदायों की गहरी धार्मिक आस्थाएं हैं। जैन समाज इस पहाड़ी को सम्मेद शिखरजी के रूप में पूजता है — जैन मान्यता के अनुसार 24 में से 20 तीर्थंकरों ने इसी पहाड़ी पर निर्वाण प्राप्त किया था। वहीं संताल आदिवासी इसे मरांगबुरु के रूप में अपना प्रमुख पारंपरिक धार्मिक केंद्र मानते हैं।

यह ऐसे समय में आया है जब पहाड़ी से जुड़े धार्मिक और पारंपरिक अधिकारों को लेकर दोनों समुदायों के बीच मांगें और मान्यताएं अलग-अलग रही हैं, जिससे यह क्षेत्र संवेदनशील बना हुआ है। आलोचकों का कहना है कि बिना संवाद और मध्यस्थता के इस विवाद का दीर्घकालिक समाधान कठिन है।

आगे की राह

महासम्मेलन के प्रतिनिधियों ने संकेत दिया कि पारित प्रस्तावों को केंद्र और राज्य सरकार दोनों के समक्ष औपचारिक रूप से प्रस्तुत किया जाएगा। राज्य सरकार की ओर से मुख्यमंत्री सोरेन की उपस्थिति को आदिवासी दावों के प्रति राजनीतिक समर्थन के संकेत के रूप में देखा जा रहा है, हालांकि पहाड़ी के धार्मिक स्वरूप पर अंतिम निर्णय केंद्र सरकार और न्यायिक प्रक्रियाओं पर निर्भर करता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

संसद और सड़कों पर एक साथ चल रही है। मुख्यमंत्री सोरेन की महासम्मेलन में उपस्थिति स्पष्ट राजनीतिक संदेश देती है, परंतु राज्य सरकार के पास इस मुद्दे पर एकतरफा निर्णय की सीमित शक्ति है — केंद्रीय कानून और न्यायिक प्रक्रिया ही अंतिम मध्यस्थ हैं। सरना धर्म कोड की माँग जनगणना से जुड़े एक पुराने असंतोष को फिर से उठाती है जो कई चुनावों में वादा होकर भी अधूरा रहा है। बिना संरचित अंतर-धार्मिक संवाद के, यह संवेदनशील विवाद और गहरा होने का जोखिम रखता है।
RashtraPress
5 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पारसनाथ पहाड़ी पर आदिवासी समाज का दावा क्या है?
संताल आदिवासी समाज पारसनाथ पहाड़ी को 'मरांगबुरु धोरोमगढ़' के रूप में अपना सर्वोच्च पारंपरिक और धार्मिक तीर्थस्थल मानता है। 5 नवंबर 2026 को मधुबन में हुए अंतरराष्ट्रीय महासम्मेलन में पारंपरिक अधिकारों की बहाली एवं दिशोम मांझीथान सहित पूजा स्थलों के मूल स्वरूप की रक्षा का प्रस्ताव पारित किया गया।
जैन समाज की पारसनाथ पहाड़ी से क्या मान्यता जुड़ी है?
जैन समाज इस पहाड़ी को 'सम्मेद शिखरजी' के रूप में पूजता है। जैन मान्यता के अनुसार, 24 में से 20 तीर्थंकरों ने इसी पहाड़ी पर निर्वाण प्राप्त किया था, जो इसे जैन धर्म का सर्वाधिक पवित्र तीर्थ बनाता है।
मधुबन महासम्मेलन में और कौन-सी माँगें उठाई गईं?
प्रतिनिधियों ने केंद्र सरकार से आगामी राष्ट्रीय जनगणना में अलग आदिवासी सरना धर्म कोड शामिल करने की माँग की। इसके अलावा संथाली भाषा और ओलचिकी लिपि को शिक्षा व रोज़गार से जोड़ने, पारंपरिक मांझी-परगना स्वशासन व्यवस्था को सुदृढ़ करने और आदिवासी संस्कृति के दस्तावेज़ीकरण के प्रस्ताव भी पारित किए गए।
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सम्मेलन में क्या कहा?
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि मरांगबुरु आदिवासी समाज की आस्था, संस्कृति और ऐतिहासिक पहचान का प्रतीक है। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों, संस्कृति और परंपराओं की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।
इस विवाद का समाधान कैसे होगा?
पारसनाथ पहाड़ी पर दोनों समुदायों की प्रतिस्पर्धी धार्मिक माँगों का अंतिम निर्णय केंद्र सरकार की नीतियों और न्यायिक प्रक्रियाओं पर निर्भर करता है। महासम्मेलन के प्रतिनिधियों ने कहा कि पारित प्रस्तावों को केंद्र और राज्य सरकार दोनों के समक्ष औपचारिक रूप से प्रस्तुत किया जाएगा।
राष्ट्र प्रेस
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