पीओके हिंसा पर जेकेएसए की चेतावनी: रावलकोट-मुजफ्फराबाद में मौतें, संयुक्त राष्ट्र से जांच की मांग
सारांश
मुख्य बातें
जम्मू-कश्मीर स्टूडेंट्स एसोसिएशन (जेकेएसए) ने 1 अगस्त 2026 को पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) के रावलकोट, मुजफ्फराबाद, कोटली और मीरपुर में जारी हिंसा तथा मौतों पर गहरी चिंता जताते हुए संयुक्त राष्ट्र से निष्पक्ष एवं स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है। एसोसिएशन ने प्रदर्शनकारियों पर कथित बल प्रयोग, संचार सेवाओं पर प्रतिबंध और इंटरनेट बंद किए जाने की कड़ी निंदा की है।
मुख्य घटनाक्रम
एसोसिएशन के राष्ट्रीय संयोजक नासिर खुहामी ने शनिवार को जारी बयान में कहा कि नियंत्रण रेखा (एलओसी) के उस पार से सामने आ रही तस्वीरें और वीडियो 'बेहद दुखद और चिंताजनक' हैं। उन्होंने कहा कि हर मानव जीवन अनमोल है और किसी भी राजनीतिक मतभेद या प्रशासनिक विवाद के चलते निर्दोष लोगों की जान नहीं जानी चाहिए।
खुहामी के अनुसार, रावलकोट, मुजफ्फराबाद, कोटली और अन्य क्षेत्रों में हुई मौतें यह साफ संकेत देती हैं कि लोगों की शिकायतों का समाधान बल प्रयोग से संभव नहीं। उन्होंने कहा कि हिंसा का लगातार जारी रहना लोगों के दुख, अविश्वास और अलगाव को और गहरा करता है।
संचार प्रतिबंध और पारदर्शिता की मांग
जेकेएसए ने संचार सेवाओं और इंटरनेट पर लगाए गए प्रतिबंधों पर विशेष चिंता जताई। खुहामी ने कहा कि किसी भी नागरिक अशांति के दौरान पारदर्शिता, जवाबदेही और सूचना तक पहुंच बेहद ज़रूरी होती है। उन्होंने यह भी कहा कि इंटरनेट बंद होने से पीओके में छात्रों और युवाओं की शिक्षा तथा संचार दोनों बाधित हो रहे हैं।
गौरतलब है कि इंटरनेट शटडाउन और संचार प्रतिबंध अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं की नज़र में एक गंभीर मसला बन चुके हैं, और पीओके में इनका बार-बार इस्तेमाल होना एक चिंताजनक प्रवृत्ति की ओर इशारा करता है।
पाकिस्तान सरकार से अपील
एसोसिएशन ने पाकिस्तान सरकार से संयम बरतने, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग तुरंत बंद करने और सभी पक्षों के साथ सार्थक संवाद शुरू करने की अपील की। बयान में स्पष्ट किया गया कि लोकतंत्र असहमति दबाने से नहीं, बल्कि नागरिकों की बात सुनने, शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार का सम्मान करने और संवैधानिक तरीके से शिकायतों का समाधान करने से मज़बूत होता है।
खुहामी ने कहा कि संवैधानिक सुधार, लोकतांत्रिक समानता, जवाबदेह शासन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा की मांग को कभी अपराध नहीं माना जाना चाहिए।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं: मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता
खुहामी ने यह भी रेखांकित किया कि यह विडंबना है कि जो पाकिस्तान अक्सर भारत को मानवाधिकारों पर उपदेश देता रहा है, वही अब नियंत्रण रेखा के उस पार मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों का सामना कर रहा है। उनके अनुसार, 'मानवाधिकार सार्वभौमिक हैं और उनका चयनात्मक इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।'
यह ऐसे समय में आया है जब पीओके में आवाम-ए-एक्शन कमेटी जैसे संगठनों की अगुवाई में बिजली, आटे और अन्य ज़रूरी चीज़ों की कीमतों को लेकर विरोध प्रदर्शन जारी हैं। आलोचकों का कहना है कि इस्लामाबाद की प्रतिक्रिया संवाद की बजाय दमन पर केंद्रित रही है।
आगे क्या
जेकेएसए ने संयुक्त राष्ट्र से मांग की है कि सभी मौतों और हिंसा की घटनाओं की निष्पक्ष, स्वतंत्र और पारदर्शी जांच कराई जाए। एसोसिएशन के अनुसार, यदि किसी भी प्रकार के गैरकानूनी बल प्रयोग या मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप कार्रवाई होनी चाहिए। बयान में अंत में कहा गया कि स्थायी शांति केवल संवाद, न्याय, पारदर्शिता और मौलिक अधिकारों के सम्मान से ही संभव है।