तमिल साहित्य के दिग्गज आर. वैरामुथु को 2025 का ज्ञानपीठ पुरस्कार
सारांश
Key Takeaways
- आर. वैरामुथु को 2025 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया है।
- यह पुरस्कार उनके महत्वपूर्ण साहित्यिक योगदान को मान्यता देता है।
- तमिल साहित्य में उनके योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर सराहा जाएगा।
- ज्ञानपीठ पुरस्कार भारत का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान है।
- आर. वैरामुथु की रचनाएं गहरी संवेदनाओं और सामाजिक मुद्दों का चित्रण करती हैं।
नई दिल्ली, 14 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। भारत के सबसे प्रतिष्ठित साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार का 60वां सम्मान वर्ष 2025 के लिए प्रसिद्ध तमिल कवि, गीतकार और लेखक आर. वैरामुथु को दिया जाएगा। यह घोषणा भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा की गई है। तमिल साहित्य में उनके दीर्घकालिक और महत्वपूर्ण योगदान, रचनात्मकता, एवं अद्वितीय काव्यात्मक अभिव्यक्ति को देखते हुए उन्हें इस सम्मान के लिए चयनित किया गया है। यह निर्णय ज्ञानपीठ की चयन समिति की बैठक में लिया गया।
चयन समिति की अध्यक्षता प्रतिभा राय ने की थी। समिति में अन्य प्रमुख साहित्यकारों और विद्वानों की भी उपस्थिति थी, जिनमें माधव कौशिक, दामोदर माउजो, डॉ. सुरंजन दास, डॉ. ए. कृष्णा राव, प्रफुल्ल शिलेदार, डॉ. केसुभाई देसाई, डॉ. जानकी प्रसाद शर्मा, डॉ. के. श्रीनिवास राव और ज्ञानपीठ के वरिष्ठ प्रकाशन अधिकारी डॉ. महेश्वर शामिल थे। बैठक में दिवंगत साहित्यकारों को श्रद्धांजलि देने के लिए दो मिनट का मौन भी रखा गया।
तमिल भाषा के प्रसिद्ध कवि और गीतकार आर. वैरामुथु का जन्म 13 जुलाई 1953 को तमिलनाडु में हुआ था। वे समकालीन तमिल साहित्य के प्रमुख रचनाकारों में से एक हैं। उनकी कविताओं और रचनाओं में मानव संवेदनाओं, सामाजिक मुद्दों और प्रकृति के प्रति गहरी संवेदनशीलता का प्रभावशाली चित्रण देखने को मिलता है। वैरामुथु ने कविता, गीत और गद्य में उल्लेखनीय योगदान दिया है। उनकी रचनाएं अपनी मौलिकता, भावनात्मक गहराई और सांस्कृतिक चेतना के कारण पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय रही हैं।
उन्होंने अब तक 37 से अधिक पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें कविता संग्रह, उपन्यास और अन्य साहित्यिक कृतियां शामिल हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में कल्लिकाडू इथिहासम, करुवाची काव्यम, तन्नी देसम और मौद्रम उलागा पोर (तीसरा विश्व युद्ध) जैसी चर्चित रचनाएं शामिल हैं। अपने चार दशक से अधिक लंबे साहित्यिक करियर में वैरामुथु को कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया है। उन्हें सात बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ गीतकार) प्राप्त हो चुका है।
इसके अतिरिक्त, भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 2003 में पद्म श्री और वर्ष 2014 में पद्म भूषण से भी सम्मानित किया। 2003 में उनके प्रसिद्ध उपन्यास कल्लिकाडू इथिहासम के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला। तमिलनाडु सरकार ने भी उन्हें कला और साहित्य में योगदान के लिए कलैमामणि सम्मान से सम्मानित किया है।
ज्ञानपीठ की प्रवर परिषद ने अपने निर्णय में कहा कि तमिल एक समृद्ध और महत्वपूर्ण भारतीय भाषा है, लेकिन इसके बावजूद अब तक इस भाषा के केवल दो लेखकों—पी. वी. अखिलन (1975) और डी. जयकांतन (2002)—को ही ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। ऐसे में आर. वैरामुथु का यह सम्मान तमिल साहित्य की समृद्ध परंपरा को राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक प्रतिष्ठा दिलाने का कार्य करेगा।
ज्ञात हो कि ज्ञानपीठ पुरस्कार भारत का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान माना जाता है, जो भारतीय भाषाओं में उत्कृष्ट साहित्य सृजन करने वाले लेखकों को प्रदान किया जाता है। इस सम्मान के अंतर्गत 11 लाख रुपये की पुरस्कार राशि, वाग्देवी (सरस्वती) की कांस्य प्रतिमा और प्रशस्ति-पत्र प्रदान किया जाता है।