राम मंदिर ट्रस्ट के नए CEO जितेंद्र मिश्रा की नियुक्ति पर टीएस सिंह देव और सपा ने उठाए सवाल
सारांश
मुख्य बातें
श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में नए सीईओ जितेंद्र मिश्रा की नियुक्ति को लेकर विपक्षी दलों ने मोर्चा खोल दिया है। छत्तीसगढ़ के पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंह देव ने ट्रस्ट की स्वायत्तता पर जोर देते हुए राजनीतिक हस्तक्षेप पर गंभीर सवाल खड़े किए, जबकि जौनपुर की समाजवादी पार्टी (सपा) विधायक डॉ. रागिनी सोनकर ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर धर्म की आड़ में राजनीति करने का आरोप लगाया। 3 सितंबर को सामने आई इन प्रतिक्रियाओं ने राम मंदिर ट्रस्ट के प्रशासनिक बदलावों को एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
टीएस सिंह देव की मुख्य आपत्तियाँ
अंबिकापुर में पत्रकारों से बात करते हुए टीएस सिंह देव ने कहा कि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट जैसी धार्मिक संस्था को पूरी तरह स्वायत्त रहना चाहिए और इसके निर्णय किसी राजनीतिक दबाव से मुक्त होने चाहिए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि किसी भी राजनीतिक दल या राजनीतिक व्यक्ति को ट्रस्ट के आंतरिक मामलों में दखल देने का अधिकार नहीं होना चाहिए।
नई नियुक्तियों पर सीधी टिप्पणी से बचते हुए उन्होंने कहा, 'मेरे लिए नाम महत्वपूर्ण नहीं हैं — यह देखना जरूरी होगा कि संबंधित लोग काम क्या करते हैं।' गौरतलब है कि उन्होंने यह भी याद दिलाया कि ट्रस्ट के पिछले कार्यकाल में चढ़ावे की चोरी के आरोप सामने आए थे, जो संस्था की साख के लिए चिंताजनक रहे।
सपा विधायक के गंभीर आरोप
जौनपुर से सपा विधायक डॉ. रागिनी सोनकर ने सीईओ जितेंद्र मिश्रा की नियुक्ति को BJP की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बताया। उनका आरोप है कि BJP कथित तौर पर धार्मिक मुद्दों को आगे कर विकास से जुड़े बुनियादी सवालों से जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश करती रही है।
डॉ. सोनकर ने मंदिर के चढ़ावे को लेकर भी गंभीर दावे किए। उन्होंने आरोप लगाया कि श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित धन और वस्तुओं में अनियमितताएँ हुईं और अब चुनाव के मद्देनज़र उसी धन से जनता को लुभाने की योजनाएँ बनाई जा रही हैं। हालाँकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
चुनावी योजनाओं पर निशाना
सपा विधायक ने दावा किया कि चुनाव से पहले महिलाओं को स्कूटी बाँटने और नागरिकों को नकद राशि देने जैसी योजनाओं की चर्चा है। उन्होंने सवाल किया कि यदि ये योजनाएँ वाकई जरूरी थीं, तो पिछले साढ़े नौ वर्षों में इन्हें लागू क्यों नहीं किया गया। उनके अनुसार, महिलाओं, युवाओं और वंचित वर्गों के मुद्दे इतने लंबे समय तक सरकार की प्राथमिकता सूची से बाहर क्यों रहे — यह जवाब सरकार को देना होगा।
उन्होंने जेन-जी और जेन-अल्फा पीढ़ी के युवाओं के बढ़ते असंतोष का भी उल्लेख किया और सरकारी स्कूलों को बेमौसम बारिश का हवाला देकर बंद किए जाने पर सवाल उठाए। उनका दावा है कि इसके पीछे युवाओं के संभावित विरोध का भय है।
विशेषज्ञ और राजनीतिक संदर्भ
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट पहले से ही प्रशासनिक बदलावों के कारण चर्चा में है। आलोचकों का कहना है कि किसी धार्मिक ट्रस्ट के शीर्ष पद पर नियुक्ति की प्रक्रिया पारदर्शी और राजनीतिक प्रभाव से मुक्त होनी चाहिए। दूसरी ओर, सत्तारूढ़ BJP की ओर से अभी तक इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
गौरतलब है कि जनवरी 2024 में राम मंदिर के उद्घाटन के बाद से ट्रस्ट के प्रशासन और वित्तीय पारदर्शिता को लेकर विपक्षी दलों की निगरानी लगातार बढ़ी है। आगे यह देखना होगा कि सरकार इन आरोपों का जवाब देती है या नहीं और ट्रस्ट की कार्यप्रणाली में जवाबदेही के क्या इंतज़ाम किए जाते हैं।