सड़क पर नमाज विवाद: सीएम धामी के बयान का हरिद्वार में स्वागत, वक्फ बोर्ड ने जारी की एडवाइजरी
सारांश
मुख्य बातें
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा सड़कों पर नमाज पढ़ने के विरुद्ध दिए गए बयान पर हरिद्वार में विभिन्न वर्गों की प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं। यह बयान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इसी मुद्दे पर दिए गए वक्तव्य के बाद आया। 23 मई को सामने आई इन प्रतिक्रियाओं में धार्मिक नेताओं से लेकर वक्फ बोर्ड तक, अधिकांश ने सार्वजनिक सड़कों पर नमाज न पढ़े जाने की बात कही।
धार्मिक नेताओं की प्रतिक्रिया
जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर गर्भ गिरी महाराज ने कहा कि यह सीएम धामी सरकार का सनातन के हित में एक नया कदम है और यह निर्णय बहुत पहले लिया जाना चाहिए था। उन्होंने कहा, 'हम सीएम पुष्कर सिंह धामी के इस फैसले का स्वागत करते हैं।' उनके अनुसार हरिद्वार एक तीर्थस्थल है और गर्मियों की छुट्टियों में यहाँ पर्यटन बढ़ जाता है, ऐसे में सड़कों पर नमाज उचित नहीं।
महामंडलेश्वर ने यह भी कहा कि नमाज घरों और मस्जिदों में अदा की जानी चाहिए और सभी को यातायात नियमों का पालन करना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा, 'कानून से बड़ा कोई नहीं हो सकता।'
वक्फ बोर्ड की एडवाइजरी
उत्तराखंड वक्फ बोर्ड के चेयरमैन शादाब शम्स ने भी सीएम धामी के बयान का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि कोई भी सभ्य समाज का व्यक्ति सड़क जाम करने की अनुमति नहीं देगा। शम्स ने इस्लामी दृष्टिकोण से भी स्पष्ट किया कि इबादत के लिए जगह का पाक होना ज़रूरी है, इसलिए सड़क पर पढ़ी गई नमाज वास्तव में नमाज नहीं मानी जाती।
वक्फ बोर्ड ने इस संदर्भ में एक एडवाइजरी जारी कर दी है जिसमें कहा गया है कि कहीं भी सड़क पर नमाज नहीं होगी और पुलिस व प्रशासन का सहयोग किया जाएगा। शादाब शम्स ने यह भी बताया कि उलेमाओं की राय है कि एक बार की जगह दो बार में भी नमाज अदा की जा सकती है।
शम्स ने ईद के संदर्भ में अपील करते हुए कहा कि लोग सादगी के साथ त्योहार मनाएँ और केवल सरकार द्वारा अनुमोदित पशुओं की कुर्बानी करें। उन्होंने चेतावनी दी कि माहौल खराब करने वालों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई होगी।
विपक्षी नेता का अलग नज़रिया
पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) की नेता फिरदौस टाक ने इस मुद्दे पर अलग रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि देशभर में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की ओर से एक विशेष माहौल बनाया जा रहा है और मुसलमानों को जगह-जगह निशाना बनाया जा रहा है। टाक ने यह भी कहा कि मस्जिदों में जगह की कमी के कारण कभी-कभी सड़कों पर नमाज पढ़ी जाती है और हर धर्म के त्योहारों पर लोग सड़कों का उपयोग करते हैं।
व्यापक संदर्भ और आगे की स्थिति
गौरतलब है कि सड़कों पर नमाज का मुद्दा पिछले कुछ वर्षों में कई राज्यों में राजनीतिक विमर्श का केंद्र बना है। उत्तराखंड जैसे तीर्थस्थल-बहुल राज्य में, जहाँ धार्मिक पर्यटन का विशेष महत्त्व है, यह बहस और संवेदनशील हो जाती है। वक्फ बोर्ड की एडवाइजरी और उलेमाओं के बयान इस दिशा में एक सकारात्मक संकेत माने जा रहे हैं कि समुदाय के भीतर से भी संयम की अपील आ रही है। आने वाले दिनों में प्रशासन इस एडवाइजरी के पालन पर किस तरह नज़र रखता है, यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा।