बिहार: शिवचंद्र राम ने राजद SC-ST प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से दिया इस्तीफा, दलित उपेक्षा का लगाया आरोप
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय जनता दल (राजद) में बिहार विधान परिषद चुनाव को लेकर असंतोष खुलकर सामने आ गया है। पूर्व मंत्री शिवचंद्र राम ने 8 जनवरी को राजद के अनुसूचित जाति-जनजाति (SC-ST) प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। यह कदम पार्टी द्वारा विधान परिषद सीट के लिए सुनील सिंह को दोबारा उम्मीदवार बनाए जाने के निर्णय के विरोध में उठाया गया है।
इस्तीफे की वजह
शिवचंद्र राम ने पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी प्रसाद यादव को दो पन्ने का त्यागपत्र भेजा, जिसमें उन्होंने बिहार विधान परिषद की रिक्त सीट को लेकर दलित समाज और पार्टी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा का सीधा आरोप लगाया। उन्होंने लिखा कि दलित, रविदास समाज और हजारों समर्पित कार्यकर्ताओं को इस सीट पर प्रतिनिधित्व मिलने की उम्मीद थी, लेकिन हालिया घटनाक्रम ने उन्हें 'भीतर तक झकझोर' दिया।
शिवचंद्र राम के शब्दों में
अपने त्यागपत्र में शिवचंद्र राम ने स्पष्ट किया कि उन्हें किसी पद का लोभ नहीं है। उन्होंने लिखा, 'समाज ने भी राजद और नेतृत्व पर विश्वास व्यक्त किया। हजारों कार्यकर्ताओं ने दिन-रात मेहनत की। हम सबके मन में यह विश्वास था कि संघर्ष, समर्पण और समाज की आकांक्षाओं को सम्मान मिलेगा। लेकिन हाल के घटनाक्रम ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया है।' उन्होंने यह भी कहा कि जिस समाज ने उन पर भरोसा जताया, उसकी भावनाओं की अनदेखी कर पद पर बने रहना नैतिक रूप से संभव नहीं।
पार्टी से सदस्यता बरकरार
शिवचंद्र राम ने स्पष्ट किया कि यह इस्तीफा केवल प्रकोष्ठ के पद से है, पार्टी की सक्रिय सदस्यता से नहीं। उन्होंने लालू यादव, राबड़ी देवी और पार्टी नेतृत्व का आभार जताते हुए कहा कि सामाजिक न्याय, सम्मान और बराबरी की लड़ाई वे आगे भी जारी रखेंगे। साथ ही उन्होंने विधान परिषद और राज्यसभा में दलित, आदिवासी, पिछड़ा, अतिपिछड़ा और अल्पसंख्यक समाज की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट नीति बनाने की माँग भी रखी।
रोहिणी आचार्या का विरोध
इससे पहले राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्या ने सोशल मीडिया के माध्यम से इस निर्णय का खुलकर विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि पार्टी की स्थापना से लेकर आज तक अनेक समर्पित, जमीन से जुड़े और कट्टर लालूवादी अल्पसंख्यक, दलित, पिछड़े और वंचित समाज के वरिष्ठ व युवा चेहरे पार्टी के साथ खड़े हैं। आलोचकों का कहना है कि ऐसे लोगों की अनदेखी पार्टी हित में नहीं है।
आगे क्या
पार्टी के भीतर इस इस्तीफे को दलित प्रतिनिधित्व और संगठनात्मक असंतोष के व्यापक संकट से जोड़कर देखा जा रहा है। यह ऐसे समय में आया है जब राजद बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तैयारियों के बीच अपने सामाजिक गठबंधन को मजबूत करने में जुटी है। पार्टी नेतृत्व की प्रतिक्रिया और टिकट वितरण की आगामी रणनीति पर सबकी नजर बनी हुई है।