श्रीनगर में बड़े साइबर धोखाधड़ी रैकेट का भंडाफोड़, 7 लोग गिरफ्तार
सारांश
मुख्य बातें
श्रीनगर, 19 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। श्रीनगर में एक विशाल हाईटेक अंतरराष्ट्रीय साइबर धोखाधड़ी रैकेट का पर्दाफाश हुआ है। सीआईके-सीआईडी को पहले से कई विश्वसनीय और तकनीकी सूचनाएँ प्राप्त हुई थीं कि कुछ गुप्त कॉल सेंटर धोखाधड़ी वाली ऑनलाइन गतिविधियों में संलग्न हैं। ये कॉल सेंटर विदेशी और स्थानीय व्यक्तियों को धोखा देने का कार्य कर रहे थे।
इस जानकारी के आधार पर, सीआईके ने तुरंत एक विशेष टीम का गठन किया, जिसमें तकनीकी विशेषज्ञ और फील्ड ऑपरेटिव्स शामिल थे। टीम ने विभिन्न स्थानों पर निगरानी रखी, डिजिटल इंटेलिजेंस इकट्ठा किया और सभी तथ्यों की पुष्टि की। कई महीनों की मेहनत और जांच के बाद, टीम को श्रीनगर के रंगरेथ औद्योगिक क्षेत्र में एक प्रमुख ऑपरेशनल हब का पता चला। इसके बाद, टीम ने शहर के विभिन्न हिस्सों में तेज और समन्वित छापेमारी की। इस छापेमारी में सात संदिग्धों को गिरफ्तार किया गया और बड़ी संख्या में डिजिटल उपकरण जब्त किए गए।
जब्त किए गए सामान में १३ मोबाइल फोन, ९ लैपटॉप, वीओआईपी सिस्टम, सिम कार्ड, नेटवर्किंग उपकरण और डिजिटल स्टोरेज मीडिया शामिल थे। इनमें से कई डिजिटल और संचार उपकरण ऐसे थे जिनसे स्पष्ट होता था कि यह एक अत्यधिक संगठित और तकनीकी रूप से उन्नत आपराधिक नेटवर्क था।
प्रारंभिक जांच में ज्ञात हुआ कि ये आरोपी एक बड़े और सुव्यवस्थित साइबर क्राइम सिंडिकेट का हिस्सा थे, जिसका नेटवर्क जम्मू-कश्मीर से बाहर भी फैला हुआ था। इस नेटवर्क का एक हिस्सा विशेष रूप से विदेशी देशों के लोगों को निशाना बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया था। अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा के लोगों को लक्षित किया जाता था। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय संचार मास्किंग तकनीक का उपयोग किया जाता था। इसके अलावा, पहचान चुराने, मनोवैज्ञानिक हेरफेर और आधुनिक डिजिटल और क्रिप्टोकरेंसी चैनलों के माध्यम से पैसे की हेराफेरी की जाती थी।
आरोपियों ने वीओआईपी आधारित सिस्टम के माध्यम से एक गुप्त और बिना रजिस्ट्रेशन वाला कॉल सेंटर इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार किया था। इसके जरिए वे अंतरराष्ट्रीय वर्चुअल नंबर बनाते, सर्वर रूटिंग और स्पूफिंग तकनीक का प्रयोग करके अपनी असली लोकेशन छुपाते थे। अनजान पीड़ितों के सामने खुद को वास्तविक सेवा प्रदाता दिखाकर उन्हें धोखा दिया जाता था। नकली याहू मेल वेबसाइट और गूगल विज्ञापनों का इस्तेमाल करके लोग इस कॉल सेंटर तक पहुंचते थे।
कई देशों में ऑनलाइन फिशिंग और कॉल ऑपरेशन के माध्यम से लोगों से संपर्क किया जाता था। जैसे ही कोई पीड़ित विज्ञापन पर क्लिक करता, उसकी स्क्रीन पर टोल-फ्री नंबर प्रदर्शित होता। यह नंबर संदिग्धों द्वारा संचालित होता था और भोले-भाले लोगों को उनकी बैंकिंग और व्यक्तिगत जानकारी देने के लिए गुमराह किया जाता। इसके बाद पैसे विभिन्न खातों में ट्रांसफर किए जाते, जिनमें म्यूल अकाउंट और क्रिप्टो वॉलेट शामिल थे। पैसे को छिपाने के लिए इन्हें कई बार घुमाया, बदला और ट्रांसफर किया जाता ताकि असली स्रोत का पता न चले।
पीड़ितों को यह यकीन दिलाया जाता कि उनके बैंक या डिवाइस कमप्रोमाइज हो गए हैं और उन्हें तकनीकी सहायता के लिए पैसे देने होंगे। धोखाधड़ी से अर्जित पैसे फिर डिजिटल वॉलेट, बैंकिंग चैनल और क्रिप्टोकरेंसी के माध्यम से घुमाए जाते। कई बार इन्हें यूएसडीटी और अन्य क्रिप्टोकरेंसी में बदलकर ट्रैकिंग कठिन बना दी जाती। खास बात यह है कि इस पूरे ऑपरेशन में नकद लेन-देन शामिल नहीं था, जिससे यह पूरी तरह डिजिटल और आधुनिक साइबर धोखाधड़ी बन गया। अब तक किए गए लेन-देन का अनुमान कई करोड़ रुपये का है।
कानून के तहत एफआईआर दर्ज की जा रही है, जिसमें धोखाधड़ी, आपराधिक साज़िश और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की संबंधित धाराएं शामिल हैं। इसके अलावा, संदिग्धों को पकड़ने के लिए आगे भी छापेमारी की जा रही है। जब्त किए गए उपकरणों का फोरेंसिक विश्लेषण किया जा रहा है। पीड़ितों की पहचान और पैसे के लेन-देन का पता लगाने की कोशिशें जारी हैं। पूरे नेटवर्क की जांच राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर की जा रही है।