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देवस्नान पूर्णिमा पर महाप्रभु जगन्नाथ का गजानन बेशा: 108 कलशों के स्नान के बाद हाथी के मुखौटे में सजेंगे भगवान

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देवस्नान पूर्णिमा पर महाप्रभु जगन्नाथ का गजानन बेशा: 108 कलशों के स्नान के बाद हाथी के मुखौटे में सजेंगे भगवान

सारांश

पुरी में देवस्नान पूर्णिमा पर महाप्रभु जगन्नाथ का गजानन बेशा — 108 कलशों के स्नान के बाद हाथी का मुखौटा और पोशाक। डेढ़ महीने की अखंड साधना के बाद पाँच कारीगरों की टीम ने यह पवित्र सजावट पूरी तरह प्राकृतिक सामग्री से तैयार की है।

मुख्य बातें

29 जून को देवस्नान पूर्णिमा पर पुरी के जगन्नाथ मंदिर में गजानन बेशा का आयोजन होगा।
108 कलशों के पवित्र जल से स्नान के बाद भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और भगवान बलभद्र को हाथी के मुखौटे और पोशाक धारण कराई जाएगी।
सजावट की तैयारी अक्षय तृतीया से शुरू होकर डेढ़ महीने तक चली; 5 कारीगर इस सेवा में संलग्न रहे।
कारीगर सत्यनारायण बेहरा के अनुसार सजावट में प्रयुक्त सभी सामग्री पूर्णतः प्राकृतिक है — कोई रासायनिक पदार्थ नहीं।
कारीगर रथ अनुकूल के दिन से मठ में निवास करते हैं और केवल मंदिर का महाप्रसाद ग्रहण करते हैं।

पुरी के जगन्नाथ मंदिर में देवस्नान पूर्णिमा के अवसर पर सोमवार, 29 जून को महाप्रभु जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और भगवान बलभद्र को गजानन बेशा में सजाया जाएगा। स्नान मंडप में 108 कलशों के पवित्र जल से स्नान के पश्चात तीनों देवताओं को भगवान गणेश के समान हाथी के मुखौटे और विशेष पोशाक धारण कराई जाएगी। इस अनुष्ठान की तैयारियाँ पूर्णतः संपन्न हो चुकी हैं।

गजानन बेशा की परंपरा और महत्त्व

गजानन बेशा पुरी की रथयात्रा परंपरा का एक अभिन्न अंग है। इस विशेष श्रृंगार में तीनों देवताओं के लिए शोला सजावट, कान के गहने, हाथी की सूंड, मुकुट और अन्य औपचारिक वस्तुएँ तैयार की जाती हैं। यह बेशा भगवान जगन्नाथ के गजरूप का प्रतीक है, जो गणेश स्वरूप को आत्मसात करते हुए भक्तों को दर्शन देते हैं।

डेढ़ महीने की अखंड साधना

मठ के कारीगर सत्यनारायण बेहरा, जो इस गजानन बेश की सजावट तैयार करने वाले प्रमुख कारीगरों में से एक हैं, ने बताया कि यह पवित्र कार्य अक्षय तृतीया से आरंभ होकर स्नान पूर्णिमा तक — लगभग डेढ़ महीने तक — निरंतर चलता है। उन्होंने कहा, 'काम शुरू होने के बाद से लगातार आगे बढ़ रहा है, और सजावट का अधिकांश काम पहले ही पूरा हो चुका है।'

इस सेवा में दो मास्टर कारीगर (करात सेवायत), दो कारीगर और एक चित्रकार सेवायत (पारंपरिक पेंटर) — कुल पाँच व्यक्ति — संलग्न रहते हैं। रथ अनुकूल (रथ बनाने की रस्म) के दिन से ये सभी अपने घरों से दूर मठ में निवास करते हैं और दिन में एक बार शाम से पूर्व मंदिर से प्राप्त महाप्रसाद ही ग्रहण करते हैं।

पवित्रता और अनुशासन: कारीगरों की आस्था

बेहरा ने बताया कि इस सेवा में लगे सभी कारीगर पूर्ण आध्यात्मिक अनुशासन का पालन करते हैं। उनके शब्दों में, 'पहले खुद को पवित्र करो, और उसके बाद ही भगवान की सेवा करो। क्योंकि ये सजावट खुद देवता पहनेंगे, अंदर की पवित्रता जरूरी मानी जाती है।' उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कोई भी कारीगर जो आध्यात्मिक और धार्मिक रूप से पवित्र नहीं है, वह इस पवित्र संस्कार में भाग नहीं ले सकता।

इस सेवा में एक और विशेषता यह है कि कारीगर अपनी कुशलता का श्रेय स्वयं को नहीं देते। बेहरा के अनुसार, 'हम कभी नहीं सोचते कि हम यह काम अपनी काबिलियत से कर रहे हैं। हम काम का हर कदम भगवान को सौंप देते हैं। उनके मार्गदर्शन के बिना कुछ भी मुमकिन नहीं है।'

प्राकृतिक सामग्री से तैयार होती है सजावट

गजानन बेशा की सजावट में प्रयुक्त प्रत्येक सामग्री पूर्णतः प्राकृतिक है। चिपकाने वाला पदार्थ प्राकृतिक वृक्ष के गोंद से तैयार होता है। बेंत, सोना, धागा और अन्य सभी वस्तुएँ प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त की जाती हैं। बेहरा ने विशेष रूप से रेखांकित किया कि इस पूरी प्रक्रिया में किसी भी रासायनिक पदार्थ का उपयोग नहीं किया जाता।

आगे क्या होगा

देवस्नान पूर्णिमा के पश्चात परंपरा के अनुसार भगवान जगन्नाथ अनसर (एकांतवास) में चले जाते हैं और रथयात्रा तक भक्तों को सामान्य दर्शन नहीं मिलते। गजानन बेशा इस पूरे उत्सव चक्र का एक भावपूर्ण आरंभ है, जो लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना रहता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

पूर्णतः प्राकृतिक विधि से यह कृति रचते हैं। यह ऐसे समय में उल्लेखनीय है जब परंपरागत शिल्प कलाएँ तेज़ी से औद्योगिक विकल्पों से विस्थापित हो रही हैं। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर उत्सव के दृश्य पक्ष तक सीमित रहती है, जबकि डेढ़ महीने की अखंड साधना और पाँच कारीगरों की आध्यात्मिक अनुशासन-यात्रा इस परंपरा की असली आत्मा है।
RashtraPress
13 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गजानन बेशा क्या है और यह कब होता है?
गजानन बेशा पुरी के जगन्नाथ मंदिर में देवस्नान पूर्णिमा के दिन किया जाने वाला विशेष श्रृंगार है, जिसमें भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और भगवान बलभद्र को हाथी के मुखौटे और पोशाक पहनाई जाती है। यह भगवान के गणेश-स्वरूप का प्रतीक माना जाता है।
देवस्नान पूर्णिमा पर 108 कलशों का क्या महत्त्व है?
परंपरा के अनुसार स्नान मंडप में 108 कलशों के पवित्र जल से तीनों देवताओं — जगन्नाथ, सुभद्रा और बलभद्र — का अभिषेक किया जाता है। यह स्नान अनुष्ठान गजानन बेशा से पूर्व होता है और इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है।
गजानन बेशा की सजावट कौन तैयार करता है और इसमें कितना समय लगता है?
यह सजावट दो मास्टर कारीगर (करात सेवायत), दो कारीगर और एक चित्रकार सेवायत — कुल पाँच व्यक्ति — तैयार करते हैं। यह कार्य अक्षय तृतीया से शुरू होकर स्नान पूर्णिमा तक लगभग डेढ़ महीने चलता है।
गजानन बेशा में किस प्रकार की सामग्री उपयोग होती है?
सजावट में उपयोग की जाने वाली सभी सामग्री पूर्णतः प्राकृतिक है — चिपकाने वाला पदार्थ प्राकृतिक वृक्ष के गोंद से बनता है, और बेंत, सोना व धागा भी प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त होते हैं। किसी भी रासायनिक पदार्थ का उपयोग वर्जित है।
देवस्नान पूर्णिमा के बाद भगवान जगन्नाथ के दर्शन क्यों बंद हो जाते हैं?
देवस्नान पूर्णिमा के पश्चात परंपरा के अनुसार भगवान जगन्नाथ 'अनसर' (एकांतवास) में चले जाते हैं। इस अवधि में सामान्य दर्शन बंद रहते हैं और रथयात्रा के समय पुनः भक्तों को दर्शन प्राप्त होते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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