गाजा पर भारत की चुप्पी नैतिक और कूटनीतिक साख को नुकसान पहुँचा रही है: सोनिया गांधी
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस संसदीय दल (CPP) की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने 27 जून 2026 को प्रकाशित एक लेख में केंद्र सरकार की गाजा नीति पर कड़ा प्रहार किया — यह आरोप लगाते हुए कि गाजा संघर्ष पर मोदी सरकार की 'चुप्पी' और 'निष्क्रियता' न केवल नैतिक रूप से अस्वीकार्य है, बल्कि भारत के राष्ट्रीय हितों के भी विरुद्ध है। उनके अनुसार, इस रुख ने भारत को उसकी दशकों पुरानी विदेश नीति की परंपराओं और ऐतिहासिक सहयोगियों से अलग-थलग कर दिया है।
केंद्र की नीति पर सोनिया का सीधा हमला
सोनिया गांधी ने लिखा कि भारत फिलिस्तीन, ईरान और पश्चिम एशिया के देशों से दूरी बना चुका है, जबकि पाकिस्तान इस क्षेत्र में खुद को मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा एक 'हैरान करने वाला रणनीतिक फैसला' था, जिसने भारत की वैश्विक स्थिति को कमज़ोर किया है।
उन्होंने तर्क दिया कि भारतीय राष्ट्र की भावना यह माँग करती है कि देश उन फिलिस्तीनी बच्चों के पक्ष में आवाज़ उठाए, जिन्हें कथित तौर पर बेरहमी से निशाना बनाया गया है। साथ ही, राष्ट्रीय हित भी यही कहते हैं कि भारत गाजा में इजरायल की 'नरसंहार जैसी कार्रवाई' और वेस्ट बैंक में लाखों फिलिस्तीनी परिवारों के विस्थापन के विरुद्ध वैश्विक जनमत का समर्थन करे।
संयुक्त राष्ट्र आयोग की रिपोर्ट का हवाला
सोनिया गांधी ने संयुक्त राष्ट्र की स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जाँच आयोग की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि सितंबर 2025 में आयोग ने निष्कर्ष निकाला था कि गाजा में इजरायली प्रशासन फिलिस्तीनियों के विरुद्ध नरसंहार कर रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि जून 2026 में न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) एस. मुरलीधर की अध्यक्षता वाले आयोग ने भी दोहराया कि इजरायल की कार्रवाई का उद्देश्य गाजा में फिलिस्तीनियों के अस्तित्व को समाप्त करना है।
उन्होंने आयोग की 94 पन्नों की रिपोर्ट को 'बेहद दर्दनाक' बताया। रिपोर्ट के हवाले से उन्होंने कहा कि अब तक कम से कम 20,000 बच्चों की मौत हो चुकी है और 44,000 से अधिक बच्चे घायल हुए हैं, जिनमें से कई जीवन भर के लिए विकलांग हो गए हैं। उनके अनुसार, अस्पतालों — विशेषकर बच्चों के अस्पतालों — को पहुँचाए गए नुकसान के कारण गर्भपात और प्रसव संबंधी जटिलताओं में 300 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है।
हमास हमले की निंदा, पर इजरायली कार्रवाई पर सवाल
कांग्रेस नेता ने 7 अक्टूबर को हमास द्वारा इजरायल पर किए गए हमले को 'भयावह और पूरी तरह अस्वीकार्य' करार दिया। हालाँकि, उन्होंने कहा कि इसके बाद पिछले ढाई वर्षों में इजरायल की सैन्य कार्रवाई 'अत्यधिक क्रूर और अमानवीय' रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि इजरायली नेतृत्व ने गाजा की 'पूर्ण घेराबंदी' और उसे 'पूरी तरह खत्म करने' जैसी बातें कही हैं, तथा फिलिस्तीनियों के अस्तित्व के अधिकार तक को नकारा है।
सोनिया गांधी ने यह भी कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के समर्थन ने इजरायल को अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रखने का अवसर दिया। उनके अनुसार, अमेरिकी रुख के कारण संयुक्त राष्ट्र भी प्रभावी कदम नहीं उठा सका, जबकि उसकी एजेंसियाँ कथित युद्ध अपराधों का दस्तावेज़ीकरण करती रहीं।
वैश्विक संदर्भ और भारत की तुलना
सोनिया गांधी ने रेखांकित किया कि फ्रांस, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई पश्चिमी देशों ने फिलिस्तीन को मान्यता दी है। दक्षिण अफ्रीका ने 1948 के नरसंहार कन्वेंशन के उल्लंघन का मामला अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में दायर किया है। कई यूरोपीय देशों ने इजरायल को हथियारों के निर्यात पर रोक लगाई है और कई लैटिन अमेरिकी देशों ने उससे राजनयिक संबंध सीमित या समाप्त कर दिए हैं। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (ICC) ने इजरायली नेतृत्व के विरुद्ध गिरफ्तारी वारंट जारी किए हैं।
उन्होंने कहा कि भारत लंबे समय तक उपनिवेशवाद-विरोध, राष्ट्रीय संप्रभुता और वैश्विक शांति का समर्थक रहा है, लेकिन आज वही भारत गाजा और वेस्ट बैंक में मानवाधिकारों के उल्लंघन पर मौन है।
मोदी-नेतन्याहू मित्रता पर निशाना
अपने लेख के अंत में सोनिया गांधी ने कहा कि भारत की पारंपरिक विदेश नीति से इस बदलाव का सबसे बड़ा लाभ केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की व्यक्तिगत मित्रता तक सीमित दिखाई देता है। उनके अनुसार, इससे भारत की वैश्विक नैतिक और कूटनीतिक साख को गंभीर नुकसान पहुँचा है — और यह चुप्पी न नैतिक रूप से और न ही तर्कसंगत तरीके से उचित ठहराई जा सकती है।