1 जुलाई 2026
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भारत-पाकिस्तान वार्ता की पैरवी पर जम्मू-कश्मीर के नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा का कड़ा प्रहार, बोले- 'गंभीर जाँच ज़रूरी'

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भारत-पाकिस्तान वार्ता की पैरवी पर जम्मू-कश्मीर के नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा का कड़ा प्रहार, बोले- 'गंभीर जाँच ज़रूरी'

सारांश

भारत-पाकिस्तान के 117 नेताओं के संयुक्त शांति-पत्र के बाद जम्मू-कश्मीर के नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा ने फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती और मीरवाइज सहित पैरवीकारों पर निशाना साधा — ऑपरेशन सिंदूर का हवाला देते हुए वार्ता की माँग को राष्ट्रीय सुरक्षा के विरुद्ध बताया।

मुख्य बातें

जम्मू-कश्मीर के नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा ने 1 जुलाई 2026 को भारत-पाकिस्तान वार्ता की पैरवी करने वालों की कड़ी आलोचना की।
भारत और पाकिस्तान के लगभग 117 लोगों ने PM नरेंद्र मोदी और PM शहबाज शरीफ को संयुक्त पत्र लिखकर वार्ता की अपील की है।
भारत की ओर से हस्ताक्षरकर्ताओं में फारूक अब्दुल्ला , महबूबा मुफ्ती , मणिशंकर अय्यर , मनोज झा और हुमायूँ कबीर शामिल हैं।
शर्मा ने ' ऑपरेशन सिंदूर ' का हवाला देते हुए कहा कि सैन्य शौर्य के वक्त वार्ता की वकालत 'विवादित' है।
उन्होंने इस माँग की गंभीरता से जाँच किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया।

जम्मू-कश्मीर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा ने 1 जुलाई 2026 को भारत-पाकिस्तान वार्ता की पैरवी करने वाले नेताओं पर तीखा हमला बोला और इस माँग को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज़ से अनुचित करार दिया। जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा को और सुदृढ़ करने की कोशिशें जारी रहने के बीच उन्होंने कहा कि ऐसी वकालत की गंभीरता से जाँच होनी चाहिए।

मुख्य आरोप और बयान

शर्मा ने कहा, 'इस देश की एक अजीब विडंबना है। जो विषय किसी के अधिकार क्षेत्र से बाहर है और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है, उसमें जबरदस्ती दखल देना — जगजाहिर है कि यह किस चीज़ की ओर संकेत करता है।' उन्होंने फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती और मीरवाइज उमर फारूक का नाम लेते हुए कहा कि ये नेता हमेशा अलगाववाद का समर्थन करते रहे हैं और आतंकवाद को संरक्षण देते रहे हैं। ऐसे में इनका पाकिस्तान के साथ वार्ता की वकालत करना 'बहुत ही अजीब और गंभीर मामला' है।

ऑपरेशन सिंदूर का संदर्भ

'ऑपरेशन सिंदूर' का उल्लेख करते हुए शर्मा ने कहा कि इस अभियान में भारतीय सेना ने अपना शौर्य और पराक्रम सिद्ध किया। उनके अनुसार, जब वीर जवान अपनी भूमि की रक्षा के लिए डटे हों, उस वक्त बातचीत की पैरवी करना 'विवादित और अनुचित' दिखाई पड़ता है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब सीमापार तनाव के बाद भारत की सैन्य सक्रियता को लेकर राजनीतिक बहस तेज़ है।

जम्मू-कश्मीर में कानून-व्यवस्था और युवाओं की अपेक्षाएँ

शर्मा ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में जम्मू-कश्मीर में कानून-व्यवस्था दृढ़ हुई है और यहाँ का नौजवान शांति, रोज़गार और समृद्धि की उम्मीद रखता है। उनका तर्क था कि इन उम्मीदों को पूरा करने पर ध्यान केंद्रित करने की बजाय पाकिस्तान से वार्ता की माँग उठाना प्राथमिकताओं की गलत समझ को दर्शाता है।

चयनात्मक वकालत पर सवाल

नेता प्रतिपक्ष ने यह भी सवाल उठाया कि जो नेता खुद को 'बड़े दिग्गज' मानते हैं, उन्होंने कभी नेपाल, भूटान, चीन या म्यांमार के साथ भारत की वार्ता को लेकर आवाज़ नहीं उठाई। उनका कहना था, 'जब-जब भारत ने शांति के लिए प्रयास किए हैं, तब-तब पाकिस्तान ने छुरा घोंपने का काम किया है।'

पृष्ठभूमि: संयुक्त पत्र और हस्ताक्षरकर्ता

गौरतलब है कि भारत और पाकिस्तान के लगभग 117 लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को संयुक्त रूप से पत्र लिखकर दोनों देशों के बीच वार्ता की अपील की है। भारत की ओर से इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, मणिशंकर अय्यर, मनोज झा और हुमायूँ कबीर जैसे नेता शामिल हैं। शर्मा की यह प्रतिक्रिया सीधे इसी पत्र के संदर्भ में आई है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस और तेज़ होने के आसार हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन शर्मा ने चुनिंदा नामों को निशाना बनाकर पूरे पत्र को संदिग्ध ठहराने की कोशिश की — यह एक परिचित रणनीति है। असली सवाल यह है कि क्या 'जाँच' की माँग असहमति को दबाने का औज़ार बन रही है, और क्या जम्मू-कश्मीर के नौजवानों की शांति व रोज़गार की चाहत को सिर्फ सुरक्षा-केंद्रित बहस से पूरा किया जा सकता है।
RashtraPress
1 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुनील शर्मा ने भारत-पाकिस्तान वार्ता की पैरवी पर क्यों आपत्ति जताई?
जम्मू-कश्मीर के नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषय पर दखल देना अनुचित है, खासकर तब जब यह माँग उन नेताओं की ओर से आ रही हो जिन पर अलगाववाद और आतंकवाद को संरक्षण देने के आरोप लगते रहे हैं। उन्होंने इसकी गंभीर जाँच की माँग की।
भारत-पाकिस्तान वार्ता के लिए लिखे गए संयुक्त पत्र में कौन-कौन शामिल हैं?
भारत और पाकिस्तान के लगभग 117 लोगों ने PM नरेंद्र मोदी और PM शहबाज शरीफ को संयुक्त पत्र लिखा है। भारत की ओर से फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, मणिशंकर अय्यर, मनोज झा और हुमायूँ कबीर इस पत्र के हस्ताक्षरकर्ताओं में शामिल हैं।
ऑपरेशन सिंदूर का इस विवाद से क्या संबंध है?
सुनील शर्मा ने ऑपरेशन सिंदूर का हवाला देते हुए कहा कि जब भारतीय सेना ने अपना शौर्य प्रदर्शित किया हो, ऐसे समय में पाकिस्तान से वार्ता की वकालत करना 'विवादित' दिखाई पड़ता है। उनके अनुसार यह सैन्य बलिदान का अनादर है।
शर्मा के अनुसार जम्मू-कश्मीर की असली ज़रूरत क्या है?
शर्मा ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में कानून-व्यवस्था पिछले कुछ वर्षों में दृढ़ हुई है और यहाँ का नौजवान शांति, रोज़गार और समृद्धि चाहता है। उनके मुताबिक इन लक्ष्यों को और मज़बूत करने पर ध्यान देना चाहिए, न कि पाकिस्तान से वार्ता की पैरवी पर।
शर्मा ने किन नेताओं पर चयनात्मक वकालत का आरोप लगाया?
शर्मा ने कहा कि जो नेता पाकिस्तान के साथ बातचीत की बात करते हैं, उन्होंने कभी नेपाल, भूटान, चीन या म्यांमार के साथ भारत की वार्ता को लेकर आवाज़ नहीं उठाई। उनके अनुसार यह चयनात्मक रवैया संदेह पैदा करता है।
राष्ट्र प्रेस
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