तस्लीमा नसरीन की कोलकाता वापसी: 19 साल के निर्वासन के बाद लेखिका ने कहा 'बहुत अच्छा लग रहा है'
सारांश
मुख्य बातें
बांग्लादेशी लेखिका और कवयित्री तस्लीमा नसरीन 31 जुलाई 2026 को लगभग 19 वर्षों के अनैच्छिक निर्वासन के बाद कोलकाता लौटीं। दोपहर 12:50 बजे IST पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरते ही शंखों की गूँज और भव्य स्वागत के बीच भावुक दिख रहीं नसरीन ने कहा, 'यहाँ दोबारा आकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है।' यह वापसी उस दर्दनाक अध्याय का अंत है जो 2007 में उनके उपन्यास 'द्विखंडितो' के विरोध में भड़की हिंसा के बाद शुरू हुआ था।
वापसी और स्वागत
नसरीन शुक्रवार, 31 जुलाई को कोलकाता पहुँचीं और शनिवार को सेंट्रल कोलकाता के ऐतिहासिक रवींद्र सदन में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम को संबोधित करने वाली हैं। यह आयोजन विभिन्न सांस्कृतिक समूहों द्वारा किया गया है, जिनमें 'सेक्युलर मिशन' भी शामिल है। सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के भी इस कार्यक्रम में उपस्थित होने की संभावना है।
2007 की हिंसा और निर्वासन की पृष्ठभूमि
2007 में नसरीन के उपन्यास 'द्विखंडितो' के प्रकाशन के बाद कोलकाता के कुछ अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में भीषण हिंसा भड़क उठी थी। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि प्रशासन को सेना तैनात करनी पड़ी।
तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली सीपीआई(एम) की वाम मोर्चा सरकार ने राज्य में पुस्तक के वितरण पर प्रतिबंध लगा दिया और नसरीन को कोलकाता छोड़ने के लिए कहा गया। यह अलिखित प्रतिबंध बाद में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के शासनकाल में भी जारी रहा।
राजनीतिक विरोधाभास और आलोचना
धर्मनिरपेक्षता का दावा करने वाली वाम मोर्चा सरकार को साहित्यिक और बौद्धिक हलकों से कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा था। आलोचकों ने सवाल उठाया कि कट्टरपंथी समूहों के दबाव में आकर एक लेखिका को राज्य से बाहर क्यों किया गया।
गौरतलब है कि 2011 से 2026 तक TMC के 15 वर्षीय शासनकाल में तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी नसरीन की कोलकाता वापसी के लिए कोई ठोस पहल नहीं की। यह ऐसे समय में आया है जब पश्चिम बंगाल में नई सरकार के तहत राज्य की सांस्कृतिक-राजनीतिक दिशा बदल रही है।
सुरक्षा व्यवस्था
राज्य पुलिस प्रशासन ने नसरीन की सुरक्षा को लेकर सतर्कता बरतते हुए उनके पूरे प्रवास के दौरान कड़ी सुरक्षा का आश्वासन दिया है। पिछले विवादों को देखते हुए यह कदम अपेक्षित माना जा रहा था।
आगे क्या
नसरीन की यह वापसी केवल एक व्यक्तिगत यात्रा नहीं है — यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक दबाव के बीच चले दशकों पुराने संघर्ष का प्रतीकात्मक मोड़ है। रवींद्र सदन में उनका संबोधन और मुख्यमंत्री अधिकारी की संभावित उपस्थिति यह संकेत देती है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस मुद्दे पर नई स्थिति बन रही है।