तस्लीमा नसरीन की कोलकाता वापसी पर BJP बोली — '19 साल बाद स्वागत है', TMC सरकार पर साधा निशाना
सारांश
मुख्य बातें
प्रसिद्ध बांग्लादेशी लेखिका और कवयित्री तस्लीमा नसरीन करीब 19 वर्षों के अंतराल के बाद शुक्रवार को कोलकाता लौटीं, जिस पर पश्चिम बंगाल भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने खुलकर उनका स्वागत किया और पिछली सरकारों पर वोट-बैंक की राजनीति के चलते उन्हें प्रतिबंधित करने का आरोप लगाया। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य और केंद्रीय राज्यमंत्री सुकांत मजूमदार दोनों ने स्पष्ट किया कि वैध वीज़ा के साथ नसरीन को पश्चिम बंगाल आने का पूरा अधिकार है।
भट्टाचार्य का बयान: वोट-बैंक के लिए लगाया गया प्रतिबंध
कोलकाता में पत्रकारों से बातचीत में समिक भट्टाचार्य ने कहा कि तस्लीमा नसरीन महज एक लेखिका या कवयित्री नहीं हैं — उन्होंने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हुए अत्याचारों को दुनिया के सामने रखा। उन्होंने आरोप लगाया कि सीपीएम सरकार ने नसरीन के सभी उपन्यासों पर प्रतिबंध केवल इसलिए लगाया ताकि उसका वोट-बैंक सुरक्षित रहे। उन्होंने कहा कि बाद में कांग्रेस ने भी यही नीति अपनाई और उसके बाद की सरकार ने भी यही रवैया जारी रखा।
भट्टाचार्य ने यह भी बताया कि भाजपा ने राज्यसभा में यह मुद्दा उठाया था। उन्होंने तर्क दिया कि चूँकि नसरीन बांग्ला बोलती हैं, बांग्ला में कविताएँ और उपन्यास लिखती हैं, इसलिए उन्हें पश्चिम बंगाल आने की अनुमति मिलनी ही चाहिए।
सुकांत मजूमदार: वैध वीज़ा है तो रोक कैसी
केंद्रीय राज्यमंत्री सुकांत मजूमदार ने साफ शब्दों में कहा कि यदि तस्लीमा नसरीन के पास वैध वीज़ा है, तो वह भारत में कहीं भी जा सकती हैं। उन्होंने कहा, 'पश्चिम बंगाल भारत से बाहर नहीं है — वैध वीज़ा के साथ उन्हें यहाँ आने का पूरा अधिकार है।' यह बयान ऐसे समय में आया है जब नसरीन की वापसी ने राज्य की राजनीति में एक बार फिर बहस छेड़ दी है।
2007 की हिंसा और कोलकाता छोड़ने की पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि 2007 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के कार्यकाल के दौरान कोलकाता के कुछ इलाकों में भड़की हिंसा के कारण तस्लीमा नसरीन को शहर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था। यह हिंसा उनकी पुस्तक 'द्विखंडितो' के विरोध में हुई थी। तब से वे भारत से बाहर रह रही थीं। उनकी यह वापसी करीब 19 वर्षों बाद हुई है, जो इसे एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक और राजनीतिक घटना बनाती है।
संत रविदास का संदर्भ: भट्टाचार्य का व्यापक संदेश
इस अवसर पर भट्टाचार्य ने संत रविदास का उल्लेख करते हुए समानता और सामाजिक न्याय के मूल्यों को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि पंद्रहवीं सदी में वाराणसी के निकट सीर गोवर्धनपुर में जन्मे संत रविदास ने जाति-भेद और छुआछूत के विरुद्ध आवाज उठाई और आम जन की भाषा में भक्ति व मानवता का संदेश फैलाया। उनकी कई रचनाएँ सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ 'गुरु ग्रंथ साहिब' में शामिल हैं। भट्टाचार्य का यह संदर्भ नसरीन की वापसी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के व्यापक ढाँचे से जोड़ने का प्रयास था।
आगे क्या
तस्लीमा नसरीन की कोलकाता वापसी पर तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया अभी सामने नहीं आई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक राजनीति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर आने वाले दिनों में और गर्म हो सकता है।