1 अगस्त 2026
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तसलीमा नसरीन की कोलकाता वापसी: करीब दो दशक के निर्वासन के बाद 'फेरा' की नायिका जैसी घर वापसी

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तसलीमा नसरीन की कोलकाता वापसी: करीब दो दशक के निर्वासन के बाद 'फेरा' की नायिका जैसी घर वापसी

सारांश

करीब दो दशक के निर्वासन के बाद तसलीमा नसरीन की कोलकाता वापसी महज एक यात्रा नहीं — यह उनके अपने उपन्यास 'फेरा' की जीवंत पुनरावृत्ति है। विस्थापन, स्मृति और अपनेपन की तलाश — जो कल्याणी की कहानी में थी, वही अब लेखिका के अपने जीवन में उतर आई है।

मुख्य बातें

तसलीमा नसरीन 1 अगस्त 2026 को लगभग दो दशक के अंतराल के बाद पहली बार सार्वजनिक रूप से कोलकाता पहुँचीं।
उनकी वापसी उनके उपन्यास 'फेरा (द रिटर्न)' की नायिका कल्याणी की यात्रा से गहरे स्तर पर मेल खाती है — दोनों में विस्थापन और घर वापसी का भाव केंद्रीय है।
1994 में बांग्लादेश छोड़ने के बाद 2004 में कोलकाता आईं, लेकिन 2007 में वाम मोर्चा सरकार ने उन्हें राज्य छोड़ने पर विवश किया।
राज्यसभा सांसद समीक भट्टाचार्य ने मार्च 2025 में संसद में उनकी वापसी की माँग उठाई थी।
तसलीमा ने इस यात्रा को भावनात्मक 'घर वापसी' बताया; भविष्य में स्थायी पहुँच को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

बांग्लादेशी मूल की विख्यात लेखिका तसलीमा नसरीन 1 अगस्त 2026 को लगभग दो दशक के अंतराल के बाद पहली बार सार्वजनिक रूप से कोलकाता पहुँचीं। यह वापसी उनके चर्चित उपन्यास 'फेरा (द रिटर्न)' की कथावस्तु से गहरे स्तर पर मेल खाती प्रतीत होती है — हालाँकि दोनों की परिस्थितियाँ भिन्न हैं, विस्थापन, स्मृतियों और अपनेपन की तलाश का साझा भाव दोनों में स्पष्ट रूप से उभरता है।

उपन्यास और वास्तविकता का समानांतर

'फेरा' की नायिका कल्याणी पूर्वी पाकिस्तान — अब बांग्लादेश — से भारत आई एक हिंदू महिला है, जो वर्षों बाद अपने जन्मस्थान लौटती है। उपन्यास में विभाजन की त्रासदी, महिलाओं के संघर्ष और पहचान के संकट को केंद्र में रखा गया है। तसलीमा की वास्तविक वापसी भी महज़ एक शहर में लौटना नहीं, बल्कि उस भाषा, संस्कृति और स्मृतियों से पुनः जुड़ने का प्रतीक मानी जा रही है जिन्हें उन्होंने कभी स्वेच्छा से नहीं छोड़ा था।

उपन्यास में कल्याणी जब वर्षों बाद अपने जन्मस्थान पहुँचती है, तो पाती है कि समय ने लोगों, रिश्तों और परिवेश को बदल दिया है — उसकी यादों का घर अब पहले जैसा नहीं रहा। तसलीमा की कोलकाता वापसी भी यही प्रश्न उठाती है: क्या स्मृतियों में बसे घर को वास्तव में दोबारा पाया जा सकता है?

निर्वासन की पृष्ठभूमि

तसलीमा नसरीन को धार्मिक कट्टरता की मुखर आलोचना और महिलाओं के अधिकारों की पैरवी के कारण लगातार जानलेवा धमकियाँ मिलती रहीं। कट्टरपंथियों ने उनके सिर पर इनाम घोषित कर दिया, जिसके चलते उन्हें 1994 में बांग्लादेश छोड़ना पड़ा और तब से वह निर्वासन का जीवन जी रही हैं।

उनके 1993 में प्रकाशित उपन्यास 'लज्जा' में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बांग्लादेश में एक हिंदू परिवार पर हुए अत्याचारों का मार्मिक चित्रण किया गया था। इस पुस्तक ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई, किंतु साथ ही उनके अपने देश में तीव्र विरोध का भी सामना करना पड़ा।

कोलकाता से बेदखली का इतिहास

2004 में तसलीमा ने कोलकाता को अपना ठिकाना बनाया। लेकिन 2007 में उनकी आत्मकथात्मक पुस्तक 'द्विखंडित' को लेकर हुए उग्र विरोध प्रदर्शनों के बाद तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए उन्हें पश्चिम बंगाल छोड़ने पर विवश कर दिया।

हालाँकि उनकी वापसी पर कभी कोई औपचारिक प्रतिबंध नहीं लगाया गया, किंतु तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार के कार्यकाल में भी उनके लिए कोलकाता के दरवाज़े प्रभावी रूप से बंद ही रहे। इसके बाद उन्होंने नई दिल्ली को अपना स्थायी निवास बना लिया।

वापसी की उम्मीद मार्च 2025 में तब जगी जब पश्चिम बंगाल भारतीय जनता पार्टी (BJP) अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद समीक भट्टाचार्य ने संसद के उच्च सदन में उन्हें कोलकाता लौटने की अनुमति देने की माँग उठाई थी। यह माँग उस विवाद के बाद सामने आई जब TMC सरकार पर 'लज्जा' पर आधारित नाटक के मंचन को रोकने का आरोप लगा था।

तसलीमा का कोलकाता से भावनात्मक रिश्ता

तसलीमा नसरीन का जन्म कोलकाता में नहीं हुआ, फिर भी वह इस शहर को हमेशा अपनी 'सिटी ऑफ जॉय' मानती रही हैं। उनके लिए यह शहर बांग्ला भाषा, साहित्य, संस्कृति और आत्मीय संबंधों का केंद्र रहा है — एक दूसरा घर, जो उनसे छीन लिया गया।

तसलीमा ने इस यात्रा को एक भावनात्मक 'घर वापसी' बताया है और कोलकाता के दरवाज़े फिर से खुलने पर आभार व्यक्त किया है। उनकी यह वापसी उनके निष्कासन के प्रतीकात्मक अंत और उस शहर में लौटने के अधिकार की देर से मिली स्वीकार्यता के रूप में देखी जा रही है।

आगे क्या

यह देखना अभी बाकी है कि यह स्वागत केवल एक औपचारिक अवसर तक सीमित रहता है या भविष्य में भी उनके लिए कोलकाता का दरवाज़ा स्थायी रूप से खुला रहेगा। 'फेरा' की कल्याणी की तरह, तसलीमा की इस वापसी का असली अर्थ समय के साथ ही स्पष्ट होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

फिर भी वाम मोर्चा और TMC — दोनों सरकारों ने उन्हें व्यावहारिक रूप से बाहर रखा। यह प्रश्न अनुत्तरित है कि क्या यह वापसी नीतिगत बदलाव का संकेत है या केवल एक प्रतीकात्मक अवसर। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लेखकों की सुरक्षा पर भारत की साख की असली परीक्षा इस बात से होगी कि तसलीमा के लिए कोलकाता का दरवाज़ा आगे भी खुला रहता है या नहीं।
RashtraPress
1 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तसलीमा नसरीन कितने समय बाद कोलकाता लौटीं?
तसलीमा नसरीन लगभग दो दशक के अंतराल के बाद 1 अगस्त 2026 को पहली बार सार्वजनिक रूप से कोलकाता पहुँचीं। वह 2007 में पश्चिम बंगाल से बाहर जाने के लिए विवश की गई थीं और तब से नई दिल्ली में रह रही थीं।
तसलीमा नसरीन को कोलकाता क्यों छोड़ना पड़ा था?
2007 में उनकी आत्मकथात्मक पुस्तक 'द्विखंडित' को लेकर हुए उग्र विरोध प्रदर्शनों के बाद तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए उन्हें पश्चिम बंगाल छोड़ने पर मजबूर किया था। हालाँकि उन पर कभी कोई औपचारिक प्रतिबंध नहीं लगाया गया।
तसलीमा नसरीन का उपन्यास 'फेरा' किस बारे में है?
'फेरा (द रिटर्न)' में नायिका कल्याणी पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से भारत आई एक हिंदू महिला है, जो वर्षों बाद अपने जन्मस्थान लौटती है। उपन्यास विभाजन की त्रासदी, महिलाओं के संघर्ष और पहचान के संकट को केंद्र में रखता है।
तसलीमा नसरीन की कोलकाता वापसी की माँग किसने उठाई थी?
पश्चिम बंगाल BJP अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद समीक भट्टाचार्य ने मार्च 2025 में संसद के उच्च सदन में तसलीमा को कोलकाता लौटने की अनुमति देने की माँग उठाई थी। यह माँग TMC सरकार पर 'लज्जा' आधारित नाटक के मंचन को रोकने के आरोप के बाद आई थी।
तसलीमा नसरीन को बांग्लादेश क्यों छोड़ना पड़ा?
धार्मिक कट्टरता की आलोचना और महिलाओं के अधिकारों की पैरवी के कारण उन्हें जानलेवा धमकियाँ मिलती रहीं और कट्टरपंथियों ने उनके सिर पर इनाम घोषित कर दिया। इसके चलते उन्हें 1994 में बांग्लादेश छोड़ना पड़ा और तब से वह निर्वासन में हैं।
राष्ट्र प्रेस
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