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त्रिपुरा: सिपाहीजाला की 30 महिलाएं जूट बैग प्रशिक्षण से 'लखपति दीदी' बनने की राह पर

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त्रिपुरा: सिपाहीजाला की 30 महिलाएं जूट बैग प्रशिक्षण से 'लखपति दीदी' बनने की राह पर

सारांश

त्रिपुरा के सिपाहीजाला जिले में ग्रामीण जीविका मिशन की पहल पर 30 एसएचजी महिलाएं जूट बैग निर्माण का 20 दिवसीय प्रशिक्षण ले रही हैं। 'लखपति दीदी योजना' के तहत इन्हें सालाना ₹1 लाख की आय दिलाने का लक्ष्य है और प्रशिक्षण के बाद एक उत्पादन इकाई स्थापित करने की योजना है।

मुख्य बातें

त्रिपुरा के सिपाहीजाला जिले के चारिलम ब्लॉक में 30 से अधिक एसएचजी महिलाओं को जूट बैग निर्माण का 20 दिवसीय प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
प्रशिक्षण 9 जुलाई से शुरू होकर 31 जुलाई 2025 तक चलेगा; ग्रामीण जीविका मिशन की पहल पर आयोजित।
'लखपति दीदी योजना' का लक्ष्य एसएचजी महिलाओं को सालाना ₹1 लाख की स्थिर घरेलू आय दिलाना है।
प्रशिक्षण के बाद जूट बैग, फाइल कवर, डोरमैट और सजावटी वस्तुएं बनाने की एक उत्पादन इकाई स्थापित करने की योजना है।
चारिलम ब्लॉक पंचायत समिति की चेयरपर्सन खेला भौमिक देबनाथ ने प्रशिक्षण शिविर का दौरा कर महिलाओं को प्रोत्साहित किया।

त्रिपुरा के सिपाहीजाला जिले के चारिलम ब्लॉक में ग्रामीण जीविका मिशन के तहत 30 से अधिक महिलाओं को जूट बैग निर्माण का 20 दिवसीय प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जो 9 जुलाई से शुरू होकर 31 जुलाई 2025 तक चलेगा। यह पहल केंद्र सरकार की 'लखपति दीदी योजना' का हिस्सा है, जिसका लक्ष्य स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) से जुड़ी ग्रामीण महिलाओं को सालाना ₹1 लाख की स्थिर आय दिलाना है।

प्रशिक्षण कार्यक्रम का विवरण

यह प्रशिक्षण चारिलम आरडी ऑफिस की दोमंजिला इमारत में आयोजित किया जा रहा है, जहाँ महिलाओं को जूट से बैग, फाइल फोल्डर, डोरमैट, सजावटी वॉल मैट और हैंडबैग बनाने की सिलाई तकनीकें सिखाई जा रही हैं। चारिलम ब्लॉक पंचायत समिति की चेयरपर्सन खेला भौमिक देबनाथ ने बुधवार को प्रशिक्षण शिविर का दौरा कर महिलाओं का उत्साहवर्धन किया।

आगे की योजना: उत्पादन इकाई की स्थापना

प्रशिक्षण पूरा होने के बाद ग्रामीण जीविका मिशन चारिलम आरडी ब्लॉक इन महिलाओं के साथ मिलकर एक जूट बैग निर्माण इकाई स्थापित करने की योजना बना रहा है। इस इकाई के ज़रिए महिलाएं फाइल कवर, बैग, जूट के डोरमैट और घर की सजावट की वस्तुएं बनाकर सरकारी विभागों सहित खुले बाज़ार में बेच सकेंगी। यह कदम महिलाओं को दीर्घकालिक रोज़गार और आत्मनिर्भरता की दिशा में ले जाने का प्रयास है।

महिलाओं की आवाज़

'लखपति दीदी' संपा दत्ता ने बताया कि चारिलम में बांस की कलाकारी और खिलौना निर्माण जैसे अनेक प्रशिक्षण सत्र होते हैं, लेकिन जूट बैग बनाने की ट्रेनिंग महिलाओं में विशेष उत्साह जगा रही है। उन्होंने कहा, 'बाज़ार में प्लास्टिक के बैग का बोलबाला है, लेकिन हम उनकी जगह जूट के बैग, डोरमैट, सजावटी वॉल मैट और हैंडबैग इस्तेमाल कर सकते हैं। जूट कुदरती तौर पर आसानी से खराब नहीं होता।'

एक अन्य एसएचजी सदस्य पिंटू भौमिक ने कहा, 'हमने लगभग 20 दिन पहले बैग बनाने की ट्रेनिंग शुरू की थी और अब हम बहुत अच्छे उत्पाद बना रहे हैं। हम आने वाले दिनों में सरकारी विभागों में फाइल कवर और बैग जैसे उत्पादों को बढ़ावा देना चाहते हैं। हमारा मकसद है कि सभी एसएचजी बहनें लखपति दीदी बनें।'

पर्यावरण और बाज़ार की दृष्टि से महत्व

यह पहल केवल आर्थिक सशक्तीकरण तक सीमित नहीं है — जूट उत्पाद प्लास्टिक का पर्यावरण-अनुकूल विकल्प भी हैं। पिंटू भौमिक के अनुसार, इन बैगों की बाज़ार में अभी बहुत अधिक मांग है और लगभग हर सरकारी व सामाजिक कार्यक्रम में इनका उपयोग होता है। यह ऐसे समय में आया है जब प्लास्टिक प्रदूषण के खिलाफ जागरूकता बढ़ रही है और जूट जैसे प्राकृतिक रेशे की माँग तेज़ी से बढ़ रही है।

गौरतलब है कि त्रिपुरा में ग्रामीण जीविका मिशन के अंतर्गत इस तरह के कौशल विकास कार्यक्रम 'लखपति दीदी' लक्ष्य को ज़मीन पर उतारने के प्रयासों का हिस्सा हैं, जिसके तहत एसएचजी महिलाओं को स्थायी आजीविका से जोड़ा जा रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस उत्पादन इकाई की व्यावसायिक सफलता में होगी जो अभी केवल योजना के स्तर पर है। जूट उत्पादों की बाज़ार में माँग वास्तविक है, लेकिन सरकारी विभागों में इन उत्पादों की खरीद सुनिश्चित किए बिना और विपणन तंत्र बनाए बिना, महिलाओं की आय ₹1 लाख के लक्ष्य तक पहुँचना मुश्किल होगा। त्रिपुरा में बांस शिल्प और अन्य कौशल विकास कार्यक्रमों के अनुभव बताते हैं कि प्रशिक्षण और बाज़ार के बीच की खाई ही सबसे बड़ी चुनौती रहती है।
RashtraPress
29 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

त्रिपुरा में जूट बैग प्रशिक्षण कार्यक्रम क्या है?
यह ग्रामीण जीविका मिशन द्वारा सिपाहीजाला जिले के चारिलम ब्लॉक में आयोजित 20 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम है, जिसमें 30 से अधिक एसएचजी महिलाओं को जूट बैग, फाइल फोल्डर, डोरमैट और सजावटी वस्तुएं बनाना सिखाया जा रहा है। यह कार्यक्रम 9 जुलाई से 31 जुलाई 2025 तक चल रहा है।
'लखपति दीदी योजना' क्या है और इससे महिलाओं को क्या फायदा होगा?
'लखपति दीदी योजना' केंद्र सरकार का एक कार्यक्रम है जो स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) से जुड़ी ग्रामीण महिलाओं को सालाना ₹1 लाख की स्थिर घरेलू आय कमाने में सक्षम बनाता है। इस योजना के तहत कौशल प्रशिक्षण, उत्पादन इकाइयों की स्थापना और बाज़ार से जुड़ाव के ज़रिए महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया जाता है।
प्रशिक्षण के बाद महिलाएं क्या करेंगी?
प्रशिक्षण पूरा होने के बाद ग्रामीण जीविका मिशन चारिलम ब्लॉक में एक जूट बैग निर्माण इकाई स्थापित करने की योजना बना रहा है। इस इकाई के ज़रिए महिलाएं जूट बैग, फाइल कवर, डोरमैट और घर की सजावट की वस्तुएं बनाकर सरकारी विभागों और खुले बाज़ार में बेच सकेंगी।
जूट उत्पादों को पर्यावरण के लिए क्यों बेहतर माना जाता है?
जूट एक प्राकृतिक रेशा है जो प्लास्टिक के विपरीत पर्यावरण को प्रदूषित नहीं करता। एसएचजी सदस्यों के अनुसार जूट के बैग और अन्य उत्पाद प्लास्टिक का टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प हैं, जिनकी बाज़ार में और सरकारी व सामाजिक कार्यक्रमों में बढ़ती माँग है।
इस कार्यक्रम में कौन-से उत्पाद बनाना सिखाया जा रहा है?
प्रशिक्षण में महिलाओं को जूट बैग, फाइल फोल्डर, फाइल की-बैग, डोरमैट, सजावटी वॉल मैट और हैंडबैग बनाना सिखाया जा रहा है। ये उत्पाद सरकारी विभागों, कार्यक्रमों और खुले बाज़ार में बिक्री के लिए तैयार किए जाएंगे।
राष्ट्र प्रेस
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