उपहार अग्निकांड के 29 साल: एवीयूटी ने कहा — तीन दशक बाद भी नहीं बदले हालात, न्याय अधूरा
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली में 13 जून 1997 को हुए उपहार सिनेमा अग्निकांड को 29 वर्ष पूरे हो गए हैं, लेकिन 59 लोगों की जान लेने वाली इस त्रासदी के पीड़ित परिवार आज भी पूर्ण न्याय की प्रतीक्षा में हैं। इस अवसर पर एसोसिएशन ऑफ विक्टिम्स ऑफ उपहार ट्रेजेडी (एवीयूटी) ने देश की अग्नि सुरक्षा व्यवस्था, न्यायिक प्रक्रिया और प्रशासनिक जवाबदेही पर तीखे सवाल उठाए।
नीलम कृष्णमूर्ति का बयान: 'मानव जीवन और सस्ता हो गया'
एवीयूटी की अध्यक्ष नीलम कृष्णमूर्ति ने कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि 29 साल बीत जाने के बाद भी हालात में कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं आया। उनके अनुसार, यदि कुछ बदला है तो वह यह कि आज मानव जीवन की कीमत और भी सस्ती हो गई है।
उन्होंने कहा कि ऐसी त्रासदियों के लिए केवल कोई एक व्यक्ति या संस्था नहीं, बल्कि कई सरकारी विभाग जिम्मेदार होते हैं और इसकी मूल वजह भ्रष्टाचार है। नीलम कृष्णमूर्ति ने स्पष्ट किया कि भारत में अग्नि सुरक्षा कानूनों और भवन निर्माण नियमों की कमी नहीं है — समस्या उनके क्रियान्वयन की है। उनके अनुसार, भवन मालिक और संचालक प्रायः पैसे बचाने के लिए सुरक्षा मानकों से समझौता करते हैं, जिसकी कीमत आम लोगों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है।
अंसल बंधुओं का ₹60 करोड़ और ट्रॉमा सेंटर का मामला
उपहार मामले में अंसल बंधुओं — सुशील अंसल और गोपाल अंसल — द्वारा दिल्ली सरकार को दिए गए ₹60 करोड़ का उल्लेख करते हुए नीलम कृष्णमूर्ति ने कहा कि उनकी दृष्टि में यह सजा नहीं, बल्कि एक तरह का इनाम था। उन्होंने आरोप लगाया कि इस मामले में दिल्ली सरकार भी बराबर की जिम्मेदार थी, क्योंकि दिल्ली फायर सर्विस, डीवीबी, एमसीडी और पीडब्ल्यूडी के अधिकारी सरकार के ही कर्मचारी थे।
उन्होंने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि यह राशि पीड़ितों के लिए एक ट्रॉमा सेंटर के निर्माण में खर्च की जाए — जिसमें अंसल बंधुओं को निर्माण की जिम्मेदारी और डीवीबी को जमीन उपलब्ध करानी थी।
न्याय और फैसले में फर्क
नीलम कृष्णमूर्ति ने कहा कि लोग भले ही कहते हों कि न्याय मिल गया, लेकिन वास्तविकता यह है कि न्याय अभी भी अधूरा है। उनके शब्दों में, 'अदालत ने फैसला जरूर सुनाया, लेकिन फैसला सुनाना और न्याय देना दोनों अलग-अलग बातें हैं। इस देश में पीड़ितों को न्याय नहीं मिलता, बल्कि वे बार-बार पीड़ित होते रहते हैं।'
शेखर कृष्णमूर्ति: मालवीय नगर से उपहार तक — वही लापरवाही
एवीयूटी के महासचिव शेखर कृष्णमूर्ति ने कहा कि उपहार हादसे के बाद भी व्यवस्था में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया। उन्होंने हाल ही में दिल्ली के मालवीय नगर में हुई आग का उदाहरण देते हुए बताया कि दोनों मामलों में एक जैसी लापरवाही देखी गई — दोनों स्थानों पर केवल एक प्रवेश और निकास मार्ग था, जिससे लोग धुएं और दम घुटने के कारण फंस गए। कई लोगों की जान बचाने के लिए स्थानीय दुकानदारों को नीचे गद्दे बिछाने पड़े, ताकि ऊपर से कूदने वालों को सुरक्षित किया जा सके।
उन्होंने यह भी कहा कि आज भी फायर ब्रिगेड अक्सर पर्याप्त पानी, सही उपकरणों और पर्याप्त कर्मियों के बिना घटनास्थल पर पहुँचती है। पिछले 30 वर्षों में कई बड़े हादसे हुए, परंतु व्यवस्था में कोई ठोस सुधार नहीं दिखा।
मांगें और आगे का रास्ता
शेखर कृष्णमूर्ति ने माँग की कि मानव निर्मित आपदाओं के लिए एक अलग और कठोर कानून बनाया जाना चाहिए। उनके अनुसार ऐसे मामलों में कम से कम 10 साल की सजा अनिवार्य हो, अपराध गैर-जमानती हों, और मुकदमों का निपटारा दो साल के भीतर समयबद्ध तरीके से हो। उन्होंने पूछा कि बार-बार स्थगन कौन देता है और क्यों — और चेतावनी दी कि यदि इस पर रोक नहीं लगी, तो ऐसे हादसे आगे भी होते रहेंगे।
गौरतलब है कि 13 जून 1997 को ग्रीन पार्क स्थित उपहार सिनेमा में फिल्म 'बॉर्डर' के दोपहर 3 बजे के शो के दौरान भीषण आग लग गई थी। यह भारत के इतिहास की सबसे भयावह अग्नि त्रासदियों में से एक मानी जाती है, जिसमें 59 लोगों की जान गई और सैकड़ों लोग प्रभावित हुए। यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में सार्वजनिक स्थलों पर अग्नि सुरक्षा मानकों के पालन को लेकर सवाल फिर से उठ रहे हैं।