वंदे मातरम विवाद: कांग्रेस के दो पैराग्राफ वाले फैसले पर भाजपा बोली — शहीदों का अपमान
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस कार्य समिति (CWC) द्वारा 'वंदे मातरम' के केवल पहले दो पैराग्राफ गाने के अपने पुराने रुख को एक बार फिर दोहराने के बाद 20 अगस्त को देशभर में सियासी तापमान तेज़ी से चढ़ गया। जहाँ विपक्षी दलों ने इस निर्णय को ऐतिहासिक सर्वसम्मति का हिस्सा बताया, वहीं भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इसे स्वतंत्रता सेनानियों और शहीदों के प्रति अपमान करार दिया।
कांग्रेस का ऐतिहासिक तर्क
तिरुवनंतपुरम से कांग्रेस सांसद जेबी माथेर ने स्पष्ट किया कि यह रुख कोई नया नहीं है। उन्होंने कहा, 'वंदे मातरम पर कांग्रेस का रुख आज, कल या परसों का नहीं है। यह 1937 के कोलकाता अधिवेशन से चला आ रहा है, जब महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे महान नेता एक साथ आए। इस मामले पर चर्चा की और कांग्रेस कार्य समिति ने एक प्रस्ताव पारित किया कि वंदे मातरम के पहले दो पैराग्राफ गाए जाएंगे। वह फैसला आज भी कायम है और हमेशा कायम रहेगा।'
कांग्रेस का तर्क है कि 1937 में ही नेताओं ने तय किया था कि गीत के पहले दो पैराग्राफ सभी समुदायों के लिए स्वीकार्य हैं और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप में वही गाए जाने चाहिए।
इंडिया गठबंधन का समर्थन
कोल्लम से आरएसपी सांसद एन. के. प्रेमचंद्रन ने भी कांग्रेस-इंडिया गठबंधन के रुख का समर्थन किया। उन्होंने कहा, 'जहाँ तक वंदे मातरम की बात है, कांग्रेस और इंडिया गठबंधन का रुख बहुत स्पष्ट है। यह बिल्कुल तय है कि राष्ट्रगीत लोगों को बाँटने के लिए नहीं, बल्कि लोगों को एकजुट करने के लिए है। संविधान सभा तथा बाद के प्रस्तावों में सर्वसम्मति से यह तय किया गया है कि इस गीत को उन्हीं पदों के साथ गाया जाए जो पहले से मौजूद हैं, लेकिन अब सरकार उस फैसले को बदल रही है जो दुर्भाग्यपूर्ण है।'
भाजपा का पलटवार
दूसरी ओर, मुंबई से भाजपा विधायक राम कदम ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा, ''वंदे मातरम' क्रांतिकारियों का नारा था और आज़ादी की लड़ाई के दौरान प्रेरणा का स्रोत था। कई देशभक्तों ने 'वंदे मातरम' का नारा लगाते हुए फाँसी का फंदा चूमा, जेल की सज़ा काटी और लाठीचार्ज का सामना किया। कांग्रेस 15 अगस्त से लगातार 'वंदे मातरम' की आलोचना कर रही है, जिससे इस गीत और देश के लिए अपनी जान देने वाले शहीदों का अपमान हो रहा है।'
विवाद की पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि 'वंदे मातरम' को लेकर यह बहस नई नहीं है। 1937 के कोलकाता अधिवेशन में यह निर्णय लिया गया था कि गीत के शुरुआती दो पैराग्राफ — जो सभी धर्मों के लोगों को स्वीकार्य हैं — ही आधिकारिक रूप से गाए जाएंगे। यह विवाद ऐसे समय में फिर उभरा है जब 15 अगस्त 2025 के बाद से राष्ट्रगीत को लेकर राजनीतिक बयानबाज़ी लगातार जारी है।
आगे की राह
फिलहाल दोनों पक्षों के बीच यह बहस थमने के कोई संकेत नहीं हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रगीत जैसे संवेदनशील मुद्दे पर राजनीतिक सहमति बनाना आवश्यक है, अन्यथा यह विवाद सामाजिक ध्रुवीकरण को और गहरा कर सकता है।