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वंदे मातरम विवाद: कांग्रेस के दो पैराग्राफ वाले फैसले पर भाजपा बोली — शहीदों का अपमान

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वंदे मातरम विवाद: कांग्रेस के दो पैराग्राफ वाले फैसले पर भाजपा बोली — शहीदों का अपमान

सारांश

वंदे मातरम के केवल दो पैराग्राफ गाने का कांग्रेस का 1937 का फैसला एक बार फिर राजनीतिक अखाड़े में आ गया है। विपक्ष इसे ऐतिहासिक सर्वसम्मति बता रहा है, तो भाजपा इसे शहीदों का अपमान — यह बहस राष्ट्रीय प्रतीकों पर गहरे वैचारिक मतभेद को उजागर करती है।

मुख्य बातें

कांग्रेस कार्य समिति (CWC) ने 'वंदे मातरम' के केवल पहले दो पैराग्राफ गाने के अपने 1937 के फैसले को दोहराया।
तिरुवनंतपुरम से कांग्रेस सांसद जेबी माथेर ने कहा यह रुख 1937 के कोलकाता अधिवेशन से चला आ रहा है।
प्रेमचंद्रन ने इंडिया गठबंधन का समर्थन जताते हुए राष्ट्रगीत को एकता का प्रतीक बताया।
भाजपा विधायक राम कदम ने कांग्रेस पर शहीदों के अपमान का आरोप लगाया।
यह विवाद 15 अगस्त 2025 के बाद से लगातार राजनीतिक बहस का केंद्र बना हुआ है।

कांग्रेस कार्य समिति (CWC) द्वारा 'वंदे मातरम' के केवल पहले दो पैराग्राफ गाने के अपने पुराने रुख को एक बार फिर दोहराने के बाद 20 अगस्त को देशभर में सियासी तापमान तेज़ी से चढ़ गया। जहाँ विपक्षी दलों ने इस निर्णय को ऐतिहासिक सर्वसम्मति का हिस्सा बताया, वहीं भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इसे स्वतंत्रता सेनानियों और शहीदों के प्रति अपमान करार दिया।

कांग्रेस का ऐतिहासिक तर्क

तिरुवनंतपुरम से कांग्रेस सांसद जेबी माथेर ने स्पष्ट किया कि यह रुख कोई नया नहीं है। उन्होंने कहा, 'वंदे मातरम पर कांग्रेस का रुख आज, कल या परसों का नहीं है। यह 1937 के कोलकाता अधिवेशन से चला आ रहा है, जब महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे महान नेता एक साथ आए। इस मामले पर चर्चा की और कांग्रेस कार्य समिति ने एक प्रस्ताव पारित किया कि वंदे मातरम के पहले दो पैराग्राफ गाए जाएंगे। वह फैसला आज भी कायम है और हमेशा कायम रहेगा।'

कांग्रेस का तर्क है कि 1937 में ही नेताओं ने तय किया था कि गीत के पहले दो पैराग्राफ सभी समुदायों के लिए स्वीकार्य हैं और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप में वही गाए जाने चाहिए।

इंडिया गठबंधन का समर्थन

कोल्लम से आरएसपी सांसद एन. के. प्रेमचंद्रन ने भी कांग्रेस-इंडिया गठबंधन के रुख का समर्थन किया। उन्होंने कहा, 'जहाँ तक वंदे मातरम की बात है, कांग्रेस और इंडिया गठबंधन का रुख बहुत स्पष्ट है। यह बिल्कुल तय है कि राष्ट्रगीत लोगों को बाँटने के लिए नहीं, बल्कि लोगों को एकजुट करने के लिए है। संविधान सभा तथा बाद के प्रस्तावों में सर्वसम्मति से यह तय किया गया है कि इस गीत को उन्हीं पदों के साथ गाया जाए जो पहले से मौजूद हैं, लेकिन अब सरकार उस फैसले को बदल रही है जो दुर्भाग्यपूर्ण है।'

भाजपा का पलटवार

दूसरी ओर, मुंबई से भाजपा विधायक राम कदम ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा, ''वंदे मातरम' क्रांतिकारियों का नारा था और आज़ादी की लड़ाई के दौरान प्रेरणा का स्रोत था। कई देशभक्तों ने 'वंदे मातरम' का नारा लगाते हुए फाँसी का फंदा चूमा, जेल की सज़ा काटी और लाठीचार्ज का सामना किया। कांग्रेस 15 अगस्त से लगातार 'वंदे मातरम' की आलोचना कर रही है, जिससे इस गीत और देश के लिए अपनी जान देने वाले शहीदों का अपमान हो रहा है।'

विवाद की पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि 'वंदे मातरम' को लेकर यह बहस नई नहीं है। 1937 के कोलकाता अधिवेशन में यह निर्णय लिया गया था कि गीत के शुरुआती दो पैराग्राफ — जो सभी धर्मों के लोगों को स्वीकार्य हैं — ही आधिकारिक रूप से गाए जाएंगे। यह विवाद ऐसे समय में फिर उभरा है जब 15 अगस्त 2025 के बाद से राष्ट्रगीत को लेकर राजनीतिक बयानबाज़ी लगातार जारी है।

आगे की राह

फिलहाल दोनों पक्षों के बीच यह बहस थमने के कोई संकेत नहीं हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रगीत जैसे संवेदनशील मुद्दे पर राजनीतिक सहमति बनाना आवश्यक है, अन्यथा यह विवाद सामाजिक ध्रुवीकरण को और गहरा कर सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन मुख्यधारा की कवरेज अक्सर यह नहीं बताती कि उस अधिवेशन में गांधी और टैगोर जैसे नेताओं की सहमति से यह निर्णय लिया गया था। भाजपा का 'शहीद अपमान' का आरोप भावनात्मक रूप से प्रभावशाली है, लेकिन यह इस तथ्य को नज़रअंदाज़ करता है कि गीत के शेष पैराग्राफों में देवी-पूजा के संदर्भ हैं जो 1937 में ही विभिन्न समुदायों के लिए असहज माने गए थे। असली सवाल यह है कि क्या राष्ट्रीय एकता के प्रतीकों पर संसदीय संवाद के बजाय सड़क की बयानबाज़ी से आम सहमति बनेगी।
RashtraPress
20 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वंदे मातरम के दो पैराग्राफ गाने का फैसला कब और कैसे हुआ?
यह फैसला 1937 के कोलकाता अधिवेशन में कांग्रेस कार्य समिति ने लिया था, जिसमें महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और रवींद्रनाथ टैगोर शामिल थे। सर्वसम्मति से तय किया गया कि गीत के पहले दो पैराग्राफ सभी समुदायों के लिए स्वीकार्य हैं और इन्हें ही राष्ट्रीय अवसरों पर गाया जाएगा।
भाजपा ने कांग्रेस के रुख को शहीदों का अपमान क्यों कहा?
भाजपा विधायक राम कदम का तर्क है कि 'वंदे मातरम' स्वतंत्रता संग्राम के दौरान क्रांतिकारियों का प्रेरणा-नारा था और कई शहीदों ने इसे गाते हुए बलिदान दिया। उनके अनुसार, गीत के कुछ हिस्सों को न गाना उन शहीदों की स्मृति का अपमान है।
इंडिया गठबंधन का वंदे मातरम पर क्या रुख है?
इंडिया गठबंधन ने कांग्रेस के रुख का समर्थन किया है। आरएसपी सांसद एन. के. प्रेमचंद्रन ने कहा कि राष्ट्रगीत को लोगों को एकजुट करने के लिए गाया जाना चाहिए, न कि विभाजन के लिए, और संविधान सभा में भी यही सर्वसम्मति थी।
वंदे मातरम के बाकी पैराग्राफ क्यों नहीं गाए जाते?
1937 में यह माना गया था कि गीत के बाद के पैराग्राफों में देवी-पूजा के संदर्भ हैं जो सभी धर्मों के लोगों को समान रूप से स्वीकार्य नहीं हैं। इसलिए राष्ट्रीय एकता को ध्यान में रखते हुए केवल पहले दो पैराग्राफ गाने की परंपरा तय की गई।
यह विवाद अभी क्यों उभरा है?
15 अगस्त 2025 के बाद से वंदे मातरम को लेकर राजनीतिक बयानबाज़ी तेज़ हुई है। CWC द्वारा अपने पुराने रुख को सार्वजनिक रूप से दोहराने के बाद भाजपा ने इसे राष्ट्रीय मुद्दा बनाया, जिससे यह विवाद एक बार फिर सुर्खियों में आ गया।
राष्ट्र प्रेस
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