देवेंद्र झाझरिया: 8 साल में हाथ गंवाया, पैरालंपिक में भारत को दिलाए 3 ऐतिहासिक पदक
सारांश
मुख्य बातें
भारत के सबसे सफल पैरा एथलीट देवेंद्र झाझरिया ने जैवलिन थ्रो (भाला फेंक) में 3 पैरालंपिक पदक जीतकर देश का गौरव बढ़ाया है। मात्र 8 वर्ष की आयु में एक दुर्घटना में बायाँ हाथ गंवाने के बावजूद उन्होंने न केवल खेल जारी रखा, बल्कि विश्व रिकॉर्ड तोड़कर इतिहास रच दिया। उनकी जीवन-यात्रा संघर्ष, दृढ़ संकल्प और अदम्य खेल भावना की जीवंत मिसाल है।
बचपन की दुर्घटना और नई शुरुआत
10 जून 1981 को राजस्थान के चुरू में जन्मे देवेंद्र बचपन से ही जिज्ञासु और ऊर्जावान थे। एक दिन पेड़ पर चढ़ते समय वे हाई वोल्टेज बिजली के तार की चपेट में आ गए। ग्रामीणों ने उन्हें बेहोशी की हालत में पेड़ से उतारा — कई लोगों को लगा कि वे जीवित नहीं बचेंगे। डॉक्टरों ने तत्काल बायाँ हाथ काटने का निर्णय लिया। उस समय देवेंद्र की उम्र महज 8 साल थी।
इस हादसे के बाद देवेंद्र का सामाजिक जीवन बदल गया। दोस्तों के साथ पहले जैसा खेलना संभव नहीं रहा, क्योंकि कई बच्चे उन्हें बोझ समझने लगे। लेकिन इस एकाकीपन ने उनके भीतर एक नई जिद को जन्म दिया।
प्रतिभा की पहचान और पैरा-एथलेटिक्स में प्रवेश
देवेंद्र ने स्कूल में भाला फेंक प्रतियोगिताओं में भाग लेना शुरू किया। 1997 में एक पैरा-एथलेटिक्स प्रतियोगिता के दौरान कोच रिपुदमन सिंह ने उनकी असाधारण प्रतिभा को पहचाना और उन्हें इस खेल को गंभीरता से अपनाने की सलाह दी। यही वह मोड़ था जिसने देवेंद्र की दिशा बदल दी।
पैरालंपिक में ऐतिहासिक उपलब्धियाँ
23 वर्ष की आयु में देवेंद्र ने 2004 एथेंस पैरालंपिक के लिए क्वालीफाई किया और F46 भाला फेंक स्पर्धा में 62.15 मीटर के विश्व रिकॉर्ड थ्रो के साथ स्वर्ण पदक जीता। अगले दो पैरालंपिक संस्करणों में F46 इवेंट कार्यक्रम में शामिल नहीं था, जिससे उन्हें लंबे इंतजार का सामना करना पड़ा।
2016 रियो पैरालंपिक में देवेंद्र ने 63.97 मीटर के थ्रो के साथ अपना ही विश्व रिकॉर्ड बेहतर किया और भारत को दूसरा स्वर्ण दिलाया। इसी के साथ वे पैरालंपिक में दो स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय बन गए।
2020 टोक्यो पैरालंपिक में 64.35 मीटर के थ्रो के साथ उन्होंने रजत पदक जीता और पैरालंपिक इतिहास में तीन पदक जीतने वाले भारत के पहले एकल एथलीट बनने का गौरव हासिल किया।
पिता का संघर्ष और खेल के प्रति समर्पण
एक कठिन दौर में जब देवेंद्र के पिता राम सिंह कैंसर से जूझ रहे थे, देवेंद्र ने खेल छोड़ने का मन बना लिया था। लेकिन पिता ने उन्हें खेल पर ध्यान केंद्रित रखने की सलाह दी। देवेंद्र ने पिता की बात मानी और अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन की ओर बढ़ते रहे — यह उनके पारिवारिक बंधन और मानसिक दृढ़ता का प्रमाण है।
राष्ट्रीय सम्मान और अन्य उपलब्धियाँ
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देवेंद्र ने 2014 एशियन पैरा गेम्स में रजत पदक और IPC विश्व चैंपियनशिप में एक स्वर्ण व एक रजत पदक जीता है।
राष्ट्रीय सम्मानों की बात करें तो 2004 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार, 2012 में पद्मश्री, 2017 में राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार (अब मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार) और 2022 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। वे पद्म भूषण पाने वाले पहले पैरा एथलीट हैं। देवेंद्र झाझरिया की कहानी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत बनी रहेगी।