जसपाल राणा: 50वें जन्मदिन से 16 दिन पहले निधन, भारतीय निशानेबाजी का अपूरणीय नुकसान
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय निशानेबाजी के महानतम नामों में शुमार जसपाल राणा का 12 जून 2026 को नई दिल्ली के एक अस्पताल में निधन हो गया। वे अपने 50वें जन्मदिन से महज 16 दिन पहले दुनिया को अलविदा कह गए — एक ऐसी क्षति जिसे भारतीय खेल जगत लंबे समय तक महसूस करता रहेगा। 28 जून 1976 को टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड में जन्मे राणा ने एक एथलीट और फिर कोच के रूप में भारतीय निशानेबाजी को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर नई ऊँचाइयाँ दिलाईं।
असाधारण खिलाड़ी का सफर
राणा की प्रतिभा बचपन से ही असाधारण थी। महज 12 साल की उम्र में उन्होंने 1988 की 31वीं राष्ट्रीय निशानेबाजी प्रतियोगिता में रजत पदक जीतकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। 1994 में इटली के मिलान में आयोजित विश्व निशानेबाजी प्रतियोगिता में जूनियर स्तर पर उन्होंने विश्व रिकॉर्ड बनाते हुए अंतर्राष्ट्रीय पहचान हासिल की। 1996 के अटलांटा ओलंपिक में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया।
पदकों की अविश्वसनीय झड़ी
राणा ने कॉमनवेल्थ गेम्स में कुल 15 पदक जीते, जिनमें 1994 से 2006 के बीच चार संस्करणों में 9 स्वर्ण पदक शामिल हैं। इसके अलावा उन्होंने एशियन गेम्स में 8 पदक अपने नाम किए, जिनमें 4 स्वर्ण थे। उनकी सबसे यादगार उपलब्धि 2006 के दोहा एशियन गेम्स में रही, जहाँ तेज बुखार से जूझते हुए भी उन्होंने 3 स्वर्ण पदक जीते और 25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल इवेंट में 590 के विश्व रिकॉर्ड स्कोर की बराबरी की — एक ऐसा प्रदर्शन जो भारतीय खेल इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है।
पुरस्कार और सम्मान
राणा को 18 साल की उम्र में अर्जुन पुरस्कार से नवाज़ा गया। 21 साल की आयु में उन्हें प्रतिष्ठित पद्मश्री पुरस्कार मिला। कोचिंग में उत्कृष्ट योगदान के लिए 2020 में उन्हें द्रोणाचार्य पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया — यानी एक एथलीट और कोच दोनों रूपों में सर्वोच्च राष्ट्रीय मान्यता।
कोच के रूप में विरासत: मनु भाकर और पेरिस 2024
एथलीट के रूप में संन्यास के बाद राणा ने कोचिंग को अपना मिशन बनाया। उनकी मेहनत का सबसे चमकदार प्रमाण पेरिस ओलंपिक 2024 में दिखा, जब उनके मार्गदर्शन में प्रशिक्षित मनु भाकर ने 2 कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया। मनु एक ओलंपिक में दो पदक जीतने वाली पहली भारतीय एथलीट बनीं। गौरतलब है कि राणा के निधन से भारतीय निशानेबाजी ने वह कोच खो दिया है जिनके दम पर देश ओलंपिक स्वर्ण का सपना देख रहा था।
एक अमर विरासत
यह पहला अवसर है जब 28 जून को जसपाल राणा का जन्मदिन उनकी अनुपस्थिति में मनाया जाएगा। लेकिन उनकी उपलब्धियाँ, उनके शिष्यों की सफलताएँ और भारतीय निशानेबाजी को वैश्विक मानचित्र पर स्थापित करने में उनका योगदान उन्हें सदा जीवित रखेगा। भारतीय खेल जगत को अब एक ऐसे शून्य के साथ आगे बढ़ना होगा जिसे भरना आसान नहीं होगा।