प्रयागराज का अलोपी देवी शक्तिपीठ: मूर्ति के बिना होती है पूजा, नवरात्रि में भक्तों की भारी भीड़
सारांश
Key Takeaways
- अलोपी देवी शक्तिपीठ में मूर्ति के बिना पूजा होती है।
- यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में शामिल है।
- नवरात्रि के समय यहां भक्तों की भारी भीड़ होती है।
- मंदिर में कुंड का विशेष महत्व है।
- पूजा विधि में देवी के स्वरूपों का पाठ किया जाता है।
प्रयागराज, 14 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। चैत्र नवरात्रि का सनातन धर्म में महत्वपूर्ण स्थान है। यह पर्व हर वर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष चैत्र नवरात्रि 19 मार्च से शुरू होकर 27 मार्च तक चलेगा। इस दौरान देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है।
नवरात्रि के समय, देशभर के मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ देखने को मिलती है, जो माता के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में आते हैं।
यूपी के प्रयागराज में स्थित 'अलोपी देवी शक्ति पीठ' मंदिर इस संदर्भ में विशेष है। यहां माता की मूर्ति के बिना उनकी पूजा की जाती है, जो वास्तव में एक अद्भुत अनुभव है।
नवरात्रि के दौरान, इस मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है, हालांकि यहां माता की प्रतिमा न होने के कारण उनका श्रृंगार नहीं होता, लेकिन विधिपूर्वक पूरे नौ दिनों तक उनके विभिन्न स्वरूपों का पाठ किया जाता है।
इस मंदिर को 'अलोपी देवी मंदिर', 'मां अलोपशंकरी का सिद्धपीठ मंदिर' और 'ललिता मंदिर' के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, यहां मां सती के दाहिने हाथ का पंजा एक कुंड में गिरकर अदृश्य हो गया था। इसलिए इसे देवी अलोपशंकरी के नाम से जाना जाता है। मंदिर में देवी का कोई स्वरूप नहीं है, किंतु प्रांगण में एक कुंड है, जिसके ऊपर चांदी का झूला बना हुआ है, जिसे लाल कपड़े से ढका जाता है और उसकी पूजा की जाती है।
श्रद्धालुओं का मानना है कि मां सती की कलाई इसी स्थान पर गिरी थी, इसलिए वे इसी कुंड से जल लेकर उनके पालने पर चढ़ाते हैं और उसकी परिक्रमा करते हैं।