सुवेंदु अधिकारी के जनता दरबार में फरियाद: बेटे के लिवर ट्रांसप्लांट के लिए ₹20 लाख की मदद माँगी
सारांश
मुख्य बातें
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने बुधवार, 24 जून 2026 को कोलकाता स्थित भारतीय जनता पार्टी (BJP) मुख्यालय में 'जनता दरबार' का आयोजन किया, जिसमें राज्यभर से आए नागरिकों ने अपनी समस्याएँ रखीं। इस दरबार में एक लाचार पिता ने अपने बेटे के लिवर ट्रांसप्लांट के लिए ₹18–20 लाख की सहायता की गुहार लगाई, जबकि एक अन्य फरियादी ने TMC नेता द्वारा घर न खाली करने की शिकायत दर्ज कराई।
मजबूर पिता की फरियाद
जनता दरबार में पहुँचे सुभजीत रॉय ने बताया कि उनके बेटे को जन्म से ही लिवर की गंभीर बीमारी है और अब स्थिति अत्यंत नाज़ुक हो चुकी है। उन्होंने कहा, 'मेरे बच्चे का लिवर अब पूरी तरह खराब हो गया है। मैंने PG हॉस्पिटल और एम्स दिल्ली समेत कई सरकारी अस्पतालों में इलाज कराया है।'
इंस्टिट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलरी साइंसेज (ILBS) के डॉक्टरों ने 30 दिनों के भीतर लिवर ट्रांसप्लांट कराने की सलाह दी है। रॉय ने बताया कि उस समयसीमा के लगभग 15 दिन पहले ही बीत चुके हैं और अब केवल 10–15 दिन शेष हैं। उन्होंने कहा, 'इलाज का खर्च लगभग ₹18–20 लाख या उससे अधिक है। मैंने अपनी सारी बचत खर्च कर दी, सामान बेच दिया और कर्ज भी लिया, लेकिन अब मेरे पास कुछ नहीं बचा।'
किराएदार TMC नेता पर आरोप, पुलिस निष्क्रिय
एक अन्य फरियादी सायंतन जाना ने बताया कि उन्होंने 2018 में अपना घर एक स्थानीय निवासी देवजीत पांडेय को किराए पर दिया था, जो कथित तौर पर तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नेता हैं। जाना के अनुसार, पांडेय पिछले 4 वर्षों से न किराया दे रहे हैं और न ही मकान खाली कर रहे हैं।
जाना ने कहा कि उन्होंने कई बार थाने में शिकायत दी और 2023 में बिहाला थाने में FIR भी दर्ज कराई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। पुलिस का रुख यह रहा कि बिना अदालती आदेश के घर खाली नहीं कराया जा सकता। जाना ने मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की माँग की।
जनता दरबार की पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी राज्य के नागरिकों की समस्याओं के समाधान के लिए नियमित रूप से 'जनता दरबार' का आयोजन करते हैं। इन दरबारों में वे शिकायतें सुनकर संबंधित अधिकारियों को तत्काल समाधान के निर्देश देते हैं। यह आयोजन उनकी जन-संपर्क रणनीति का अहम हिस्सा बन चुका है।
आम जनता पर असर
इस दरबार में उठे मामले राज्य में दो बड़ी समस्याओं को रेखांकित करते हैं — एक ओर गरीब परिवारों के लिए महँगे चिकित्सा उपचार की अनुपलब्धता, और दूसरी ओर राजनीतिक संरक्षण के कारण संपत्ति विवादों में पुलिस की निष्क्रियता। यह ऐसे समय में सामने आया है जब राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं।
आगे क्या होगा
सुभजीत रॉय के मामले में समय अत्यंत सीमित है — डॉक्टरों की दी गई समयसीमा के भीतर ट्रांसप्लांट न हो पाने पर बच्चे की जान को खतरा है। सायंतन जाना के मामले में देखना होगा कि मुख्यमंत्री कार्यालय पुलिस को प्रभावी कार्रवाई के लिए निर्देशित करता है या नहीं। दोनों मामलों में अधिकारी के हस्तक्षेप की दिशा स्पष्ट होना अभी बाकी है।