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बिहार में जल संरक्षण की मिसाल: किशोर जायसवाल के तीन दशकों के प्रयास से 600 गांवों में बदलाव

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बिहार में जल संरक्षण की मिसाल: किशोर जायसवाल के तीन दशकों के प्रयास से 600 गांवों में बदलाव

सारांश

मुंगेर के किशोर जायसवाल तीन दशकों से बिहार के गांवों में जल संरक्षण की लड़ाई लड़ रहे हैं — 105 परियोजनाओं से 600 गांवों तक पहुँच, 2025 में राष्ट्रीय जल पुरस्कार। उनका संदेश: पानी बचाना곧 मिट्टी, फसल और गांव का भविष्य बचाना है।

मुख्य बातें

किशोर जायसवाल को वर्ष 2025 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों राष्ट्रीय जल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
पिछले तीन दशकों में 105 से अधिक जलग्रहण परियोजनाओं के ज़रिए बिहार के करीब 600 गांवों तक पहुँच बनाई।
सोसायटी फॉर वाटरशेड एंड रूरल डेवलपमेंट के माध्यम से नाबार्ड, पंचायतों और सरकारी योजनाओं को जल संरक्षण से जोड़ा।
पारंपरिक आहर-पईन प्रणाली को GIS, रिमोट सेंसिंग और सूक्ष्म सिंचाई जैसी आधुनिक तकनीकों से जोड़ने की वकालत।
मुंगेर के पोलो मैदान में स्वतंत्रता दिवस समारोह में प्रभारी मंत्री संजय कुमार ने उन्हें सम्मानित किया।
' जल बजट ' को गांव की विकास योजना का हिस्सा बनाने पर ज़ोर — हर गांव को पता हो कि उसके पास कितना पानी है।

मुंगेर के किशोर जायसवाल पिछले तीन दशकों से बिहार के ग्रामीण इलाकों में जल संरक्षण और जलग्रहण विकास के क्षेत्र में सक्रिय हैं। वर्ष 2025 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों राष्ट्रीय जल पुरस्कार से सम्मानित जायसवाल का मानना है कि पानी को केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि खेती, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों के जीवन की बुनियाद के रूप में देखना होगा। जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा और गिरते भूजल स्तर के बीच उनका काम आज और भी प्रासंगिक हो गया है।

जल संकट की असली जड़

जायसवाल के अनुसार, जल संकट का कारण केवल बारिश की कमी नहीं है। उनका कहना है कि असली चुनौती यह समझने की है कि वर्षा का पानी कहाँ गिरता है, कितना बहकर निकल जाता है, कितनी मिट्टी अपने साथ ले जाता है और कितना हिस्सा भूमि के भीतर पहुँच पाता है। इसी वैज्ञानिक सोच के साथ उन्होंने जलग्रहण विकास, भूजल पुनर्भरण और टिकाऊ कृषि को अपने सार्वजनिक जीवन का आधार बनाया।

600 गांवों तक पहुँच, 105 से अधिक परियोजनाएँ

सोसायटी फॉर वाटरशेड एंड रूरल डेवलपमेंट के माध्यम से काम करते हुए जायसवाल ने जल संरक्षण को केवल चेक डैम, खेत-तालाब, कुएँ और मेड़बंदी जैसी संरचनाओं तक सीमित नहीं रखा। उनके प्रयासों से 105 से अधिक जलग्रहण परियोजनाओं के ज़रिए करीब 600 गांवों तक पहुँच बनी। उनका ज़ोर इस बात पर रहा कि संरचनाओं के निर्माण के साथ-साथ ग्रामीण समुदाय में उनके संरक्षण और रखरखाव की ज़िम्मेदारी भी विकसित हो। उनका मानना है कि जब ग्रामीण योजना से लेकर श्रमदान और रखरखाव तक सहभागी बनते हैं, तभी जल संरक्षण का काम स्थायी रूप लेता है।

सरकारी योजनाओं, नाबार्ड, पंचायतों, तकनीकी संस्थानों और गैर-सरकारी संगठनों को एक साझा जल-दृष्टि से जोड़ना उनके काम की विशेषता रही है। वे ग्राम पंचायतों को जल सुरक्षा की स्थानीय इकाई के रूप में मज़बूत करने और मनरेगा जैसी योजनाओं को जल संरक्षण से जोड़ने की वकालत करते हैं।

परंपरा और आधुनिक विज्ञान का समन्वय

जायसवाल पूर्वी भारत की आहर-पईन जैसी पारंपरिक जल प्रणालियों को हाइड्रोलॉजी, रिमोट सेंसिंग, भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS), मौसम के आँकड़ों, मृदा परीक्षण और सूक्ष्म सिंचाई जैसी आधुनिक तकनीकों से जोड़ने की ज़रूरत पर ज़ोर देते हैं। बदलती जलवायु के बीच वे जल संचयन से आगे बढ़कर 'जल बजट' को गांवों की विकास योजना का हिस्सा बनाने की वकालत करते हैं — यानी गांव को यह पता होना चाहिए कि उसके पास कितना पानी उपलब्ध है और कौन-सी फसल को कितने पानी की ज़रूरत है।

गौरतलब है कि बांका के उल्ही नाला जलग्रहण क्षेत्र और मुंगेर, जमुई समेत अन्य इलाकों में किए गए उनके कार्य इस बात की मिसाल हैं कि स्थानीय भूगोल और जल-विज्ञान के अनुसार समाधान तैयार करना क्यों ज़रूरी है — एक जैसी योजना हर जगह कारगर नहीं हो सकती।

नदी पुनर्जीवन और सामाजिक सम्मान

नदी पुनर्जीवन के संदर्भ में जायसवाल का मानना है कि स्वस्थ नदी के लिए स्वस्थ जलग्रहण क्षेत्र अनिवार्य है। अतुल्य गंगा जैसे प्रयासों से जुड़कर उन्होंने जलग्रहण, भूजल और नदी को एक ही जल-चक्र का हिस्सा मानने की आवश्यकता पर बल दिया है। मुंगेर के पोलो मैदान में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान प्रभारी मंत्री संजय कुमार द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया, जिसे वे जल संरक्षण के प्रति बढ़ती सामाजिक स्वीकृति के रूप में देखते हैं।

संदेश और आगे की राह

जायसवाल का संदेश स्पष्ट है — एक बूँद पानी बचाना सिर्फ पानी बचाना नहीं है, बल्कि मिट्टी, फसल, किसान और गांव के भविष्य को सुरक्षित करना है। फसल विविधीकरण, बागवानी, मृदा स्वास्थ्य और संतुलित सिंचाई को भी वे जल सुरक्षा से जोड़कर देखते हैं। उनकी पूरी यात्रा का सार यही है कि जल संरक्षण संरचनाएँ बनाने से आगे बढ़कर सामुदायिक स्वामित्व, वैज्ञानिक सोच और टिकाऊ जीवन-पद्धति विकसित करना ही असली लक्ष्य है — और यही बिहार के गांवों की तस्वीर बदलने की कुंजी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

ये दो अलग-अलग काम हैं। बिहार में मनरेगा के तहत हज़ारों तालाब और चेक डैम बने, लेकिन रखरखाव के अभाव में उनमें से कई बेकार पड़े हैं। जायसवाल का 'सहभागी स्वामित्व' मॉडल इस खाई को पाटने की कोशिश है, और राष्ट्रीय जल पुरस्कार इसकी सरकारी स्वीकृति है। असली परीक्षा यह है कि क्या राज्य सरकार इस मॉडल को नीतिगत ढाँचे में शामिल करती है, या यह एक व्यक्ति की उपलब्धि बनकर रह जाती है।
RashtraPress
18 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

किशोर जायसवाल कौन हैं और उन्हें राष्ट्रीय जल पुरस्कार क्यों मिला?
किशोर जायसवाल मुंगेर, बिहार के जल संरक्षण कार्यकर्ता हैं जो पिछले तीन दशकों से ग्रामीण जलग्रहण विकास में सक्रिय हैं। वर्ष 2025 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें राष्ट्रीय जल पुरस्कार से सम्मानित किया, जो 105 से अधिक परियोजनाओं के ज़रिए 600 गांवों में जल संरक्षण के उनके योगदान की मान्यता है।
सोसायटी फॉर वाटरशेड एंड रूरल डेवलपमेंट क्या काम करती है?
यह संस्था किशोर जायसवाल के नेतृत्व में बिहार में जलग्रहण विकास, भूजल पुनर्भरण और टिकाऊ कृषि पर काम करती है। इसने नाबार्ड, ग्राम पंचायतों, सरकारी योजनाओं और गैर-सरकारी संगठनों को एक साझा जल-दृष्टि से जोड़ा है।
बिहार में आहर-पईन प्रणाली क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?
आहर-पईन पूर्वी भारत, विशेषकर बिहार की पारंपरिक जल प्रबंधन प्रणाली है, जिसमें आहर (जलाशय) और पईन (नहर) के ज़रिए वर्षा जल का संचयन और वितरण होता है। जायसवाल इसे GIS, रिमोट सेंसिंग और सूक्ष्म सिंचाई जैसी आधुनिक तकनीकों से जोड़ने की वकालत करते हैं ताकि इसकी उपयोगिता और बढ़े।
'जल बजट' की अवधारणा क्या है और गांवों के लिए यह कैसे उपयोगी है?
'जल बजट' का अर्थ है कि प्रत्येक गांव यह जाने कि उसके पास कितना पानी उपलब्ध है और विभिन्न फसलों को कितने पानी की ज़रूरत है। जायसवाल इसे गांव की विकास योजना का अनिवार्य हिस्सा बनाने पर ज़ोर देते हैं, ताकि जल उपयोग वैज्ञानिक और टिकाऊ हो सके।
किशोर जायसवाल के काम का बिहार के किन इलाकों में असर दिखा है?
उनके प्रयासों का असर बांका के उल्ही नाला जलग्रहण क्षेत्र के अलावा मुंगेर और जमुई समेत कई इलाकों में दिखा है। 105 से अधिक जलग्रहण परियोजनाओं के ज़रिए करीब 600 गांवों तक पहुँच बनाई गई है।
राष्ट्र प्रेस
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