ब्रिक्स समिट: पूर्व राजनयिक सुधीर टी देवरे बोले — 'ग्लोबल साउथ की नई आवाज़ बना ब्रिक्स, 50% आबादी और 45% GDP का समूह'
सारांश
मुख्य बातें
पूर्व राजनयिक सुधीर टी देवरे ने 15 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में ब्रिक्स समिट को वैश्विक दक्षिण (Global South) के लिए एक ऐतिहासिक मंच करार दिया। उनके अनुसार, यह सम्मेलन उन देशों को एकजुट करने में सफल रहा जिन्हें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रायः उपेक्षित किया जाता है। देवरे ने स्पष्ट किया कि ब्रिक्स अब दुनिया की लगभग 50 फीसदी आबादी और 45 फीसदी वैश्विक GDP का प्रतिनिधित्व करने वाला एक सशक्त मंच बन चुका है।
ब्रिक्स: नई पहचान और विस्तारित दायरा
देवरे ने कहा कि ब्रिक्स अब केवल शुरुआती पाँच देशों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने बताया कि इन पाँच संस्थापक सदस्यों में 5-6 और देश जुड़ चुके हैं, और बड़ी संख्या में देश भागीदार या पूर्णकालिक सदस्य बनने की इच्छा रखते हैं। उनके अनुसार, चीन और रूस जैसी प्रमुख शक्तियों को छोड़कर शेष अधिकांश सदस्य वैश्विक दक्षिण के देश हैं, जिससे ब्रिक्स एक बड़े, नए गुटनिरपेक्ष समूह के भीतर एक प्रभावशाली उपसमूह के रूप में उभर रहा है।
उन्होंने इसे 'नया गुटनिरपेक्ष आंदोलन' की संज्ञा देते हुए कहा कि बड़ा गुटनिरपेक्ष समूह तो जारी है, लेकिन उसके भीतर यह छोटा समूह कहीं अधिक प्रभावी और मुखर होगा।
पश्चिम-विरोधी नहीं, स्वहित-केंद्रित
पूर्व राजनयिक देवरे ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी नहीं समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह समूह किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि अपने सदस्य देशों के हितों और मुद्दों को सहकारी ढंग से आगे रखने के लिए खड़ा है। इस समिट में शांति और संवाद का स्वर प्रमुख रहा और किसी भी प्रकार का टकराव सामने नहीं आया — जिसे देवरे ने ब्रिक्स की सबसे बड़ी उपलब्धि बताया।
ICWA की भूमिका और भारत की विदेश नीति
देवरे ने इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स (ICWA) की भूमिका की भी सराहना की। उनके अनुसार, ICWA एक राष्ट्रीय संस्थान के रूप में विश्वविद्यालयों, अकादमिक निकायों और विशेषज्ञ व्यक्तियों को एक मंच पर लाता है और भारत की विदेश नीति पर खुली बहस और विचार-विमर्श को बढ़ावा देता है। उन्होंने कहा, 'भारत की अपनी प्राथमिकताएँ और नई चुनौतियाँ हैं, इसलिए भारत की विदेश नीति में लगातार विकास हुआ है — और यह ICWA के योगदान में साफ़ झलकता है।'
पूर्व राजदूत महेश सचदेव का नज़रिया
नाइजीरिया में भारत के पूर्व हाई कमिश्नर और अल्जीरिया तथा नॉर्वे में भारत के पूर्व राजदूत महेश सचदेव (IFS, सेवानिवृत्त) ने बताया कि इस समिट में चार अफ्रीकी देशों के प्रमुख विशेष रूप से आए। उन्होंने स्पष्ट किया: 'ब्रिक्स में इजिप्ट, इथियोपिया और साउथ अफ्रीका पहले ही सदस्य बन चुके हैं और इन तीनों के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री भारत आए। चौथे देश बुरुंडी के राष्ट्रपति को अफ्रीकी यूनियन के चेयरमैन के रूप में आमंत्रित किया गया था।' सचदेव के अनुसार, इन चारों देशों के राष्ट्र प्रमुखों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से द्विपक्षीय वार्ता की।
आगे की दिशा
विशेषज्ञों के अनुसार, ब्रिक्स का यह विस्तार आने वाले वर्षों में वैश्विक शासन की संरचना को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है। यह ऐसे समय में हो रहा है जब पश्चिमी नेतृत्व वाले अंतरराष्ट्रीय संस्थानों की प्रासंगिकता पर दुनिया भर में बहस छिड़ी हुई है। सहकारी बहुध्रुवीयता की यह नींव भविष्य में व्यापार, कूटनीति और विकास की नई इबारत लिखेगी।