16 सितंबर 2026
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ब्रिक्स समिट: पूर्व राजनयिक सुधीर टी देवरे बोले — 'ग्लोबल साउथ की नई आवाज़ बना ब्रिक्स, 50% आबादी और 45% GDP का समूह'

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ब्रिक्स समिट: पूर्व राजनयिक सुधीर टी देवरे बोले — 'ग्लोबल साउथ की नई आवाज़ बना ब्रिक्स, 50% आबादी और 45% GDP का समूह'

सारांश

पूर्व राजनयिक सुधीर टी देवरे का मानना है कि ब्रिक्स अब महज़ एक आर्थिक जोड़बंदी नहीं — यह वैश्विक दक्षिण की सामूहिक आवाज़ है। दुनिया की 50% आबादी और 45% GDP के साथ, यह समूह बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की नई धुरी बन रहा है, जो पश्चिम का विरोध नहीं, बल्कि अपने हितों का पक्षधर है।

मुख्य बातें

पूर्व राजनयिक सुधीर टी देवरे ने 15 सितंबर 2026 को ब्रिक्स समिट को ग्लोबल साउथ के लिए ऐतिहासिक मंच करार दिया।
ब्रिक्स अब दुनिया की लगभग 50 फीसदी आबादी और 45 फीसदी वैश्विक GDP का प्रतिनिधित्व करता है।
शुरुआती 5 देशों में 5-6 और देश जुड़ चुके हैं ; अनेक देश भागीदार या सदस्य बनने के इच्छुक हैं।
पूर्व राजदूत महेश सचदेव के अनुसार, इजिप्ट, इथियोपिया, साउथ अफ्रीका और बुरुंडी के राष्ट्र प्रमुखों ने PM मोदी से वार्ता की।
देवरे ने स्पष्ट किया कि ब्रिक्स पश्चिम-विरोधी नहीं, बल्कि सदस्य देशों के स्वहित और सहकारी संवाद पर आधारित समूह है।

पूर्व राजनयिक सुधीर टी देवरे ने 15 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में ब्रिक्स समिट को वैश्विक दक्षिण (Global South) के लिए एक ऐतिहासिक मंच करार दिया। उनके अनुसार, यह सम्मेलन उन देशों को एकजुट करने में सफल रहा जिन्हें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रायः उपेक्षित किया जाता है। देवरे ने स्पष्ट किया कि ब्रिक्स अब दुनिया की लगभग 50 फीसदी आबादी और 45 फीसदी वैश्विक GDP का प्रतिनिधित्व करने वाला एक सशक्त मंच बन चुका है।

ब्रिक्स: नई पहचान और विस्तारित दायरा

देवरे ने कहा कि ब्रिक्स अब केवल शुरुआती पाँच देशों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने बताया कि इन पाँच संस्थापक सदस्यों में 5-6 और देश जुड़ चुके हैं, और बड़ी संख्या में देश भागीदार या पूर्णकालिक सदस्य बनने की इच्छा रखते हैं। उनके अनुसार, चीन और रूस जैसी प्रमुख शक्तियों को छोड़कर शेष अधिकांश सदस्य वैश्विक दक्षिण के देश हैं, जिससे ब्रिक्स एक बड़े, नए गुटनिरपेक्ष समूह के भीतर एक प्रभावशाली उपसमूह के रूप में उभर रहा है।

उन्होंने इसे 'नया गुटनिरपेक्ष आंदोलन' की संज्ञा देते हुए कहा कि बड़ा गुटनिरपेक्ष समूह तो जारी है, लेकिन उसके भीतर यह छोटा समूह कहीं अधिक प्रभावी और मुखर होगा।

पश्चिम-विरोधी नहीं, स्वहित-केंद्रित

पूर्व राजनयिक देवरे ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी नहीं समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह समूह किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि अपने सदस्य देशों के हितों और मुद्दों को सहकारी ढंग से आगे रखने के लिए खड़ा है। इस समिट में शांति और संवाद का स्वर प्रमुख रहा और किसी भी प्रकार का टकराव सामने नहीं आया — जिसे देवरे ने ब्रिक्स की सबसे बड़ी उपलब्धि बताया।

ICWA की भूमिका और भारत की विदेश नीति

देवरे ने इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स (ICWA) की भूमिका की भी सराहना की। उनके अनुसार, ICWA एक राष्ट्रीय संस्थान के रूप में विश्वविद्यालयों, अकादमिक निकायों और विशेषज्ञ व्यक्तियों को एक मंच पर लाता है और भारत की विदेश नीति पर खुली बहस और विचार-विमर्श को बढ़ावा देता है। उन्होंने कहा, 'भारत की अपनी प्राथमिकताएँ और नई चुनौतियाँ हैं, इसलिए भारत की विदेश नीति में लगातार विकास हुआ है — और यह ICWA के योगदान में साफ़ झलकता है।'

पूर्व राजदूत महेश सचदेव का नज़रिया

नाइजीरिया में भारत के पूर्व हाई कमिश्नर और अल्जीरिया तथा नॉर्वे में भारत के पूर्व राजदूत महेश सचदेव (IFS, सेवानिवृत्त) ने बताया कि इस समिट में चार अफ्रीकी देशों के प्रमुख विशेष रूप से आए। उन्होंने स्पष्ट किया: 'ब्रिक्स में इजिप्ट, इथियोपिया और साउथ अफ्रीका पहले ही सदस्य बन चुके हैं और इन तीनों के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री भारत आए। चौथे देश बुरुंडी के राष्ट्रपति को अफ्रीकी यूनियन के चेयरमैन के रूप में आमंत्रित किया गया था।' सचदेव के अनुसार, इन चारों देशों के राष्ट्र प्रमुखों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से द्विपक्षीय वार्ता की।

आगे की दिशा

विशेषज्ञों के अनुसार, ब्रिक्स का यह विस्तार आने वाले वर्षों में वैश्विक शासन की संरचना को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है। यह ऐसे समय में हो रहा है जब पश्चिमी नेतृत्व वाले अंतरराष्ट्रीय संस्थानों की प्रासंगिकता पर दुनिया भर में बहस छिड़ी हुई है। सहकारी बहुध्रुवीयता की यह नींव भविष्य में व्यापार, कूटनीति और विकास की नई इबारत लिखेगी।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ब्रिक्स समिट 2026 में ग्लोबल साउथ को क्या मिला?
पूर्व राजनयिक सुधीर टी देवरे के अनुसार, ब्रिक्स समिट 2026 ने उन देशों को एक साझा मंच दिया जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रायः आवाज़ नहीं मिलती। इस समूह के पास अब दुनिया की लगभग 50 फीसदी आबादी और 45 फीसदी वैश्विक GDP है।
ब्रिक्स में अब कौन-कौन से नए देश शामिल हुए हैं?
पूर्व राजदूत महेश सचदेव के अनुसार, इजिप्ट, इथियोपिया और साउथ अफ्रीका पहले ही ब्रिक्स के सदस्य बन चुके हैं। इसके अलावा बुरुंडी के राष्ट्रपति को अफ्रीकी यूनियन के चेयरमैन के रूप में समिट में आमंत्रित किया गया था।
क्या ब्रिक्स पश्चिमी देशों के खिलाफ है?
नहीं। पूर्व राजनयिक सुधीर टी देवरे ने स्पष्ट किया कि ब्रिक्स पश्चिम-विरोधी नहीं है। यह समूह अपने सदस्य देशों के हितों और मुद्दों को सहकारी तरीके से आगे रखने के लिए गठित है, और इस समिट में शांति व संवाद का स्वर प्रमुख रहा।
ICWA का भारत की विदेश नीति में क्या योगदान है?
देवरे के अनुसार, इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स (ICWA) एक राष्ट्रीय संस्थान के रूप में विश्वविद्यालयों, अकादमिक निकायों और विशेषज्ञों को एकजुट करता है। यह भारत की विदेश नीति पर खुली बहस और नए विचारों का मंच प्रदान करता है और बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप नीति-निर्माण में सहायक रहा है।
ब्रिक्स का विस्तार भविष्य में किस दिशा में जाएगा?
देवरे के अनुसार, बड़ी संख्या में देश ब्रिक्स के भागीदार या पूर्णकालिक सदस्य बनना चाहते हैं और इनमें अधिकांश वैश्विक दक्षिण के देश होंगे। इससे ब्रिक्स एक विस्तृत, प्रभावशाली बहुध्रुवीय मंच के रूप में उभरेगा जो आने वाले वर्षों में वैश्विक शासन को नए सिरे से आकार दे सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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