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मायावती ने 2027 के लिए ओबीसी रणनीति की धार तेज की, 2007 वाला दलित-पिछड़ा गठजोड़ पुनर्जीवित करने का मंत्र

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मायावती ने 2027 के लिए ओबीसी रणनीति की धार तेज की, 2007 वाला दलित-पिछड़ा गठजोड़ पुनर्जीवित करने का मंत्र

सारांश

2022 में महज एक सीट पर सिमटी बसपा अब 2007 के उस सामाजिक समीकरण को दोहराने की कोशिश में है जिसने मायावती को पूर्ण बहुमत दिलाया था। ओबीसी बैठक इस मिशन की पहली औपचारिक कड़ी है — और यह संकेत देती है कि 2027 की लड़ाई जाति-समीकरण के मैदान पर ही तय होगी।

मुख्य बातें

बसपा प्रमुख मायावती ने 16 जून को लखनऊ में ओबीसी समीक्षा बैठक आयोजित कर 2027 UP विधानसभा चुनाव की तैयारियों का आगाज़ किया।
मायावती ने 2007 के दलित-ओबीसी सामाजिक गठजोड़ को पुनर्जीवित करने का मंत्र दिया, जिसने उस वर्ष बसपा को पूर्ण बहुमत दिलाया था।
कार्यकर्ताओं को निर्देश — गाँव-कस्बों में जाकर पिछड़े वर्ग से सीधा संवाद करें और सामाजिक न्याय एजेंडे से जोड़ें।
BJP , SP और कांग्रेस भी ओबीसी वर्ग को साधने में जुटी हैं, जिससे 2027 में ओबीसी वोट निर्णायक भूमिका में होगा।
2022 के चुनाव में बसपा को केवल एक सीट मिली थी — यह बैठक उस गिरावट को पलटने की रणनीति का हिस्सा है।

बहुजन समाज पार्टी (BSP) प्रमुख मायावती ने मंगलवार, 16 जून को लखनऊ में आयोजित ओबीसी समीक्षा बैठक में पार्टी कार्यकर्ताओं को स्पष्ट निर्देश दिए कि 2027 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पिछड़ा वर्ग बसपा की चुनावी रणनीति का केंद्रबिंदु होगा। उन्होंने 2007 के उस सामाजिक समीकरण को फिर से सक्रिय करने का आह्वान किया, जिसने बसपा को उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार दिलाई थी।

बैठक में क्या हुआ

मायावती ने पार्टी पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के साथ ओबीसी समाज के बीच संगठन की मौजूदा स्थिति, जनाधार विस्तार और चुनावी तैयारियों की विस्तृत समीक्षा की। उन्होंने कहा कि 2007 में उत्तर प्रदेश में बसपा की पूर्ण बहुमत सरकार बनाने में ओबीसी समाज की निर्णायक भूमिका रही थी और पार्टी को उसी सामाजिक विश्वास को फिर से अर्जित करना होगा।

उन्होंने कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे गाँवों और कस्बों में जाकर पिछड़े वर्ग के लोगों से सीधा संवाद स्थापित करें और उन्हें बसपा के सामाजिक न्याय के एजेंडे से जोड़ें।

मायावती का दावा — ओबीसी हितों की असली रक्षक बसपा

बैठक में मायावती ने दावा किया कि ओबीसी समाज के वास्तविक हितों की रक्षा केवल बसपा सरकार में ही सुनिश्चित हुई है, जबकि अन्य दलों ने उन्हें केवल चुनावी राजनीति तक सीमित रखा। उन्होंने कहा कि बसपा ने अपने शासनकाल में दलितों और पिछड़े वर्गों को सामाजिक सम्मान, राजनीतिक भागीदारी और आर्थिक विकास से जोड़ने का काम किया।

आरक्षण और सामाजिक न्याय के मुद्दों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पार्टी ने हमेशा संविधान की मूल भावना के अनुरूप वंचित वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष किया है।

ओबीसी वोट पर सभी दलों की नज़र

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में ओबीसी वर्ग एक बार फिर निर्णायक भूमिका में उभर रहा है। भारतीय जनता पार्टी (BJP), समाजवादी पार्टी (SP) और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) — तीनों इस वर्ग को अपने पक्ष में करने की कोशिशों में जुटी हैं। ऐसे में बसपा का अपने पारंपरिक दलित-ओबीसी गठजोड़ को पुनर्जीवित करने का प्रयास सीधे इन दलों की रणनीति को चुनौती देता है।

गौरतलब है कि 2012 और 2017 के विधानसभा चुनावों में बसपा का यही गठजोड़ बिखर गया था, जिसके बाद पार्टी का जनाधार लगातार सिकुड़ता रहा। 2022 के चुनाव में बसपा को केवल एक सीट मिली थी, जो उसके इतिहास का सबसे खराब प्रदर्शन था।

मिशन-2027 का रोडमैप

यह बैठक मिशन-2027 की दिशा में बसपा के चुनावी रोडमैप का महत्वपूर्ण संकेत मानी जा रही है। पार्टी की रणनीति जमीनी स्तर पर सीधे संवाद और सामाजिक समीकरण की पुनर्स्थापना पर टिकी है। आने वाले महीनों में बसपा के इसी तर्ज पर अन्य वर्गों की समीक्षा बैठकें आयोजित होने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

क्योंकि पिछले डेढ़ दशक में ओबीसी राजनीति का ध्रुवीकरण BJP और SP के इर्द-गिर्द हो चुका है। मायावती की इस बैठक में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पार्टी के पास वह संगठनात्मक ढाँचा और स्थानीय नेतृत्व बचा है जो जमीनी स्तर पर इस गठजोड़ को वास्तविकता में बदल सके। आलोचकों का कहना है कि बसपा की घोषणाएँ अब तक बैठकों तक सीमित रही हैं और ज़मीन पर उनका असर नगण्य रहा है। बिना नए चेहरों, ओबीसी उपजातियों की सटीक पहचान और गठबंधन की संभावना तलाशे, यह रणनीति 2007 की पुनरावृत्ति कम और एक चुनावी आशावाद अधिक लगती है।
RashtraPress
11 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मायावती की ओबीसी समीक्षा बैठक में क्या हुआ?
16 जून को लखनऊ में आयोजित इस बैठक में बसपा प्रमुख मायावती ने पार्टी पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को 2027 विधानसभा चुनाव के लिए ओबीसी समाज के बीच जनाधार विस्तार और संगठन मजबूती के निर्देश दिए। उन्होंने 2007 जैसे दलित-ओबीसी सामाजिक गठजोड़ को पुनर्जीवित करने पर जोर दिया।
बसपा 2007 के सामाजिक समीकरण को क्यों दोहराना चाहती है?
2007 में दलित-ओबीसी गठजोड़ के बल पर बसपा ने उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। 2022 में पार्टी को केवल एक सीट मिली, इसलिए मायावती उसी सफल फॉर्मूले को आधार बनाकर 2027 में वापसी की कोशिश कर रही हैं।
2027 UP चुनाव में ओबीसी वोट इतना अहम क्यों है?
उत्तर प्रदेश की आबादी में ओबीसी वर्ग की हिस्सेदारी बड़ी है और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह वर्ग अक्सर चुनाव का रुख तय करता है। BJP, SP और कांग्रेस — तीनों इस वर्ग को साधने में जुटी हैं, जिससे ओबीसी वोट 2027 की निर्णायक कड़ी बन गया है।
बसपा के कार्यकर्ताओं को मायावती ने क्या निर्देश दिए?
मायावती ने कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे गाँवों और कस्बों में जाकर पिछड़े वर्ग के लोगों से सीधा संवाद करें और उन्हें बसपा की नीतियों तथा सामाजिक न्याय के एजेंडे से जोड़ें। उन्होंने दावा किया कि ओबीसी के वास्तविक हितों की रक्षा केवल बसपा सरकार में हुई है।
2022 के चुनाव में बसपा का प्रदर्शन कैसा रहा था?
2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा को केवल एक सीट मिली थी, जो पार्टी के इतिहास का सबसे कमज़ोर प्रदर्शन था। इसी पृष्ठभूमि में मायावती की यह ओबीसी बैठक और मिशन-2027 की रणनीति महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
राष्ट्र प्रेस
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