दादरा और नगर हवेली: 1947 के बाद भी पुर्तगाली कब्जे में रहा, 1961 में बना भारत का हिस्सा
सारांश
मुख्य बातें
दादरा और नगर हवेली भारत की आजादी के 14 साल बाद तक पुर्तगाली शासन की जकड़ में रहा — 2 अगस्त 1954 को स्थानीय संघर्ष से मुक्त हुआ और 11 अगस्त 1961 को संसद के एक अधिनियम द्वारा औपचारिक रूप से भारतीय संघ में शामिल किया गया। इस बीच सात वर्षों तक यहाँ की जनता ने वरिष्ठ पंचायत के माध्यम से स्वशासन चलाया — भारतीय इतिहास का एक विरल और प्रेरणादायक अध्याय।
18वीं सदी से पुर्तगाली कब्जा
18वीं शताब्दी से ही दादरा और नगर हवेली पर पुर्तगालियों का नियंत्रण था। 1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब भी पुर्तगाल ने इस भू-भाग को छोड़ने से इनकार कर दिया। उस समय भारत सरकार ने सीधी सैन्य कार्रवाई का रास्ता नहीं चुना, बल्कि स्थानीय सैन्य संगठनों और आंदोलनकारियों के माध्यम से दबाव बनाने की रणनीति अपनाई।
मुक्ति संग्राम और 1954 की आजादी
22 जुलाई 1954 को आजाद गोवा आंदोलन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), आजाद गोमंतक दल और स्थानीय आदिवासियों ने संयुक्त रूप से पुर्तगाली सत्ता को दादरा और नगर हवेली से उखाड़ फेंका। इसके दस दिन बाद, 2 अगस्त 1954 को इस क्षेत्र को आधिकारिक रूप से पुर्तगाली शासन से मुक्त घोषित किया गया। यह ऐसे समय में आया जब गोवा अभी भी पुर्तगाली अधिकार में था, जो 1961 तक जारी रहा।
वरिष्ठ पंचायत का स्वशासन
मुक्ति के बाद 1954 से 1961 तक यहाँ की जनता ने वरिष्ठ पंचायत के नाम से जाने जाने वाले स्थानीय प्रशासनिक ढाँचे के अंतर्गत स्वशासन चलाया। यह प्रयोग दर्शाता है कि बिना किसी केंद्रीय सरकारी ढाँचे के भी एक समुदाय अपनी शासन व्यवस्था स्थापित कर सकता है। 11 अगस्त 1961 को संसद में दादरा और नगर हवेली अधिनियम, 1961 पारित किया गया, जिसके तहत यह क्षेत्र भारत का केंद्र शासित प्रदेश बन गया।
संग्राम में महिलाओं की भूमिका
इस मुक्ति संग्राम में दो महिलाओं की भूमिका उल्लेखनीय रही। हेमवतीबाई नाटेकर का सिलवासा के निकट भारतीय सीमा में एक सेवाश्रम था, जो क्रांतिकारियों के लिए आश्रय स्थल बना। उन्होंने वाकणकर, काजरेकर और नरवणे को पूर्व तैयारी के लिए हर प्रकार की सहायता दी — जानते हुए कि इसमें उनके लिए गंभीर खतरा है।
दूसरी प्रमुख महिला थीं ललिता फड़के, जो सुधीर फड़के की पत्नी थीं। उन्होंने संग्राम के दौरान महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ एकत्र कर अपने सहयोगियों तक पहुँचाईं और अपने पति के साथ कठिन परिस्थितियों में लगातार संघर्ष किया।
ऐतिहासिक महत्त्व
गौरतलब है कि दादरा और नगर हवेली की मुक्ति भारत के उन दुर्लभ उदाहरणों में से एक है जहाँ केंद्र सरकार की प्रत्यक्ष सैन्य भागीदारी के बिना, जन-आंदोलन और स्थानीय संगठनों के दम पर औपनिवेशिक शक्ति को पराजित किया गया। 2020 में दादरा और नगर हवेली को दमण और दीव के साथ विलय कर एकल केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया, जो इस क्षेत्र के प्रशासनिक इतिहास का नवीनतम अध्याय है।