धरती आबा बिरसा मुंडा: तीर-कमान से अंग्रेजी साम्राज्य को हिला देने वाला उलगुलान
सारांश
मुख्य बातें
बिरसा मुंडा — वह क्रांतिकारी नायक जिसने झारखंड के घने जंगलों से उठकर ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी — आज भी आदिवासी समाज में 'धरती आबा' यानी धरती के पिता के रूप में पूजनीय हैं। महज 25 वर्ष की आयु में 9 जून 1900 को रांची जेल में उनका निधन हुआ, लेकिन उनका 'उलगुलान' — अर्थात महाविद्रोह — भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक अमिट अध्याय बन गया। उनकी जयंती 15 नवंबर को अब जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाई जाती है।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
15 नवंबर 1875 को झारखंड के खूंटी जिले के उलिहातु गाँव में जन्मे बिरसा मुंडा का बचपन अत्यंत साधारण परिस्थितियों में बीता। सगे-संबंधियों के यहाँ भेड़-बकरियाँ चराना और बाँसुरी बजाना — यही उनके शुरुआती वर्षों की पहचान थी। उस दौर में उरांव, मुंडा और खड़िया आदिवासी समुदाय ब्रिटिश दासता की जंजीरों में जकड़े हुए थे।
ईस्ट इंडिया कंपनी ने आदिवासियों की जमीन, जंगल और आजीविका पर नियंत्रण के लिए जमींदार, जागीरदार, जंगल के ठेकेदार और दलालों की एक पूरी व्यवस्था खड़ी कर दी थी। वनवासी अपनी ही भूमि पर मालिक से नौकर बन चुका था। बेबसी, भूख, अंधविश्वास और दमन — यही उस युग की सच्चाई थी।
वैचारिक जागृति और ज्ञान-साधना
बिरसा मुंडा कुछ समय के लिए चाईबासा के एक जर्मन मिशनरी स्कूल में पढ़ने गए, लेकिन वहाँ आदिवासी संस्कृति का उपहास उन्हें स्वीकार्य नहीं था। विरोध करने पर उन्हें स्कूल से निष्कासित कर दिया गया। इसी कालखंड में उनकी भेंट स्वामी आनंद पांडे से हुई, जो एक स्थानीय जमींदार के मुंशी थे। आनंद पांडे की संगति में बिरसा मुंडा ने भारतीय धर्मग्रंथों, दर्शन और महाभारत के पात्रों से परिचय पाया।
उन्होंने आयुर्वेदिक ज्ञान भी अर्जित किया — वनों में घूमकर जड़ी-बूटियाँ एकत्र करते, उनके औषधीय गुणों की खोज करते और गंभीर रोगों का उपचार करते। कहा जाता है कि उनकी असाधारण बौद्धिक क्षमता और परिश्रम से वे बड़ी-से-बड़ी पुरानी बीमारियों को ठीक करने में सक्षम हो गए थे। 1895 में कुछ ऐसी घटनाएँ घटीं जिनके कारण लोग उन्हें भगवान का अवतार मानने लगे।
उलगुलान — महाविद्रोह की शुरुआत
स्वतंत्रता संग्राम के लिए सशस्त्र क्रांति की अलख जगाने से पहले बिरसा मुंडा ने आदिवासी समाज में वैचारिक एकता स्थापित करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने उरांव, मुंडा और खड़िया समुदायों के मुखियाओं से संपर्क साधा और आपसी फूट को दूर करने का प्रयास किया। 1898 में डोंबारी बुरु की पहाड़ियों पर एक विशाल सभा आयोजित हुई, जहाँ ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार करने की कोशिश की, किंतु ग्रामीणों की सहायता से वे बच निकले।
24 दिसंबर 1899 को बिरसा मुंडा के नेतृत्व में ब्रिटिश पुलिस थानों पर तीरों से हमला किया गया और उनमें आग लगा दी गई। सेना से सीधी मुठभेड़ भी हुई, परंतु तीर-कमान गोलियों का सामना नहीं कर सके। यह 'उलगुलान' — धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक तीनों स्तरों पर एक साथ लड़ी गई लड़ाई थी।
डोंबारी बुरु नरसंहार — झारखंड का जलियाँवाला बाग
9 जनवरी 1900 को डोंबारी बुरु पहाड़ी पर बिरसा मुंडा के नेतृत्व में एकत्रित हजारों आदिवासियों पर ब्रिटिश सैनिकों ने अंधाधुंध गोलीबारी की। इस भीषण नरसंहार में सैकड़ों लोग शहीद हुए। इतिहासकार इस घटना को 'झारखंड का जलियाँवाला बाग' कहते हैं। ब्रिटिश सेना ने सभा की सूचना पाकर पहाड़ी को चारों ओर से घेरकर अचानक हमला बोला था।
बिरसा मुंडा उस घेरे से बच निकलने में सफल रहे, लेकिन कुछ समय बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 9 जून 1900 को रांची जेल में उनका निधन हो गया। कहा जाता है कि जेल में उन्हें विष दिया गया था, हालाँकि इसकी आधिकारिक पुष्टि इतिहास के पन्नों में विवादित रही है।
विरासत और आज की प्रासंगिकता
बिरसा मुंडा की स्मृति आज भी झारखंड सहित समस्त आदिवासी बाहुल्य राज्यों में जीवंत है। उन्हें 'धरती आबा' के रूप में पूजा जाता है और उनकी जयंती 15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर मनाई जाती है। उनका उलगुलान यह संदेश देता है कि जब शोषित समाज अपनी पहचान और अधिकारों के लिए एकजुट होता है, तो बड़े-से-बड़े साम्राज्य भी डगमगा जाते हैं।