ईरान ने कुवैत का डिसैलिनेशन प्लांट बनाया निशाना, खाड़ी देशों की 'जल-जीवनरेखा' पर मंडराया संकट
सारांश
मुख्य बातें
पश्चिम एशिया में अमेरिका-ईरान संघर्ष एक नए और खतरनाक मोड़ पर पहुँच गया है — अब लड़ाई सैन्य ठिकानों से आगे बढ़कर उस बुनियादी ढाँचे तक जा पहुँची है जिस पर लाखों लोगों का जीवन टिका है। 19 जुलाई को उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अमेरिका ने लगातार आठ रातों तक ईरान के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया, जिसमें बोंजी डिसैलिनेशन (अलवणीकरण) प्लांट भी शामिल था। इसके जवाब में ईरान ने कुवैत के एक डिसैलिनेशन संयंत्र पर हमला किया, जिससे खाड़ी क्षेत्र में जल-सुरक्षा का संकट गहरा गया है।
हमलों का घटनाक्रम और तात्कालिक असर
ईरान के अनुसार, अमेरिकी हमले में बोंजी डिसैलिनेशन प्लांट को क्षति पहुँची, जिसके चलते 20 गाँवों के करीब 10,000 लोगों की पेयजल आपूर्ति बाधित हो गई। इसके प्रतिकार में ईरान ने कुवैत के जल संयंत्र को निशाना बनाया। कुवैत ने पुष्टि की कि यह हमला उसके जल-प्लांट पर हुआ और चेतावनी दी कि इस रेगिस्तानी देश में इससे जीवन के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है।
खाड़ी देशों के लिए डिसैलिनेशन प्लांट क्यों हैं अपरिहार्य
खाड़ी क्षेत्र दुनिया के सर्वाधिक जल-संकटग्रस्त इलाकों में आता है — यहाँ वर्षा अत्यंत कम और अनियमित है, और प्राकृतिक मीठे पानी के स्रोत नगण्य हैं। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से लेकर कुवैत तक, खाड़ी के तटों पर 400 से अधिक डिसैलिनेशन संयंत्र स्थापित हैं।
अरब सेंटर वॉशिंगटन डीसी द्वारा 2023 में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार, खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के छह सदस्य देश दुनिया की लगभग 60 प्रतिशत डिसैलिनेशन क्षमता रखते हैं और वैश्विक स्तर पर उत्पादित कुल शुद्ध जल का करीब 40 प्रतिशत तैयार करते हैं।
गल्फ रिसर्च सेंटर की 2020 की रिपोर्ट के अनुसार, भूजल और अलवणीकृत पानी मिलकर इस क्षेत्र की लगभग 90 प्रतिशत मुख्य जल आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। हाल के वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण भूजल की गुणवत्ता में गिरावट आई है, जिससे इन देशों की समुद्री जल-शोधन संयंत्रों पर निर्भरता और बढ़ी है।
देशवार निर्भरता: आँकड़े जो बताते हैं कितना बड़ा है खतरा
कुवैत अपनी पेयजल आवश्यकता का करीब 90 प्रतिशत डिसैलिनेशन संयंत्रों से प्राप्त करता है। ओमान में यह अनुपात लगभग 86 प्रतिशत, सऊदी अरब में 70 प्रतिशत और UAE में करीब 42 प्रतिशत है। सऊदी अरब दुनिया में सर्वाधिक अलवणीकृत पानी उत्पादन करने वाला देश है।
यह ऐसे समय में आया है जब पूरा खाड़ी क्षेत्र पहले से ही जलवायु दबाव झेल रहा है और किसी भी बड़े संयंत्र को क्षति लाखों नागरिकों की दैनिक जल आपूर्ति को सीधे प्रभावित कर सकती है।
ईरान की स्थिति: तुलनात्मक रूप से कम निर्भर
ईरान भी अलवणीकरण संयंत्रों का उपयोग करता है, जो खाड़ी क्षेत्र के तटीय इलाकों — जैसे किश्म द्वीप — में स्थापित हैं। हालाँकि, ईरान के पास अनेक नदियाँ और बाँध हैं, इसलिए वह GCC देशों की तुलना में इन संयंत्रों पर बहुत कम निर्भर है। गौरतलब है कि इसी असमानता के कारण डिसैलिनेशन संयंत्रों को निशाना बनाना ईरान के लिए एक असममित रणनीतिक विकल्प बन जाता है।
आगे क्या: संघर्ष विराम की संभावना और क्षेत्रीय जोखिम
रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका-ईरान के बीच संघर्ष विराम की संभावना प्रतिदिन कमज़ोर पड़ती जा रही है। यदि यह टकराव जारी रहा और डिसैलिनेशन संयंत्रों को निशाना बनाने का सिलसिला नहीं रुका, तो न केवल कुवैत बल्कि पूरे GCC क्षेत्र में मानवीय जल-संकट उत्पन्न होने का वास्तविक खतरा है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन नागरिक बुनियादी ढाँचे पर हमलों को युद्ध के नियमों का उल्लंघन मानते हैं — यह पहलू इस संघर्ष को एक नई कूटनीतिक जटिलता देता है।