जगन्नाथ पुरी: स्नान पूर्णिमा के बाद 15 दिन 'अनसर काल' में रहेंगे महाप्रभु, पट्टचित्र से होंगे दर्शन
सारांश
मुख्य बातें
पुरी के जगन्नाथ मंदिर में स्नान पूर्णिमा के अवसर पर महाप्रभु जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा को औपचारिक स्नान कराए जाने के बाद वे 15 दिनों के लिए 'अनसर घर' (विश्राम कक्ष) में चले जाते हैं, जिस दौरान श्रद्धालु मुख्य प्रतिमाओं के सीधे दर्शन नहीं कर पाते। इस परंपरागत 'अनसर काल' में मंदिर का रत्न सिंहासन रिक्त रहता है और भक्तों के लिए पारंपरिक पट्टचित्र — जिन्हें 'पटि देवता' कहा जाता है — स्थापित किए जाते हैं।
अनसर काल की परंपरा और धार्मिक मान्यता
मान्यता के अनुसार देव स्नान के पश्चात तीनों देवता अस्वस्थ हो जाते हैं और उन्हें विश्राम की आवश्यकता होती है। इस कारण गर्भगृह के द्वार बंद कर दिए जाते हैं और मंदिर के बाहर बंद दरवाजों के सामने पट्टचित्रों के माध्यम से पूजा-अर्चना की जाती है। इस अवधि में भगवान जगन्नाथ को श्री अनंत नारायण, भगवान बलभद्र को श्री अनंत वासुदेव और देवी सुभद्रा को भुवनेश्वरी के रूप में चित्रित किया जाता है। यह परंपरा भगवान जगन्नाथ की काष्ठ प्रतिमाओं की पूजा आरंभ होने के समय से ही चली आ रही है।
पट्टचित्र निर्माण में प्राकृतिक रंगों का उपयोग
इन पवित्र चित्रों के निर्माण में पूर्णतः प्राकृतिक स्रोतों से तैयार रंगों का उपयोग होता है। सफेद रंग समुद्री शंख के पाउडर से, काला रंग दीपक की कालिख या नारियल के रेशों को जलाने से प्राप्त कालिख से, लाल रंग प्राकृतिक खनिज हिंगुल (सिनाबार) से और पीला रंग हरिताल (ऑरपिमेंट) अथवा शुद्ध हल्दी से तैयार किया जाता है। हरा रंग विभिन्न औषधीय व हरी पत्तियों के रस से प्राप्त होता है। रंगों को कपड़े पर स्थायी रूप से टिकाए रखने के लिए कैथा (वुड एप्पल) के प्राकृतिक गोंद को बाइंडिंग एजेंट के रूप में प्रयोग किया जाता है।
कपड़े के कैनवास (पट्टी) को पेंटिंग से पहले इमली के बीज के पेस्ट और चॉक पाउडर के मिश्रण से कोट किया जाता है, ताकि सतह चिकनी और मजबूत बने और उस पर बारीक चित्रकारी संभव हो सके।
पीढ़ियों से चली आ रही पुश्तैनी सेवा
चित्रकार सेवायत श्रीधर महाराणा ने बताया कि अनसर पट्टी की सेवा उनके परिवार में पूर्वजों से चली आ रही है। उन्होंने कहा, 'हर साल पिता अपने पुत्रों को यह कला सिखाते हैं और यह परंपरा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होती रहती है।' उन्होंने स्पष्ट किया कि इस कार्य में कभी भी रासायनिक या सिंथेटिक रंगों का उपयोग नहीं किया जाता — सभी रंग पूर्णतः प्राकृतिक, पर्यावरण-अनुकूल और परंपरागत हैं।
महाराणा के अनुसार यह सेवा अत्यंत पवित्र और गोपनीय मानी जाती है। केवल वे परिवार जिनके पास पारंपरिक अनुमति है और जिन्हें मंदिर प्रशासन द्वारा आधिकारिक रूप से सेवक के रूप में मान्यता प्राप्त है, वही इस सेवा के अधिकारी हैं।
पट्टचित्र निर्माण की दिनचर्या
महाराणा ने बताया कि चित्र तैयार करने की प्रक्रिया प्रातः 5 बजे आरंभ होती है और सायं 5 बजे तक चलती है। चित्र पूर्ण होने के पश्चात प्रातः लगभग 3 बजे उनके घर पर इनकी विधिवत पूजा की जाती है, तत्पश्चात पट्टचित्रों को मंदिर ले जाकर स्थापित किया जाता है। अनसर अवधि समाप्त होने से एक दिन पूर्व 'पटि देवता' को विधिपूर्वक हटाया जाता है और इसके बाद भगवान जगन्नाथ तथा उनके भाई-बहन श्रद्धालुओं के सार्वजनिक दर्शन के लिए पुनः उपलब्ध होते हैं।
रथ यात्रा की तैयारियों का संदर्भ
गौरतलब है कि यह 'अनसर काल' प्रतिवर्ष रथ यात्रा से ठीक पहले आता है — दोनों परंपराएँ जगन्नाथ संस्कृति के वार्षिक पंचांग का अभिन्न अंग हैं। 29 जून 2025 को स्नान पूर्णिमा के साथ इस वर्ष की अनसर अवधि आरंभ हो रही है। श्रीधर महाराणा ने इस पुश्तैनी सेवा को अपने परिवार के लिए 'सौभाग्य और गर्व का विषय' बताया और कहा कि महाप्रभु की इस सेवा से उन्हें अपार संतोष और आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती है।