झारखंड के जंगलों में आग का संकट, हाथियों के निवास पर मंडरा रहा खतरा
सारांश
Key Takeaways
- झारखंड के जंगलों में आग लगने की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं।
- महुआ चुनने के दौरान लगाई गई आग बेकाबू हो रही है।
- आग की घटनाएं वन्यजीवों और स्थानीय निवासियों के लिए खतरा बन गई हैं।
- वन विभाग ने कड़ी कानूनी कार्रवाई का आश्वासन दिया है।
- आग बुझाने के लिए नई तकनीकों का सहारा लिया जा रहा है।
रांची, १६ मार्च (राष्ट्र प्रेस)। जैसे-जैसे गर्मी का मौसम आ रहा है, झारखंड के जंगलों में आग लगने की घटनाएं गंभीर रूप लेती जा रही हैं। बोकारो, गिरिडीह, हजारीबाग, चतरा, पश्चिमी सिंहभूम और लोहरदगा जैसे कई जिलों के वन क्षेत्रों में महुआ चुनने के दौरान लगाई गई आग अब बेकाबू होकर घने जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों तक फैल रही है।
इस स्थिति ने वन विभाग की चिंता को बढ़ा दिया है और वन पारिस्थितिकी पर गंभीर खतरा मंडराने लगा है। बोकारो जिले के गोमिया प्रखंड के लुगू बुरु के जंगलों में लगी आग ने वन विभाग की चिंताओं को और बढ़ा दिया है। यह क्षेत्र करीब ४० जंगली हाथियों का प्राकृतिक निवास स्थान माना जाता है। वन विभाग के डीएफओ संदीप शिंदे ने आशंका जताई है कि आग और धुएं के कारण हाथियों का झुंड रिहायशी इलाकों की ओर बढ़ सकता है, जिससे मानव-हाथी संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होने और जान-माल के नुकसान की संभावना भी बढ़ गई है।
विभाग ने स्पष्ट किया है कि जंगलों में आग लगाने वालों की पहचान कर वन अधिनियम के तहत कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी। गिरिडीह जिले के पीरटांड़ क्षेत्र और विश्व प्रसिद्ध पारसनाथ पहाड़ के सीतानाला जंगलों में भी आग की लपटें उठ रही हैं। स्थानीय ग्रामीणों और मकर संक्रांति मेला समिति के सदस्यों का कहना है कि हर साल महुआ चुनने के लिए सूखे पत्तों में आग लगाई जाती है, लेकिन इससे जंगलों में मौजूद बहुमूल्य जड़ी-बूटियां, दुर्लभ पेड़-पौधे और वन्यजीव बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं।
लोहरदगा जिले के किस्को प्रखंड के काशी टांड़ के जंगलों में स्थिति और भी भयावह बताई जा रही है। दिन में आसमान में धुएं का घना गुबार छाया रहता है, जबकि रात में जंगल की लपटें दूर से लाल दिखाई देती हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि वन विभाग के जागरूकता अभियानों के बावजूद आग बुझाने के ठोस इंतजाम अपर्याप्त हैं।
हजारीबाग, चतरा और लातेहार के जंगलों से भी आग लगने की लगातार खबरें आ रही हैं। आंकड़ों के अनुसार, हाल के वर्षों में झारखंड के वनों में आग लगने की घटनाओं में लगभग १६ प्रतिशत की वृद्धि हुई है। मार्च और अप्रैल के महीने इस दृष्टि से सबसे संवेदनशील माने जाते हैं।
एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष २००१ से २०२५ के बीच राज्य के १० प्रतिशत से अधिक वृक्ष वनाग्नि की चपेट में आ चुके हैं, जिनमें पश्चिम सिंहभूम का वन क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित रहा है। इस चुनौती से निपटने के लिए वन विभाग तकनीक और सामुदायिक भागीदारी का सहारा ले रहा है। ‘जीरो फायर’ लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए राज्यभर में करीब २८ हजार ग्रामीणों को “अग्नि योद्धा” के रूप में जोड़ा गया है, जिन्हें व्हाट्सएप समूहों के माध्यम से त्वरित सूचना तंत्र से जोड़ा गया है।
विभाग की योजना इस नेटवर्क का विस्तार करके इसे ५० हजार तक पहुंचाने की है। वनाग्नि पर शीघ्र नियंत्रण के लिए ड्रोन और उपग्रह आधारित अलर्ट सिस्टम का भी प्रयोग किया जा रहा है। जिला और क्षेत्र स्तर पर चौबीसों घंटे कार्यरत नियंत्रण कक्ष बनाए गए हैं और आम लोगों के लिए टोल-फ्री नंबर जारी करने की प्रक्रिया चल रही है।
इसके अलावा, जंगलों के भीतर १० से २० मीटर चौड़ी ‘फायर लाइनों’ को सक्रिय किया जा रहा है, ताकि आग को आगे फैलने से रोका जा सके। वन अधिकारियों ने ग्रामीणों से अपील की है कि वे महुआ चुनने के लिए आग का सहारा न लें और किसी भी आगजनी की सूचना तुरंत विभाग को दें, ताकि झारखंड की इस कीमती प्राकृतिक धरोहर को राख होने से बचाया जा सके।