झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 602 छंटनीग्रस्त जनगणना कर्मियों को 3 नवंबर 2004 से मिलेगी पेंशन
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड हाईकोर्ट ने 27 अगस्त को 602 छंटनीग्रस्त जनगणना कर्मचारियों के पक्ष में ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए राज्य सरकार को आदेश दिया कि इन कर्मियों की अर्हता सेवा की गणना 3 नवंबर 2004 से की जाए और उसी तिथि पर लागू नियमों के अनुसार पेंशन निर्धारित की जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक विलंब के कारण इन कर्मचारियों को पेंशन के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
संबंधित कर्मचारियों की नियुक्ति 1991-92 के दौरान गृह मंत्रालय के अधीन देवघर क्षेत्रीय जनगणना कार्यालय में संविदा आधार पर की गई थी। सितंबर 1992 में कार्यालय बंद होने पर उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। इसके बाद 3 नवंबर 2004 को झारखंड सरकार ने राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के तृतीय एवं चतुर्थ वर्ग के रिक्त पदों पर इन 602 कर्मियों को समायोजित करने का संकल्प जारी किया।
हालाँकि, सरकार द्वारा पोस्टिंग ऑर्डर जारी करने में 6 से 8 वर्षों की देरी हुई, जिसके कारण ये कर्मचारी 2010 से 2012 के बीच ही कार्यभार ग्रहण कर सके। सेवानिवृत्ति तक उनकी वास्तविक सेवा मात्र 7 से 8 वर्ष रही।
पेंशन से इनकार और कानूनी विवाद
झारखंड पेंशन नियमावली के नियम 145 के अनुसार पेंशन के लिए न्यूनतम 10 वर्ष की अर्हता सेवा अनिवार्य है। इसी आधार पर राज्य सरकार ने इन कर्मचारियों को पेंशन देने से इनकार कर दिया था। सरकार ने यह भी तर्क दिया कि 1991-92 की संविदा सेवा को पेंशन गणना में नहीं जोड़ा जा सकता — एक दलील जिसे खंडपीठ ने स्वीकार किया।
हाईकोर्ट का तर्क और संवैधानिक आधार
चीफ जस्टिस एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने पाया कि इसी श्रेणी के कई कर्मचारियों को 2007 में ही योगदान दे दिया गया था, जिससे वे 10 वर्ष की सेवा पूरी कर पेंशन के पात्र बन गए। इसके विपरीत, याचिकाकर्ताओं को बिना किसी व्यक्तिगत गलती के विलंबित पोस्टिंग मिली।
अदालत ने इस असमानता को संविधान के अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समानता) और अनुच्छेद 16 (लोक नियोजन में अवसर की समानता) का उल्लंघन करार दिया। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक विलंब के कारण समान वर्ग के कर्मचारियों के बीच भेदभाव नहीं किया जा सकता।
अदालत का निर्देश
खंडपीठ ने राज्य सरकार द्वारा दायर एलपीए (Letters Patent Appeal) का निष्पादन करते हुए एकल पीठ के पूर्व आदेश को आंशिक रूप से संशोधित किया। अदालत ने आदेश दिया कि इन कर्मचारियों की अर्हता सेवा की गणना 3 नवंबर 2004 से की जाए — वह तिथि जब राज्य सरकार ने समायोजन का संकल्प जारी किया था। इस गणना के आधार पर सभी प्रभावित कर्मचारी 10 वर्ष की अनिवार्य सेवा पूरी करते हैं और पेंशन के पात्र बनते हैं।
आगे की राह
यह निर्णय झारखंड में प्रशासनिक लापरवाही के शिकार सरकारी कर्मचारियों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित करता है। गौरतलब है कि यह मामला उन सैकड़ों कर्मियों की दशकों लंबी कानूनी लड़ाई का परिणाम है, जिन्होंने राज्य पुनर्गठन और नौकरशाही देरी की दोहरी मार झेली। अब राज्य सरकार को न्यायालय के निर्देशानुसार पेंशन निर्धारण की प्रक्रिया शुरू करनी होगी।