29 अगस्त 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 602 छंटनीग्रस्त जनगणना कर्मियों को 3 नवंबर 2004 से मिलेगी पेंशन

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 602 छंटनीग्रस्त जनगणना कर्मियों को 3 नवंबर 2004 से मिलेगी पेंशन

सारांश

दशकों की कानूनी लड़ाई के बाद झारखंड हाईकोर्ट ने 602 छंटनीग्रस्त जनगणना कर्मियों को राहत दी — अदालत ने माना कि सरकारी देरी की सज़ा कर्मचारियों को नहीं मिल सकती। 3 नवंबर 2004 से सेवा गणना का यह आदेश प्रशासनिक लापरवाही बनाम संवैधानिक समानता की बहस में एक निर्णायक मोड़ है।

मुख्य बातें

झारखंड हाईकोर्ट ने 27 अगस्त को 602 छंटनीग्रस्त जनगणना कर्मियों के पक्ष में फैसला सुनाया।
अर्हता सेवा की गणना 3 नवंबर 2004 से होगी — जब राज्य सरकार ने समायोजन का संकल्प जारी किया था।
पोस्टिंग ऑर्डर में 6 से 8 वर्षों की सरकारी देरी के कारण कर्मचारी 10 वर्ष की अनिवार्य सेवा पूरी नहीं कर पाए थे।
अदालत ने इस असमानता को संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन माना।
चीफ जस्टिस एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेश को आंशिक रूप से संशोधित कर पेंशन निर्धारण का निर्देश दिया।

झारखंड हाईकोर्ट ने 27 अगस्त को 602 छंटनीग्रस्त जनगणना कर्मचारियों के पक्ष में ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए राज्य सरकार को आदेश दिया कि इन कर्मियों की अर्हता सेवा की गणना 3 नवंबर 2004 से की जाए और उसी तिथि पर लागू नियमों के अनुसार पेंशन निर्धारित की जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक विलंब के कारण इन कर्मचारियों को पेंशन के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

संबंधित कर्मचारियों की नियुक्ति 1991-92 के दौरान गृह मंत्रालय के अधीन देवघर क्षेत्रीय जनगणना कार्यालय में संविदा आधार पर की गई थी। सितंबर 1992 में कार्यालय बंद होने पर उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। इसके बाद 3 नवंबर 2004 को झारखंड सरकार ने राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के तृतीय एवं चतुर्थ वर्ग के रिक्त पदों पर इन 602 कर्मियों को समायोजित करने का संकल्प जारी किया।

हालाँकि, सरकार द्वारा पोस्टिंग ऑर्डर जारी करने में 6 से 8 वर्षों की देरी हुई, जिसके कारण ये कर्मचारी 2010 से 2012 के बीच ही कार्यभार ग्रहण कर सके। सेवानिवृत्ति तक उनकी वास्तविक सेवा मात्र 7 से 8 वर्ष रही।

पेंशन से इनकार और कानूनी विवाद

झारखंड पेंशन नियमावली के नियम 145 के अनुसार पेंशन के लिए न्यूनतम 10 वर्ष की अर्हता सेवा अनिवार्य है। इसी आधार पर राज्य सरकार ने इन कर्मचारियों को पेंशन देने से इनकार कर दिया था। सरकार ने यह भी तर्क दिया कि 1991-92 की संविदा सेवा को पेंशन गणना में नहीं जोड़ा जा सकता — एक दलील जिसे खंडपीठ ने स्वीकार किया।

हाईकोर्ट का तर्क और संवैधानिक आधार

चीफ जस्टिस एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने पाया कि इसी श्रेणी के कई कर्मचारियों को 2007 में ही योगदान दे दिया गया था, जिससे वे 10 वर्ष की सेवा पूरी कर पेंशन के पात्र बन गए। इसके विपरीत, याचिकाकर्ताओं को बिना किसी व्यक्तिगत गलती के विलंबित पोस्टिंग मिली।

अदालत ने इस असमानता को संविधान के अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समानता) और अनुच्छेद 16 (लोक नियोजन में अवसर की समानता) का उल्लंघन करार दिया। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक विलंब के कारण समान वर्ग के कर्मचारियों के बीच भेदभाव नहीं किया जा सकता।

अदालत का निर्देश

खंडपीठ ने राज्य सरकार द्वारा दायर एलपीए (Letters Patent Appeal) का निष्पादन करते हुए एकल पीठ के पूर्व आदेश को आंशिक रूप से संशोधित किया। अदालत ने आदेश दिया कि इन कर्मचारियों की अर्हता सेवा की गणना 3 नवंबर 2004 से की जाए — वह तिथि जब राज्य सरकार ने समायोजन का संकल्प जारी किया था। इस गणना के आधार पर सभी प्रभावित कर्मचारी 10 वर्ष की अनिवार्य सेवा पूरी करते हैं और पेंशन के पात्र बनते हैं।

आगे की राह

यह निर्णय झारखंड में प्रशासनिक लापरवाही के शिकार सरकारी कर्मचारियों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित करता है। गौरतलब है कि यह मामला उन सैकड़ों कर्मियों की दशकों लंबी कानूनी लड़ाई का परिणाम है, जिन्होंने राज्य पुनर्गठन और नौकरशाही देरी की दोहरी मार झेली। अब राज्य सरकार को न्यायालय के निर्देशानुसार पेंशन निर्धारण की प्रक्रिया शुरू करनी होगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस व्यापक प्रशासनिक संस्कृति पर टिप्पणी है जहाँ सरकारी देरी की कीमत सबसे कमज़ोर कर्मचारी चुकाते हैं। झारखंड जैसे राज्य में, जहाँ 2000 में राज्य गठन के बाद नौकरशाही पुनर्गठन की प्रक्रिया वर्षों खिंची, ऐसे मामले अपवाद नहीं हैं। असली सवाल यह है कि जब 2007 में कुछ कर्मचारियों को समय पर पोस्टिंग दी जा सकती थी, तो बाकियों को क्यों नहीं — और इस भेदभाव के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होगी। अदालत ने न्याय दिया, लेकिन जवाबदेही का सवाल अभी भी अनुत्तरित है।
RashtraPress
29 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

झारखंड हाईकोर्ट ने जनगणना कर्मचारियों के पक्ष में क्या आदेश दिया?
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि 602 छंटनीग्रस्त जनगणना कर्मचारियों की अर्हता सेवा की गणना 3 नवंबर 2004 से की जाए और उसी तिथि पर लागू नियमों के अनुसार पेंशन निर्धारित की जाए। अदालत ने माना कि प्रशासनिक विलंब के कारण इन कर्मियों को पेंशन से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है।
इन जनगणना कर्मचारियों को पेंशन क्यों नहीं मिल रही थी?
झारखंड पेंशन नियमावली के नियम 145 के तहत पेंशन के लिए न्यूनतम 10 वर्ष की अर्हता सेवा अनिवार्य है। सरकार द्वारा पोस्टिंग ऑर्डर जारी करने में 6 से 8 वर्षों की देरी के कारण ये कर्मचारी 2010-2012 में ही कार्यभार ग्रहण कर सके और सेवानिवृत्ति तक केवल 7 से 8 वर्ष की सेवा पूरी हो पाई।
3 नवंबर 2004 की तारीख इस मामले में क्यों महत्वपूर्ण है?
3 नवंबर 2004 को झारखंड सरकार ने राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग में इन कर्मचारियों को समायोजित करने का आधिकारिक संकल्प जारी किया था। हाईकोर्ट ने इसी तिथि को सेवा आरंभ की तारीख मानने का आदेश दिया, जिससे सभी प्रभावित कर्मचारी 10 वर्ष की अनिवार्य सेवा की शर्त पूरी करते हैं।
इस मामले में संविधान के किन अनुच्छेदों का हवाला दिया गया?
खंडपीठ ने संविधान के अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समानता) और अनुच्छेद 16 (लोक नियोजन में अवसर की समानता) का उल्लंघन माना। अदालत ने पाया कि एक ही श्रेणी के कुछ कर्मचारियों को 2007 में पोस्टिंग मिलने से वे पेंशन के पात्र बने, जबकि याचिकाकर्ताओं को बिना किसी गलती के विलंबित पोस्टिंग मिली — यह भेदभाव असंवैधानिक है।
इन कर्मचारियों की मूल नियुक्ति कब और कहाँ हुई थी?
इन कर्मचारियों की नियुक्ति 1991-92 में गृह मंत्रालय के अधीन देवघर क्षेत्रीय जनगणना कार्यालय में संविदा आधार पर हुई थी। सितंबर 1992 में कार्यालय बंद होने पर उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं, जिसके बाद 2004 में राज्य सरकार ने उन्हें राजस्व विभाग में समायोजित करने का संकल्प लिया।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 3 सप्ताह पहले
  2. 3 सप्ताह पहले
  3. 3 सप्ताह पहले
  4. 1 महीना पहले
  5. 4 महीने पहले
  6. 4 महीने पहले
  7. 9 महीने पहले
  8. 1 साल पहले