4 नवंबर 2026
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कर्नाटक गन्ना किसानों का अल्टीमेटम: ₹5,500 प्रति टन न मिले तो 'जेल भरो' आंदोलन होगा तेज

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कर्नाटक गन्ना किसानों का अल्टीमेटम: ₹5,500 प्रति टन न मिले तो 'जेल भरो' आंदोलन होगा तेज

सारांश

कर्नाटक के बेलगावी में गन्ना किसानों ने ₹5,500 प्रति टन की माँग पर अड़े रहते हुए सरकार को नया अल्टीमेटम दिया है। मिलों का ₹3,500 का प्रस्ताव ठुकराया जा चुका है और बैठकों का सिलसिला बेनतीजा रहा है — अब शीतकालीन विधानसभा सत्र तक बड़े आंदोलन की चेतावनी है।

मुख्य बातें

बेलगावी के गन्ना किसानों ने 4 नवंबर 2026 को सरकार के लिए नई समय-सीमा तय की और 'जेल भरो' आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी।
किसानों की कुल माँग ₹5,500 प्रति टन — मिलों से ₹4,500 और राज्य सरकार से ₹1,000 सब्सिडी ।
चीनी मिल मालिकों का ₹3,500 प्रति टन का प्रस्ताव किसानों ने खारिज किया।
मंत्री सतीश जारकीहोली की दो दौर की बैठकें बेनतीजा रहीं; बुधवार को तीसरे दौर की वार्ता जारी।
मैसूरु और मांड्या में भी विरोध प्रदर्शन; पुणे-बेंगलुरु राष्ट्रीय राजमार्ग पहले 30 घंटे से अधिक जाम रहा।
किसान नेता चूनाप्पा पुजारी ने CM डी.के.
शिवकुमार से व्यक्तिगत घोषणा की माँग की।

कर्नाटक के बेलगावी जिले के गन्ना किसानों ने 4 नवंबर 2026 को राज्य सरकार के सामने एक नई समय-सीमा रखी है — गन्ने का लाभकारी मूल्य तत्काल घोषित करें, अन्यथा 'जेल भरो' आंदोलन और व्यापक विरोध प्रदर्शन को और तीव्र किया जाएगा। किसानों की माँग है कि चीनी मिलें ₹4,500 प्रति टन और राज्य सरकार अतिरिक्त ₹1,000 प्रति टन की सब्सिडी दे, जिससे कुल मूल्य ₹5,500 प्रति टन बने।

गतिरोध की पृष्ठभूमि

यह नया अल्टीमेटम उस समय आया है जब मंगलवार, 3 नवंबर को लोक निर्माण विभाग के मंत्री और बेलगावी जिले के प्रभारी मंत्री सतीश जारकीहोली की अध्यक्षता में चीनी मिल मालिकों और किसान प्रतिनिधियों के साथ हुई दो दौर की बैठकें बेनतीजा रहीं। बुधवार को जारकीहोली ने मिल मालिकों के साथ एक और दौर की बातचीत शुरू की।

रिपोर्टों के अनुसार, चीनी मिल मालिक ₹3,500 प्रति टन देने पर सहमत हुए हैं, लेकिन किसानों ने इस प्रस्ताव को सिरे से नकार दिया है। गौरतलब है कि 26 अक्टूबर को बेलगावी के सुवर्ण विधान सौधा में हुई त्रिपक्षीय बैठक भी असफल रही थी, जिसमें सरकार ने मिलों से किसानों को ₹250 प्रति टन अतिरिक्त देने का आग्रह किया था — लेकिन बताया जाता है कि कई मिलों ने इस पर अमल नहीं किया।

किसान नेताओं की स्पष्ट चेतावनी

किसान नेता चूनाप्पा पुजारी ने कहा कि बार-बार बैठकें होने के बावजूद कोई ठोस नतीजा न निकलना किसानों के साथ अन्याय है। उन्होंने माँग की कि मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार व्यक्तिगत रूप से राज्य सरकार की ओर से ₹1,000 प्रति टन सब्सिडी घोषित करें।

पुजारी ने आगाह किया कि यदि सरकार किसानों की माँगों को नज़रअंदाज़ करती रही, तो कर्नाटक विधानसभा के आगामी शीतकालीन सत्र के दौरान सरकार को एक बड़े और व्यापक आंदोलन का सामना करना पड़ेगा।

राज्यव्यापी विरोध का विस्तार

मैसूरु और मांड्या जिलों में भी प्रदर्शन तेज हुए हैं। मैसूरु में किसानों ने उपायुक्त कार्यालय में प्रवेश की कोशिश की। मांड्या में गन्ना किसानों ने कन्नड़ कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर उपायुक्त कार्यालय के सामने धरना दिया और राज्य व केंद्र सरकार के खिलाफ नारेबाज़ी की।

पिछले कुछ हफ्तों में आंदोलन लगातार उग्र हुआ है — किसानों ने पदयात्राएँ निकाली हैं, राजमार्ग जाम किए हैं और पूरे राज्य में विरोध मार्च किए हैं। इससे पहले, किसानों ने बेहतर मूल्य की माँग को लेकर पुणे-बेंगलुरु राष्ट्रीय राजमार्ग को 30 घंटे से अधिक समय तक अवरुद्ध रखा था।

क्या होगा आगे

बुधवार को होने वाली बातचीत के नतीजे पर सभी की निगाहें टिकी हैं। किसान नेताओं का स्पष्ट संदेश है कि संतोषजनक मूल्य घोषणा के बिना आंदोलन वापस नहीं होगा। यदि यह दौर भी बेनतीजा रहा, तो शीतकालीन विधानसभा सत्र से पहले राज्य में किसान आंदोलन और बड़ा रूप ले सकता है, जो कांग्रेस सरकार के लिए राजनीतिक दबाव को और बढ़ाएगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

500 और ₹5,500 का यह अंतर महज संख्याओं का नहीं, बल्कि खेती की लागत और टिकाऊपन की लड़ाई है। कांग्रेस सरकार के लिए यह दोहरा संकट है — एक तरफ मिल मालिकों के हित, दूसरी तरफ किसान वोटबैंक; और शीतकालीन सत्र की दहलीज पर यह राजनीतिक दबाव और गहरा होता जाएगा। बिना बाध्यकारी तंत्र के घोषणाएँ केवल वक्त खरीदती हैं — समाधान नहीं देती।
RashtraPress
4 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कर्नाटक के गन्ना किसान क्या माँग कर रहे हैं?
किसान चीनी मिलों से ₹4,500 प्रति टन और राज्य सरकार से अतिरिक्त ₹1,000 प्रति टन सब्सिडी की माँग कर रहे हैं, जिससे कुल मूल्य ₹5,500 प्रति टन बनता है। मिलों का ₹3,500 प्रति टन का प्रस्ताव किसानों ने अस्वीकार कर दिया है।
'जेल भरो' आंदोलन क्या है और इसे क्यों दी जा रही है चेतावनी?
'जेल भरो' आंदोलन एक सविनय अवज्ञा आंदोलन है जिसमें प्रदर्शनकारी जानबूझकर गिरफ्तारी देते हैं। कर्नाटक के गन्ना किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार समय-सीमा के भीतर लाभकारी मूल्य घोषित नहीं करती, तो यह आंदोलन और व्यापक रूप लेगा।
बातचीत अब तक क्यों विफल रही है?
26 अक्टूबर की त्रिपक्षीय बैठक और 3 नवंबर की दो दौर की वार्ता — दोनों बेनतीजा रहीं। रिपोर्टों के अनुसार, सरकार के ₹250 प्रति टन अतिरिक्त भुगतान के आग्रह को भी कई मिलों ने लागू नहीं किया, जिससे गतिरोध और गहरा हो गया।
इस विवाद में मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार की भूमिका क्या है?
किसान नेता चूनाप्पा पुजारी ने माँग की है कि मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार व्यक्तिगत रूप से राज्य सरकार की ओर से ₹1,000 प्रति टन सब्सिडी घोषित करें। अब तक मुख्यमंत्री की ओर से कोई सार्वजनिक घोषणा नहीं की गई है।
आंदोलन कहाँ-कहाँ फैला है और आगे क्या होगा?
विरोध प्रदर्शन बेलगावी के अलावा मैसूरु और मांड्या जिलों तक फैल चुका है। किसान नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि माँगें नहीं मानी गईं तो कर्नाटक विधानसभा के आगामी शीतकालीन सत्र के दौरान बड़ा आंदोलन छेड़ा जाएगा।
राष्ट्र प्रेस
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