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एमएमडीआर संशोधन विधेयक से ओडिशा को ₹12,000 करोड़ सालाना नुकसान: बीजद नेता भृगु बक्सीपात्रा का आरोप

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एमएमडीआर संशोधन विधेयक से ओडिशा को ₹12,000 करोड़ सालाना नुकसान: बीजद नेता भृगु बक्सीपात्रा का आरोप

सारांश

एमएमडीआर संशोधन विधेयक महज़ एक खनन कानून नहीं — बीजद के लिए यह ओडिशा के संवैधानिक अधिकार और आदिवासी-दलित कल्याण का सवाल है। ₹12,000 करोड़ सालाना और ₹1 लाख करोड़ के जब्त सेस के दावों के साथ, बक्सीपात्रा ने केंद्र-राज्य टकराव को नई धार दे दी है।

मुख्य बातें

बीजद नेता भृगु बक्सीपात्रा ने आरोप लगाया कि एमएमडीआर संशोधन विधेयक से ओडिशा को प्रतिवर्ष ₹12,000 करोड़ का राजस्व नुकसान होगा।
2005 से 2024 के बीच माइंस सेस के रूप में ओडिशा को मिलने वाले ₹1 लाख करोड़ से अधिक की राशि अब राज्य को नहीं मिलेगी — बक्सीपात्रा का दावा।
बीजद ने राज्यसभा में इस विधेयक का विरोध किया था; पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने भी सार्वजनिक रूप से नुकसान का विवरण रखा।
बक्सीपात्रा के अनुसार आदिवासी, दलित, किसान और श्रमिक वर्ग सबसे अधिक प्रभावित होंगे, क्योंकि खनन आय इन्हीं के कल्याण में लगती थी।
BJP सरकार पर वित्तीय अनुशासनहीनता का आरोप — दावा: मुख्यमंत्री मोहन माझी सरकार ने केवल दो वर्षों में ₹1 लाख 38,000 करोड़ का ऋण लिया।

बीजू जनता दल (बीजद) के वरिष्ठ नेता भृगु बक्सीपात्रा ने 21 अगस्त को भुवनेश्वर में केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि माइंस एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) यानी एमएमडीआर संशोधन विधेयक के कारण ओडिशा को प्रतिवर्ष लगभग ₹12,000 करोड़ का राजस्व नुकसान उठाना पड़ेगा। उनके अनुसार यह विधेयक संसद में बिना पर्याप्त बहस के एकतरफा तरीके से पारित किया गया, और इससे राज्य के खनिज संसाधनों पर ओडिशा का संवैधानिक अधिकार कमज़ोर होगा।

मुख्य आरोप और आर्थिक नुकसान का दावा

बक्सीपात्रा ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले के आधार पर वर्ष 2005 से 2024 के बीच माइंस सेस के रूप में ओडिशा को ₹1 लाख करोड़ से अधिक मिलने की संभावना थी। उनके अनुसार एमएमडीआर संशोधन विधेयक के कारण यह पूरी राशि अब राज्य को नहीं मिलेगी — वस्तुतः 'जब्त' हो गई है। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार इस राशि की वसूली करने में सक्षम थी, परंतु वह अवसर चूक गया।

बीजद नेता ने स्पष्ट किया कि यह केवल वित्तीय क्षति का प्रश्न नहीं है — यह राज्य की जमीन, खदानों और खनिजों पर अधिकार का सवाल है। उनके मुताबिक इस संशोधन के ज़रिए खनिज संसाधनों पर नियंत्रण केंद्र सरकार के हाथों में केंद्रित हो जाएगा।

आदिवासी, दलित और श्रमिक वर्ग पर असर

बक्सीपात्रा ने कहा कि खनन परियोजनाओं से विस्थापन ओडिशा के निवासियों का होता है — जमीन, पानी और बिजली राज्य की है। इसलिए खनन से प्राप्त राजस्व पर राज्य का हक़ बना रहना चाहिए। उन्होंने चेताया कि इस फैसले का सबसे गहरा असर आदिवासी, दलित, किसान, श्रमिक और मज़दूर समुदायों पर पड़ेगा, क्योंकि खनन आय का उपयोग इन्हीं वर्गों के कल्याण और विकास में होता था।

गौरतलब है कि ओडिशा के बजट और रोज़गार का सबसे बड़ा स्रोत खनन क्षेत्र है। राज्य को माइंस टैक्स और सेस से बड़ी आय होती है, जो सामाजिक योजनाओं की रीढ़ मानी जाती है।

बीजद का रुख और नवीन पटनायक का बयान

बक्सीपात्रा ने बताया कि राज्यसभा में बीजद ने इस विधेयक का विरोध किया था। उन्होंने यह भी कहा कि बीजद अध्यक्ष एवं ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने सार्वजनिक रूप से इस विधेयक से राज्य को होने वाले नुकसान का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया था।

केंद्रीय मंत्री और संबलपुर से सांसद धर्मेंद्र प्रधान के उस बयान का उल्लेख करते हुए — जिसमें कहा गया था कि 2015 के एमएमडीआर कानून के बाद ओडिशा की खनन आय ₹5,000 करोड़ से बढ़कर ₹50,000 करोड़ हो गई — बक्सीपात्रा ने कहा कि बीजद ने 2015 के संशोधन का कभी विरोध नहीं किया, बल्कि उसका स्वागत किया था, क्योंकि उससे ओडिशा समेत सभी खनन राज्यों को लाभ मिला था। उनका तर्क था कि पहले के लाभ का अर्थ यह नहीं कि भविष्य के राजस्व अधिकार भी छीन लिए जाएं।

ओडिशा की वित्तीय स्थिति पर पलटवार

ओडिशा की वित्तीय स्थिति पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के आरोपों का जवाब देते हुए बक्सीपात्रा ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और नीति आयोग तक ओडिशा को देश का सर्वाधिक वित्तीय अनुशासन वाला राज्य स्वीकार कर चुके हैं।

उन्होंने आँकड़े पेश करते हुए कहा कि वर्ष 2000 में जब नवीन पटनायक मुख्यमंत्री बने, तब ओडिशा पर ₹18,000 करोड़ का कर्ज था। 24 वर्षों में बजट कई गुना बढ़ने के बावजूद पटनायक सरकार ने कुल ₹78,000 करोड़ का ऋण लिया। इसके विपरीत, उनके अनुसार मुख्यमंत्री मोहन माझी के नेतृत्व वाली BJP सरकार ने केवल दो वर्षों में ही ₹1 लाख 38,000 करोड़ का कर्ज ले लिया है।

केंद्र-राज्य संबंध और आगे का रास्ता

बक्सीपात्रा ने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'दिल्ली ओडिशा की मालिक नहीं हो सकती।' उन्होंने BJP के ओडिशा के सांसदों और मंत्रियों को यह बात समझने की नसीहत दी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि BJP के नेता विपक्ष में रहते हुए जिन मुद्दों पर तत्कालीन सरकार का विरोध करते थे, सत्ता में आने के बाद वही नीतियाँ अपना रहे हैं।

बीजद ने संकेत दिया है कि वह इस संशोधन विधेयक के विरुद्ध संसद के अंदर और बाहर दोनों जगह अपना विरोध जारी रखेगी। यह ऐसे समय में आया है जब खनिज संपन्न राज्यों और केंद्र के बीच राजस्व हिस्सेदारी को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज़ हो रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

000 करोड़ सालाना और ₹1 लाख करोड़ का जब्त सेस — गंभीर दावे हैं, लेकिन ये बीजद के राजनीतिक हित से भी जुड़े हैं, जो सत्ता गँवाने के बाद विपक्षी भूमिका में है। असली सवाल यह है कि सर्वोच्च न्यायालय के जिस फैसले का हवाला दिया गया, उसके आधार पर राज्य ने वसूली क्यों नहीं की — और इसकी ज़िम्मेदारी किस सरकार की थी। केंद्र-राज्य खनिज राजस्व विवाद नया नहीं है, लेकिन एमएमडीआर संशोधन के ज़रिए केंद्रीकरण की प्रवृत्ति झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसे अन्य खनिज-समृद्ध राज्यों के लिए भी एक नज़ीर बन सकती है — यह पहलू मुख्यधारा की कवरेज में अक्सर छूट जाता है।
RashtraPress
21 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एमएमडीआर संशोधन विधेयक क्या है और इसे लेकर विवाद क्यों है?
माइंस एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) संशोधन विधेयक खनन क्षेत्र के नियमन में बदलाव लाता है। बीजद का आरोप है कि इससे खनिज संसाधनों पर राज्यों का अधिकार कमज़ोर होकर केंद्र के हाथों में चला जाएगा और ओडिशा जैसे खनन-निर्भर राज्यों को भारी राजस्व नुकसान होगा।
ओडिशा को एमएमडीआर संशोधन से कितना नुकसान होगा?
बीजद नेता भृगु बक्सीपात्रा के अनुसार ओडिशा को इस संशोधन के कारण प्रतिवर्ष लगभग ₹12,000 करोड़ का नुकसान होगा। इसके अलावा, 2005 से 2024 के बीच माइंस सेस के रूप में मिलने वाले ₹1 लाख करोड़ से अधिक की राशि भी अब राज्य को नहीं मिलेगी।
बीजद ने 2015 के एमएमडीआर संशोधन का विरोध क्यों नहीं किया था?
बक्सीपात्रा ने स्पष्ट किया कि 2015 के संशोधन से ओडिशा समेत सभी खनन राज्यों को लाभ हुआ था — खनन आय ₹5,000 करोड़ से बढ़कर ₹50,000 करोड़ हो गई थी। इसीलिए बीजद ने उसका स्वागत किया था। वर्तमान संशोधन इसके विपरीत राज्य के राजस्व अधिकार को सीमित करता है।
इस विधेयक से आदिवासी और दलित समुदायों पर क्या असर पड़ेगा?
बक्सीपात्रा के अनुसार खनन से मिलने वाली आय का उपयोग आदिवासी, दलित, किसान और श्रमिक वर्ग के कल्याण में होता था। राजस्व में कमी से इन समुदायों की विकास योजनाएँ प्रभावित होंगी। खनन परियोजनाओं से विस्थापन भी इन्हीं वर्गों का होता है।
ओडिशा की वित्तीय स्थिति पर बीजद और BJP के बीच विवाद क्या है?
बक्सीपात्रा ने दावा किया कि RBI और नीति आयोग ओडिशा को सर्वाधिक वित्तीय अनुशासन वाला राज्य मान चुके हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि BJP की मोहन माझी सरकार ने केवल दो वर्षों में ₹1 लाख 38,000 करोड़ का कर्ज लिया, जबकि नवीन पटनायक सरकार ने 24 वर्षों में कुल ₹78,000 करोड़ का ऋण लिया था।
राष्ट्र प्रेस
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