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पीरियड्स पर सामाजिक कलंक को समाप्त करने की आवश्यकता: राघव चड्ढा

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पीरियड्स पर सामाजिक कलंक को समाप्त करने की आवश्यकता: राघव चड्ढा

सारांश

राघव चड्ढा ने मासिक धर्म पर सामाजिक कलंक को समाप्त करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अगर 35 करोड़ महिलाएं इस विषय पर खुलकर बात नहीं कर सकतीं, तो हम प्रगतिशील नहीं हैं।

मुख्य बातें

35 करोड़ महिलाएं मासिक धर्म से प्रभावित हैं।
मासिक धर्म स्वच्छता स्वास्थ्य और गरिमा से जुड़ा है।
सरकार ने कई योजनाएं शुरू की हैं।
सामाजिक जागरूकता जरूरी है।
सैनिटरी नैपकिन की उपलब्धता बढ़ाई जा रही है।

नई दिल्ली, 13 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। राज्यसभा के सदस्य राघव चड्ढा ने शुक्रवार को सदन में मासिक धर्म (पीरियड्स) से संबंधित सामाजिक कलंक को समाप्त करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि यदि देश की 35 करोड़ महिलाएं और लड़कियां मासिक धर्म स्वच्छता के बारे में बिना किसी शर्म या डर के बात नहीं कर सकतीं, तो हम वास्तव में प्रगतिशील नहीं कह सकते।

राज्यसभा में अपने भाषण में चड्ढा ने कहा कि मासिक धर्म स्वच्छता कोई दान या एहसान नहीं है, और न ही यह कोई छोटा मुद्दा है। यह स्वास्थ्य, शिक्षा और समानता से संबंध रखता है, और सबसे महत्वपूर्ण यह महिलाओं की गरिमा का विषय है।

उन्होंने कहा, "यदि किसी लड़की को स्कूल छोड़ना पड़ता है क्योंकि वहां सैनिटरी पैड, पानी या निजता का प्रबंध नहीं है, तो यह केवल उसकी व्यक्तिगत समस्या नहीं है, बल्कि हमारी सामूहिक असफलता है।"

राघव चड्ढा ने समाज में व्याप्त दोहरे मानदंडों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा, "हम एक ऐसे देश में रहते हैं जहाँ शराब और सिगरेट खुलेआम बिकती हैं, लेकिन सैनिटरी पैड आज भी अखबार में लपेटकर दिए जाते हैं, जैसे कि उन्हें छिपाना आवश्यक हो। कहीं न कहीं, समाज ने एक जैविक तथ्य को सामाजिक वर्जना बना दिया है।"

उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर भी इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि भारत में 35 करोड़ से अधिक महिलाएं और लड़कियां इससे प्रभावित हैं। किसी भी देश की प्रगति की असली परीक्षा यही है कि हर लड़की बिना शर्म या डर के विद्यालय जा सके, सम्मानपूर्वक जीवन व्यतीत कर सके और इस विषय पर खुलकर चर्चा कर सके।

इस बीच, सरकार ने भी मासिक धर्म स्वच्छता को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अनुसार, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों में 15 से 24 वर्ष की महिलाओं में मासिक धर्म के दौरान स्वच्छ तरीकों के उपयोग का प्रतिशत 57.6 प्रतिशत से बढ़कर 77.3 प्रतिशत हो गया है।

इसके अलावा, रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के तहत चल रही प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना के माध्यम से देश भर में 16,000 से अधिक जनऔषधि केंद्र खोले गए हैं, जहां 'सुविधा' नाम से ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन केवल एक रुपये प्रति पैड की दर से उपलब्ध कराए जा रहे हैं।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार 30 नवंबर 2025 तक 'सुविधा' सैनिटरी नैपकिन की 96.30 करोड़ से अधिक बिक्री हो चुकी है। ये पैड पर्यावरण के अनुकूल हैं और ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सामग्री से बने हैं।

इसके अतिरिक्त, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय किशोरियों (10 से 19 वर्ष) में मासिक धर्म स्वच्छता सुधारने के लिए मेनस्ट्रुअल हाइजीन प्रमोशन योजना का संचालन कर रहा है। इस योजना के अंतर्गत जागरूकता बढ़ाने, सैनिटरी नैपकिन की उपलब्धता सुनिश्चित करने और सुरक्षित व पर्यावरण अनुकूल निस्तारण को बढ़ावा दिया जा रहा है।

सरकार ने स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए मेनस्ट्रुअल हाइजीन नीति भी तैयार की है, जिसके तहत विद्यालयों में सस्ती स्वच्छता उत्पादों की उपलब्धता, अलग शौचालय, सुरक्षित निस्तारण की व्यवस्था और पाठ्यक्रम में इस विषय को शामिल करने पर जोर दिया गया है।

वहीं, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान के तहत भी मासिक धर्म स्वच्छता और सैनिटरी नैपकिन के उपयोग के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन समाज में जागरूकता और बदलाव की भी जरूरत है।
RashtraPress
2 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मासिक धर्म स्वच्छता क्यों महत्वपूर्ण है?
मासिक धर्म स्वच्छता स्वास्थ्य, शिक्षा और महिलाओं की गरिमा से जुड़ा हुआ है।
सरकार ने इस मुद्दे पर क्या कदम उठाए हैं?
सरकार ने सैनिटरी नैपकिन की उपलब्धता और जागरूकता बढ़ाने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं।
मासिक धर्म पर कलंक को कैसे समाप्त किया जा सकता है?
इस पर खुलकर बात करने और शिक्षा के माध्यम से कलंक को समाप्त किया जा सकता है।
भारत में कितनी महिलाएं मासिक धर्म से प्रभावित हैं?
भारत में 35 करोड़ से अधिक महिलाएं मासिक धर्म से प्रभावित हैं।
सैनिटरी नैपकिन की उपलब्धता कैसे सुनिश्चित की जा रही है?
सरकार जनऔषधि केंद्रों के माध्यम से सस्ती सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध करवा रही है।
राष्ट्र प्रेस
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