स्कूलों में छात्राओं के लिए शौचालय की कमी: एक गंभीर मुद्दा

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स्कूलों में छात्राओं के लिए शौचालय की कमी: एक गंभीर मुद्दा

सारांश

कांग्रेस सांसद रंजीत रंजन ने स्कूलों में छात्राओं के लिए शौचालय की कमी पर जोर दिया है। यह समस्या केवल सुविधाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बेटियों के स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़ी है। क्या सरकार इस पर ठोस कदम उठाएगी?

मुख्य बातें

राज्यसभा में रंजीत रंजन ने छात्राओं के लिए शौचालय की कमी पर जोर दिया।
छत्तीसगढ़ में 5,000 सरकारी स्कूलों में शौचालय नहीं हैं।
बिहार और उत्तर प्रदेश में स्थिति चिंताजनक है।
स्वच्छता सुविधाओं की कमी से 2.3 करोड़ लड़कियां स्कूल छोड़ती हैं।
सरकार को सुधारात्मक कदम उठाने की तत्काल आवश्यकता है।

नई दिल्ली, 16 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। कांग्रेस सांसद रंजीत रंजन ने स्कूलों में छात्राओं के लिए शौचालय की समस्या को राज्यसभा में उठाया है। उन्होंने कहा कि यह एक अत्यंत गंभीर और शर्मनाक स्थिति है, जिस पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

रंजीत रंजन ने बताया कि हमारे देश के हजारों स्कूलों में छात्राओं के लिए बुनियादी सुविधाओं की कमी आज भी बनी हुई है। यह केवल एक सुविधा का मसला नहीं, बल्कि हमारी बेटियों की शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान का प्रश्न है। उन्होंने कहा कि सरकारी मंचों पर बेटियों की बात की जाती है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कई स्कूलों में आज भी छात्राओं के लिए एक शौचालय तक उपलब्ध नहीं है।

उन्होंने हाल ही में सामने आई जानकारी का हवाला देते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ में 5,000 से अधिक सरकारी स्कूलों में छात्राओं के लिए अलग शौचालय नहीं हैं। इस स्थिति को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी शर्मनाक बताते हुए राज्य सरकार से जवाब मांगा है।

रंजीत रंजन ने कहा कि यह समस्या केवल एक राज्य तक सीमित नहीं है। हमारे देश में स्वच्छता सुविधाओं और मासिक धर्म प्रबंधन की कमी के कारण हर साल लगभग 2.3 करोड़ लड़कियां स्कूल छोड़ने को मजबूर हो जाती हैं। कई स्कूलों में न तो साफ पानी है, न साबुन है और न ही सेनेटरी नैपकिन के सुरक्षित निपटान की व्यवस्था है। ऐसे हालात में लड़कियों के लिए पढ़ाई जारी रखना बहुत कठिन हो जाता है।

कांग्रेस सांसद ने कहा कि कुछ अन्य राज्यों में स्थिति और भी गंभीर है। बिहार में केवल 23 प्रतिशत स्कूलों में छात्राओं के लिए अलग शौचालय हैं। उत्तर प्रदेश में यह संख्या और भी कम है। वर्ष 2024-25 के सर्वेक्षण के अनुसार, देश में लगभग 14.72 लाख स्कूल हैं, लेकिन बड़ी संख्या में विद्यालयों में छात्राओं के लिए पर्याप्त स्वच्छता सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। उदाहरण के लिए, जम्मू-कश्मीर में 1,321 सरकारी स्कूलों में शौचालय नहीं हैं। उत्तराखंड में 148 विद्यालयों में छात्राओं के लिए शौचालय नहीं हैं। राजस्थान में हजारों स्कूलों में छात्राओं के लिए अलग शौचालय नहीं हैं। मध्य प्रदेश में भी बहुत बड़ी संख्या में स्कूलों में शौचालय नहीं हैं। इसके अतिरिक्त, यूनिसेफ के अनुसार, भारत में लगभग 22 प्रतिशत स्कूलों में छात्राओं के लिए उपयुक्त शौचालय उपलब्ध नहीं हैं।

रंजीत रंजन ने कहा कि यह गंभीर सवाल उठाता है कि क्या हम सिर्फ नारों से बेटियों को सशक्त बना रहे हैं। क्या बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ केवल भाषणों और विज्ञापनों तक सीमित है?

उन्होंने कहा, "मैं सरकार से अपील करती हूं कि देश भर के स्कूलों में स्वच्छता सुविधाओं का तत्काल राष्ट्रीय सर्वेक्षण कराया जाए। हर स्कूल में छात्राओं के लिए अलग, सुरक्षित और कार्यशील शौचालय सुनिश्चित किए जाएं। साफ पानी, साबुन और मासिक धर्म स्वच्छता से जुड़ी सुविधाएं अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराई जाएं। अगर हमें सच में अपनी बेटियों को सशक्त बनाना है, तो हमें नारों से आगे बढ़कर जमीनी स्तर पर ठोस कदम उठाने होंगे।"

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि यह हमारे समाज में महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण का भी प्रतीक है। शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए बुनियादी सुविधाएं अनिवार्य हैं। सरकार को तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता है।
RashtraPress
13 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

स्कूलों में छात्राओं के लिए शौचालय की कमी के क्या कारण हैं?
सरकारी स्कूलों में बजट की कमी, स्वच्छता सुविधाओं की अनदेखी और जागरूकता की कमी इसके मुख्य कारण हैं।
छात्राओं के लिए शौचालय की कमी का क्या असर है?
यह समस्या शिक्षा, स्वास्थ्य और आत्म-सम्मान को प्रभावित करती है, जिससे लड़कियां स्कूल छोड़ने को मजबूर होती हैं।
सरकार इस समस्या को हल करने के लिए क्या कदम उठा सकती है?
सरकार को सभी स्कूलों में शौचालय की सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण करना चाहिए।
क्या यह समस्या केवल एक राज्य की है?
नहीं, यह समस्या पूरे देश में फैली हुई है।
छात्राओं के लिए शौचालय की कमी से कितनी लड़कियां प्रभावित होती हैं?
हर साल लगभग 2.3 करोड़ लड़कियां इस समस्या के कारण स्कूल छोड़ने को मजबूर होती हैं।
राष्ट्र प्रेस
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