11 अगस्त 2026
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राज्यसभा में अधिकरण सुधार विधेयक 2026 पारित, राष्ट्रीय अधिकरण आयोग की होगी स्थापना

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राज्यसभा में अधिकरण सुधार विधेयक 2026 पारित, राष्ट्रीय अधिकरण आयोग की होगी स्थापना

सारांश

राज्यसभा ने अधिकरण सुधार विधेयक 2026 पास कर दिया — यह महज एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि 2025 के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद न्यायिक स्वतंत्रता की दिशा में उठाया गया ठोस कदम है। राष्ट्रीय अधिकरण आयोग की स्थापना से देश की अधिकरण व्यवस्था में पारदर्शिता और एकरूपता आने की उम्मीद है।

मुख्य बातें

राज्यसभा ने 11 अगस्त 2026 को अधिकरण सुधार विधेयक, 2026 पारित किया।
विधेयक में राष्ट्रीय अधिकरण आयोग की स्थापना का प्रावधान; अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश या उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश करेंगे।
अधिकरण सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष निर्धारित, ऊपरी आयु सीमा के अधीन।
2021 के सुधार के बाद अधिकरणों की संख्या 19 से घटकर 16 हुई थी; नया विधेयक उसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है।
19 नवंबर 2025 के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने स्वतंत्र आयोग की आवश्यकता को रेखांकित किया था।
विधेयक अधिकरणों के मूल अधिकार क्षेत्र में कोई बदलाव नहीं करता।

राज्यसभा ने 11 अगस्त 2026 को अधिकरण सुधार विधेयक, 2026 पास कर दिया, जिसके तहत एक स्वतंत्र राष्ट्रीय अधिकरण आयोग की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ। केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने सदन में विधेयक पेश करते हुए कहा कि यह कानून अधिकरणों की नियुक्ति प्रक्रिया, सेवा शर्तों, पारदर्शिता, दक्षता और न्यायिक स्वतंत्रता को सुदृढ़ करेगा।

विधेयक में क्या है खास

विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान राष्ट्रीय अधिकरण आयोग की स्थापना है। इस आयोग की अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश अथवा किसी उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश द्वारा की जाएगी। आयोग में दो न्यायिक सदस्य और दो तकनीकी सदस्य होंगे, ताकि न्यायिक व तकनीकी विशेषज्ञता का उचित समन्वय सुनिश्चित हो सके।

मेघवाल ने स्पष्ट किया कि अधिकरण सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष निर्धारित किया गया है, जो निर्धारित ऊपरी आयु सीमा के अधीन होगा। उन्होंने कहा, "अधिकरण सदस्यों का कार्यकाल और स्पष्ट सेवा शर्तें न्यायिक स्वतंत्रता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, इसलिए विधेयक में 5 वर्ष के कार्यकाल का प्रावधान रखा गया है, जो निर्धारित ऊपरी आयु सीमा के अधीन होगा।" पात्रता के लिए अलग से कोई न्यूनतम आयु सीमा तय नहीं की गई है।

सुधार की पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने 2015 में अधिकरणों के युक्तिकरण की प्रक्रिया शुरू की थी। 2021 में सरकार अधिकरण सुधार अध्यादेश और बाद में अधिकरण सुधार अधिनियम लेकर आई, जिसके बाद अधिकरणों की संख्या 19 से घटाकर 16 की गई। हालाँकि, 2021 के कानून के कुछ प्रावधानों को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई और न्यायिक स्वतंत्रता तथा शक्तियों के पृथक्करण से जुड़े महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आए।

यह ऐसे समय में आया है जब 19 नवंबर 2025 को सर्वोच्च न्यायालय के एक महत्वपूर्ण फैसले में राष्ट्रीय अधिकरण आयोग जैसी स्वतंत्र संस्था की आवश्यकता को रेखांकित किया गया था। मेघवाल ने बताया कि इसी न्यायिक मार्गदर्शन के आलोक में यह विधेयक तैयार किया गया है।

अधिकार क्षेत्र में कोई बदलाव नहीं

मंत्री ने स्पष्ट किया कि यह विधेयक अधिकरणों के मूल अधिकार क्षेत्र में कोई परिवर्तन नहीं करता। प्रत्येक अधिकरण का अधिकार क्षेत्र वही रहेगा जो संबंधित मूल कानून में निर्धारित है। उन्होंने कहा, "यह अधिकार क्षेत्र बदलने वाला विधेयक नहीं है। यह नियुक्तियों, संस्थागत स्वतंत्रता, पारदर्शिता और दक्षता को मजबूत करने वाला विधेयक है।"

समावेशी नियुक्तियों पर जोर

एक सांसद द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति से जुड़े मुद्दे उठाए जाने पर मेघवाल ने बताया कि सरकार उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को पत्र लिखकर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, महिलाओं और अल्पसंख्यक समुदायों से नाम भेजने का आग्रह करती है। उन्होंने कहा कि 'सबका साथ, सबका विकास' सरकार का मूल मंत्र है और इसी के चलते विभिन्न उच्च न्यायालयों में इन वर्गों से आने वाले न्यायाधीशों की संख्या बढ़ी है।

आगे की राह

राज्यसभा से पारित होने के बाद यह विधेयक अब कानूनी प्रक्रिया के अगले चरण की ओर बढ़ेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रीय अधिकरण आयोग की स्थापना से न्याय तक पहुँच सुगम होगी, कारोबार सुगमता में सुधार आएगा और भारत का संस्थागत ढाँचा वैश्विक सर्वोत्तम प्रक्रियाओं के अनुरूप होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

न्यायिक दबाव में हुआ। 2021 के अधिनियम के प्रावधान अदालत में टिक नहीं पाए, और अब नया ढाँचा उन्हीं कमियों को दूर करने का दावा करता है। असली परीक्षा राष्ट्रीय अधिकरण आयोग की कार्यात्मक स्वायत्तता की होगी — क्या यह वास्तव में कार्यपालिका के प्रभाव से मुक्त रहेगा, या महज एक नई संस्थागत परत बनकर रह जाएगा? 2015 से चली आ रही युक्तिकरण प्रक्रिया के बावजूद अधिकरणों में लंबित मामलों की समस्या बनी हुई है, और विधेयक इस पर मौन है।
RashtraPress
11 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अधिकरण सुधार विधेयक 2026 क्या है?
यह राज्यसभा में 11 अगस्त 2026 को पारित वह विधेयक है जो भारत की अधिकरण (ट्रिब्यूनल) व्यवस्था में सुधार के लिए राष्ट्रीय अधिकरण आयोग की स्थापना करता है। इसका उद्देश्य नियुक्ति प्रक्रिया, सेवा शर्तों, पारदर्शिता और न्यायिक स्वतंत्रता को सुदृढ़ करना है।
राष्ट्रीय अधिकरण आयोग की संरचना कैसी होगी?
आयोग की अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश या किसी उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश करेंगे। इसमें दो न्यायिक सदस्य और दो तकनीकी सदस्य होंगे।
अधिकरण सदस्यों का कार्यकाल कितना होगा?
विधेयक के अनुसार अधिकरण सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष निर्धारित किया गया है, जो निर्धारित ऊपरी आयु सीमा के अधीन होगा। पात्रता के लिए अलग से कोई न्यूनतम आयु सीमा तय नहीं की गई है।
यह विधेयक क्यों लाया गया?
19 नवंबर 2025 को सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले ने अधिकरण सदस्यों की नियुक्ति और सेवा शर्तों के संदर्भ में स्वतंत्र संस्थागत ढाँचे की आवश्यकता को रेखांकित किया था। इसी न्यायिक मार्गदर्शन के आधार पर यह विधेयक तैयार किया गया है।
क्या इस विधेयक से अधिकरणों के अधिकार क्षेत्र में बदलाव होगा?
नहीं। विधि मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने स्पष्ट किया है कि यह विधेयक अधिकरणों के मूल अधिकार क्षेत्र में कोई परिवर्तन नहीं करता। प्रत्येक अधिकरण का अधिकार क्षेत्र वही रहेगा जो संबंधित मूल कानून में निर्धारित है।
राष्ट्र प्रेस
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