4 अगस्त 2026
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राज्यसभा में जन्म-मृत्यु पंजीकरण विधेयक 2026 पारित, नित्यानंद राय बोले — 'भूत मतदाताओं' का युग समाप्त होगा

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राज्यसभा में जन्म-मृत्यु पंजीकरण विधेयक 2026 पारित, नित्यानंद राय बोले — 'भूत मतदाताओं' का युग समाप्त होगा

सारांश

राज्यसभा ने जन्म-मृत्यु पंजीकरण संशोधन विधेयक 2026 पारित कर दिया। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने साफ कहा — मृत व्यक्ति मतदाता सूची में नहीं रहेंगे। दो वर्ष से अधिक देरी के मामलों में अब न्यायिक मजिस्ट्रेट का आदेश अनिवार्य होगा।

मुख्य बातें

राज्यसभा ने 4 अगस्त 2026 को जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित किया।
दो वर्ष से अधिक की देरी से पंजीकरण के लिए अब प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट का आदेश अनिवार्य होगा।
जन्म पंजीकरण 1986 में 31.6% से बढ़कर 2023 में 99%+ हुआ; मृत्यु पंजीकरण 72% से बढ़कर 99.4% पहुँचा।
देशभर में साढ़े तीन लाख से अधिक पंजीकरण केंद्र स्थापित; पूरी प्रक्रिया डिजिटल की गई।
मंत्री नित्यानंद राय ने कहा — यह कानून 'भूत मतदाताओं' की समस्या को समाप्त करेगा और फर्जी पंजीकरण पर रोक लगाएगा।

राज्यसभा ने मंगलवार, 4 अगस्त 2026 को जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित कर दिया। विधेयक पर चर्चा का जवाब देते हुए केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा कि यह कानून उन 'भूत मतदाताओं' की समस्या को जड़ से खत्म करेगा जो मृत्यु के बाद भी मतदाता सूची में बने रहते हैं। विपक्षी सांसदों के हंगामे के बीच यह विधेयक सदन से पारित हुआ।

विधेयक में क्या बदला

मंत्री नित्यानंद राय ने सदन को बताया कि जन्म और मृत्यु के पंजीकरण की मौजूदा समय-सीमाएँ काफी हद तक यथावत रखी गई हैं। 21 दिन के भीतर पंजीकरण की प्रक्रिया पहले की तरह जारी रहेगी। 22 से 30 दिन के बीच पंजीकरण भी रजिस्ट्रार के माध्यम से होगा। 30 दिन से एक वर्ष तक के विलंबित मामलों में विलंब शुल्क के साथ जिला रजिस्ट्रार की लिखित अनुमति आवश्यक रहेगी।

सबसे बड़ा बदलाव उन मामलों में किया गया है जहाँ दो वर्ष से अधिक की देरी हो। पहले ऐसे मामलों में जिला मजिस्ट्रेट द्वारा अधिकृत कार्यपालक मजिस्ट्रेट का आदेश पर्याप्त था। अब केवल प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश पर ही रजिस्ट्रार पंजीकरण कर सकेगा। राय ने स्पष्ट किया कि पंजीकरण रजिस्ट्रार ही करेगा, न्यायिक मजिस्ट्रेट केवल अनुमति देगा।

सरकार की मंशा — 'भूत मतदाता' और फर्जी पंजीकरण पर रोक

राय ने कहा, 'यह देश चाहता है कि भारत माता की गोद में जन्म लेने वाले हर बच्चे का पंजीकरण निश्चित रूप से हो — और जिसकी मृत्यु हो जाए, वह मृत्यु के बाद भी रिकॉर्ड में जीवित रहकर तुष्टिकरण करने वाली पार्टियों का मतदाता न बना रहे।' उन्होंने आगे कहा कि देश के कुछ राज्यों में पहले बाहर जन्मे बच्चों को भी आसानी से जन्म प्रमाणपत्र दे दिए जाते थे — यह संशोधन इस खामी को बंद करता है।

मंत्री ने यह भी जोड़ा कि पूरी प्रक्रिया को डिजिटल किया गया है और देशभर में साढ़े तीन लाख से अधिक पंजीकरण केंद्र स्थापित किए जा चुके हैं, ताकि ईमानदार नागरिकों के लिए व्यवस्था और सरल हो सके।

पंजीकरण के आँकड़े — पाँच दशकों की तस्वीर

राय ने ऐतिहासिक आँकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि 1986 में जन्म पंजीकरण का स्तर मात्र 31.6 प्रतिशत था, जो 2023 तक बढ़कर 99 प्रतिशत से अधिक हो गया है। मृत्यु पंजीकरण 1974 में 72 प्रतिशत था, जो अब 99.4 प्रतिशत तक पहुँच चुका है।

उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि जब मृत्यु पंजीकरण केवल 72 प्रतिशत था, तब लाखों लोगों का रिकॉर्ड ही नहीं बन पाता था — और इसके लिए उन्होंने तत्कालीन सरकार की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया।

विपक्ष की प्रतिक्रिया और सदन का माहौल

विधेयक पर चर्चा के दौरान विपक्षी सांसदों ने नारेबाजी की और हंगामा किया। कांग्रेस नेताओं ने विधेयक की मंशा पर सवाल उठाए। राय ने जवाब देते हुए कहा कि कांग्रेस यह नहीं चाहती कि पंजीकरण प्रणाली मजबूत हो, क्योंकि इससे उनकी 'तुष्टिकरण की राजनीति' प्रभावित होती है। विपक्ष की ओर से इन आरोपों का खंडन किया गया, हालाँकि सदन में विस्तृत बहस हंगामे के कारण बाधित रही।

आगे क्या होगा

राज्यसभा से पारित होने के बाद यह विधेयक अब राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाएगा। जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1969 में यह संशोधन लागू होने के बाद मतदाता सूची की शुद्धता और नागरिक पंजीकरण प्रणाली दोनों पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

और पंजीकरण में देरी के लिए न्यायिक निगरानी एक तार्किक सुधार है। लेकिन यह ध्यान देने योग्य है कि विधेयक का राजनीतिक आख्यान — जिसमें 'तुष्टिकरण' और विपक्ष पर सीधे आरोप शामिल हैं — इसे प्रशासनिक सुधार से अधिक चुनावी विमर्श की तरह प्रस्तुत करता है। असली कसौटी यह होगी कि साढ़े तीन लाख पंजीकरण केंद्रों की जमीनी हकीकत क्या है, और न्यायिक मजिस्ट्रेट की अनिवार्यता ग्रामीण और वंचित तबकों के लिए बाधा तो नहीं बनेगी।
RashtraPress
4 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रीकरण (संशोधन) विधेयक 2026 क्या है?
यह विधेयक जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1969 में संशोधन करता है और 4 अगस्त 2026 को राज्यसभा से पारित हुआ। इसका मुख्य उद्देश्य विलंबित पंजीकरण के दुरुपयोग को रोकना और मतदाता सूची में मृत व्यक्तियों के नाम बने रहने की समस्या को समाप्त करना है।
दो वर्ष से अधिक देरी पर पंजीकरण के लिए अब क्या नियम होगा?
संशोधन के अनुसार, यदि जन्म या मृत्यु की सूचना दो वर्ष से अधिक देरी से दी जाती है, तो अब केवल प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश पर ही रजिस्ट्रार पंजीकरण कर सकेगा। पहले यह अधिकार जिला मजिस्ट्रेट द्वारा अधिकृत कार्यपालक मजिस्ट्रेट के पास था।
'भूत मतदाता' क्या होते हैं और यह विधेयक उन्हें कैसे रोकेगा?
'भूत मतदाता' वे व्यक्ति हैं जिनकी मृत्यु हो चुकी है लेकिन उनका नाम मतदाता सूची में बना रहता है। समय पर मृत्यु पंजीकरण अनिवार्य और कठोर बनाने से मृतकों के नाम मतदाता सूची से समय पर हटाए जा सकेंगे, जिससे फर्जी मतदान की संभावना कम होगी।
भारत में अभी जन्म और मृत्यु पंजीकरण की स्थिति क्या है?
केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय के अनुसार, जन्म पंजीकरण 1986 में 31.6% था जो 2023 में 99% से अधिक हो गया है। मृत्यु पंजीकरण 1974 में 72% था जो अब 99.4% तक पहुँच चुका है।
इस विधेयक का आम नागरिकों पर क्या असर होगा?
सरकार के अनुसार, यह कानून ईमानदार नागरिकों के लिए पंजीकरण प्रक्रिया को और सरल बनाता है क्योंकि पूरी व्यवस्था डिजिटल की गई है और देशभर में साढ़े तीन लाख से अधिक पंजीकरण केंद्र स्थापित किए गए हैं। हालाँकि, दो वर्ष से अधिक देरी के मामलों में न्यायिक प्रक्रिया से गुजरना होगा।
राष्ट्र प्रेस
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