अपार आईडी 'ऑप्ट-आउट' विकल्प: सुप्रीम कोर्ट CBSE को देगा ओडिशा हाईकोर्ट फैसला लागू करने का निर्देश
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 20 जुलाई 2026 को स्पष्ट किया कि वह केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) को निर्देश देगा कि वह ओडिशा उच्च न्यायालय के उस आदेश को पूरे देश में लागू करे, जिसमें अपार (ऑटोमेटेड परमानेंट एकेडमिक अकाउंट रजिस्ट्री) आईडी के सहमति फॉर्म में 'ऑप्ट-आउट' का स्पष्ट विकल्प शामिल करने को कहा गया है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि CBSE के सभी सर्कुलर डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) अधिनियम, 2023 के अधीन होंगे।
मुख्य घटनाक्रम
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ — जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे — ने सुनवाई के दौरान कहा, 'हम CBSE को निर्देश देंगे कि वह इस फैसले को पूरे देश में लागू करे, क्योंकि ओडिशा हाईकोर्ट के आदेश को मान लिया गया है। हम CBSE को इन मुद्दों की जाँच करने का भी निर्देश दे रहे हैं।' पीठ ने यह सुनिश्चित करने पर जोर दिया कि अपार योजना स्वैच्छिक बनी रहे और माता-पिता के सहमति फॉर्म में 'ऑप्ट-आउट' का विकल्प साफ तौर पर दर्ज हो।
याचिका में क्या है
यह मामला चार छात्रों के माता-पिता की ओर से दायर एक रिट याचिका पर आधारित है, जिसमें अपार आईडी योजना की संवैधानिक वैधता और बोर्ड परीक्षा पंजीकरण के लिए इसे अनिवार्य बनाने के CBSE के निर्णय को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने तर्क दिया कि अपार आईडी आधार से जुड़ी होने के कारण, जिसे सरकार स्वैच्छिक बताती है, वह व्यवहार में छात्रों को आधार लेने के लिए बाध्य करती है। उन्होंने कहा, 'शिक्षा का अधिकार कोई टारगेटेड सर्विस नहीं है। शिक्षा का अधिकार एक संवैधानिक अधिकार है। इसलिए, परीक्षा में शामिल होने के लिए किसी बच्चे से आधार और अपार लेने के लिए कहना संविधान के खिलाफ है।'
डेटा सुरक्षा और गोपनीयता की चिंताएँ
याचिका में अपार को आधार से जुड़े 'जन्म से करियर तक' के आजीवन शैक्षणिक पहचानकर्ता के रूप में चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि यह एक केंद्रीकृत डिजिटल संरचना बनाता है जो छात्रों की दीर्घकालिक ट्रैकिंग और प्रोफाइलिंग को संभव बनाती है। याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि यह योजना सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक 'के.एस. पुट्टास्वामी प्राइवेसी जजमेंट' में तय किए गए कानूनी वैधता, आवश्यकता और आनुपातिकता के मानकों पर खरी नहीं उतरती और 'भूल जाने के अधिकार' का उल्लंघन करती है। इसके अलावा, याचिका में संविधान के अनुच्छेद 21 और 21-A के तहत निजता, शिक्षा और निर्णय लेने की स्वायत्तता के मौलिक अधिकारों के हनन का भी आरोप लगाया गया है।
ओडिशा हाईकोर्ट का पूर्व फैसला
गौरतलब है कि दिसंबर 2025 में ओडिशा उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति शशिकांत मिश्रा की एकल-न्यायाधीश पीठ ने कहा था कि मॉडल सहमति फॉर्म में माता-पिता को शुरुआत में ही 'ऑप्ट-आउट' का विकल्प न देने से योजना की स्वैच्छिक प्रकृति कमजोर पड़ती है। न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा था कि 'मॉडल सहमति फॉर्म की भाषा ठीक नहीं लगती' और यदि अपार को स्वैच्छिक रखना है, तो माता-पिता को 'अपनी सहमति न देने या इससे पूरी तरह बाहर निकलने' का स्पष्ट विकल्प दिया जाना चाहिए। उच्च न्यायालय ने अधिकारियों को मॉडल सहमति फॉर्म में बदलाव करने और उसमें 'ऑप्ट-आउट' का प्रावधान शामिल करने का निर्देश दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को पुष्टि की कि उस आदेश को चुनौती नहीं दी गई है, इसलिए उसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू करना उचित है।
आगे क्या होगा
सर्वोच्च न्यायालय CBSE को औपचारिक निर्देश जारी करेगा, जिसमें ओडिशा उच्च न्यायालय के आदेश को देशभर में लागू करने और DPDP अधिनियम, 2023 के अनुपालन को सुनिश्चित करने की बाध्यता होगी। यह फैसला लाखों स्कूली छात्रों के डेटा अधिकारों और शिक्षा में डिजिटल पहचान की अनिवार्यता पर एक महत्वपूर्ण नज़ीर स्थापित कर सकता है।